हमने जो शास्त्रानुमोदित भोजनविधि लिखी है तदनुसार भोजन करने से भोक्ता को निम्नलिखित मुख्य लाभ होंगे—

(१) भोजन को अन्न रूपी ब्रह्म की उपासना समझने से यह भी एक धार्मिक अनुष्ठान बन जाएगा, जिससे मनुष्य की धार्मिक निष्ठा को प्रोत्साहन मिलेगा।

(२) भोग लगाकर भगवत् प्रसाद समझकर खाने से किसी भी अभक्ष्य अपेय वस्तु का स्वभावतः सम्पर्क न हो सकेगा और अन्न में अपना ममत्व भी न रहेगा।

(३) सबको देकर खाने की क्रियात्मक भावना से जमींदार और किसान, मिल मालिक और मजदूर, पूंजीपति और शोषित—इत्यादि जितनी भी आज की समस्याएँ हैं, वे समाहित हो जाएँगी।

(४) आज की प्रचलित भोजन व्यवस्था के अनुसार बहुत अन्न पेट में चले जाने पर भी रसास्वादन के लिये तबियत मचलती रह जाती है। जब पेट हो अँट जाता है उस विवशता का नाम—'धाप गया' 'रज गया' 'तृप्त हो गया' रक्खा गया है, परन्तु जीभ का भाग जीभ को देने की दशा में पेट कम अटेगा और तृप्ति अधिक मिलेगी। अर्थात् थोड़े भोजन में ही तबियत भर जाएगी। इससे कम खर्च और अधिक लाभ होगा।

(५) यदि संसार की सरकारें उक्त एक ही नियम के पालन के लिये अपने-अपने देश के लोगों को प्रोत्साहित करें तो आज की खाद्य समस्या, राशन समस्या और कन्ट्रोल समस्याएँ हल हो जायेंगी।

(६) विधिवत् भोजन करने का यह परिणाम होगा, कि बैल भैंस बकरी आदि जीवों की भांति मनुष्य के मल में दुर्गन्ध न होगी क्योंकि दुर्गन्ध का कारण यही है, कि हम आवश्यकता से अधिक खा जाते हैं और उसमें विभिन्न रसों का अपच अंश अवशिष्ट रहता है। गाय आदि जीव रोमन्थ=जुगाली करके अपने भक्ष्य को जिह्वा के पानी से परिप्लुत कर लेते हैं, परन्तु मनुष्य को यह कार्य खाने के समय ही कर लेना चाहिए। इससे 'गन्धासवो मूत्रपुरीषमल्पम्' के अनुसार योगियों की भाँति भोक्ता का पसीना और मल तक दुर्गन्धित नहीं रहता।

यदि उपर्युक्त रीति से भोजन किया जाएगा तो समस्त इन्द्रियें अन्त तक सुरक्षित रहेंगी और स्वस्थतापूर्वक पूर्णायु की प्राप्त होगी।


भोजनानन्तर बांया हाथ पेट के ऊपर दक्षिणावर्त फेरते हुये नीचे लिखा श्लोक बोलना चाहिये—

अगस्त्यं कुम्भकर्णञ्च, शनिं च बडवानलम्।
आहारपरिपाकार्थं, स्मरेद् भीमं च पञ्चमम्॥

अर्थात्—अढ़ाई चुल्लू में समुद्रपान कर जाने वाले महर्षि अगस्त्य, बहुभोजी महाकाय कुम्भकरण, जिसकी एक नजर पड़ने से ही अकाल पड़ जाता है ऐसे शनिदेव, सब कुछ भस्मसात् कर देने वाली वाडवाग्नि, और अतीव तीव्र जाठराग्नि वाले भीमसेन इन पाँच व्यक्तियों का भोजन के सम्यक् परिपाक के लिये स्मरण करना चाहिये।

कहना न होगा कि 'भावनावाद' के अनुसार प्रबल जाठराग्नि सम्पन्न, व्यक्तियों का स्मरण मनुष्य के मन में भोजनोपरान्त होने वाली स्वाभाविक ग्लानि को दूर करने में सहायक होगा। साथ ही पेट पर दक्षिणावर्त रीति से फेरा हुआ बांया हाथ—दांई कोखवर्ती आमाशय में पहुँचे हुये सद्य भुक्त भोजन को वामकुक्षीवर्ती मलाशय की ओर गतिशील बनाने में सहायक होगा।