क्यों
नियमित दिनचर्या क्यों ? यथा विधि करने से क्या लाभ ? क्या विधि-विधान व्यर्थ ढकोसला है ?
हमारी दिनचर्या नियमित है। प्रातः जागरण से लेकर शयन तक की समस्त क्रियाओं के लिए शास्त्रकारों ने अपने दीर्घकालीन अनुभव से ऐसे नियमों का निर्माण किया है जिनका अनुसरण करके मनुष्य अपने जीवन को सफल कर सकता...
read moreप्रातः जागरण | प्रातः जागरण क्यों ? प्रातः स्मरण | प्रातःस्मरणीय शिष्टाञ्जलि और उसका महत्व
हमारी दैनिक चर्या का आरम्भ प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में जागरण से होता है। शास्त्रों की आज्ञा है—ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत।अर्थात्—प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिये। ब्रह्म मुहूर्त की व्याख्या करते...
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कर दर्शन | भूमि माता की वन्दना
भगवत्स्मरणानन्तर शास्त्रीय विधान, कर दर्शन का है।कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥अर्थात्—हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी का निवास है, हाथ के मध्य भाग में सरस्वती र...
read moreमातृ-भूमि वन्दना | राष्ट्रीय चेतना का मूल मंत्र
मातृ-भूमि वन्दना भी प्रातःकालीन कृत्यों में से आवश्यक कृत्य है। कर दर्शन के अनन्तर शास्त्रकारों ने मातृ-वन्दना का विधान किया है। निम्नलिखित प्रार्थना के साथ पृथ्वी को स्पर्श करते हुए यह वन्दना की जाती...
read moreप्रातः दर्शनीय पदार्थ
शय्या परित्याग के बाद शौच स्नानादि नित्य कृत्य करने चाहिये। इस विषय में प्रसंगवश यह भी लिख देना उचित होगा कि प्रातःकाल सर्वप्रथम जिन पदार्थों पर हमारी दृष्टि पड़े वे ऐसे न होने चाहिये कि उनको देखने से...
read moreमल विसर्जन | बोले क्यों नहीं
कहा जा सकता है कि बिना इस पुस्तक को पढ़े भी मनुष्य प्रतिदिन मलत्याग करते ही हैं, और—मनुष्यों की बात छोड़ दीजिए, पशु-पक्षी भी बिना किसी रुकावट के इस प्राकृतिक आवश्यकता को पूरा कर लेते हैं फिर ऐसे घिनौन...
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पशुता की ओर | मार्ग में क्यों नहीं ?
तिष्ठन् न मूत्रपुरीषे कुर्यात् (पारस्कर गृह्य सूत्र)अर्थात्—खड़े-२ मूत्र पुरीषोत्सर्ग न करे।डर्विन साहब की पशु से मनुष्य बन जाने की विकासवाद की थ्यूरी में अगर कोई सचाई हो सकती है तो वह यही की आज भी मन...
read moreमिट्टी या साबुन ? कौन मिट्टी न ली जाय ?
शौचानन्तर विशुद्ध मिट्टी द्वारा हाथ तथा पात्र को माँजकर शुद्ध करना चाहिए। स्मृतिकारों ने लिखा है—द्वे लिङ्गे मृत्तिके देये गुदे पञ्च करे दश।उभयोः सप्त दातव्या विट्शौचे मृत्तिकाः स्मृताः॥अर्थात्—शौच के...
read moreमलमूत्र त्याग और शुद्धि के विशेष नियम
मलमूत्र त्याग और शुद्धि के सम्बन्ध में शास्त्र में कुछ विशेष नियम भी लिखे हैं आस्तिक जनता उन अतीव उपयोगी नियमों का पालन करके अपने स्वास्थ्य को सुस्थिर रख सके एतदर्थ हम उन्हें भी यहाँ लिखते हैं, तद्यथा...
read moreदन्त धावन | अमुक काष्ठ से अमुक लाभ
औदुम्बरेण दन्तान् धावेत्। (पारस्कर गृह्यसूत्र)अर्थात्—गूलर की दातुन से दाँतों को स्वच्छ करना चाहिए।दन्त धावन हमारी दैनिक चर्या का अंग है। प्रतिदिन प्रातःकाल शास्त्रोक्त वनस्पतियों में से किसी भी वनस्प...
read moreदातुन किस वृक्ष की और कैसे ? दातुन बनाम टूथपेस्ट ? दातुन कब न करें !
जड़ी बूटियों एवं वनस्पतियों के गुणावगुणों की खूब छानबीन तथा उनका प्रयोगात्मक अध्ययन करके ही प्राचीन शास्त्रकारों ने दातुन के व्यवहार में आने योग्य वृक्षों का निर्धारण किया है। निम्नलिखित वनस्पतियें इस...
read moreव्यायाम | व्यायाम क्यों ?
दिनचर्या में व्यायाम का वही महत्त्व है जो भोजन का। जैसे शरीर को जीवित रखने के लिये प्रतिदिन भोजन की आवश्यकता है इसी प्रकार उस खाये हुए भोजन को पचाने के लिये व्यायाम भी अनिवार्य है। एक सनातनधर्मी के हृ...
read moreभारतीय व्यायामपद्धति | सूर्यप्रणाम
हमारा यह पुण्य देश अपनी ज्ञानगरिमा के कारण जहाँ सब देशों का सिरमौर और 'विश्वगुरु' कहलाता रहा है, वहाँ बल एवं शक्ति में भी वह कभी किसी से पीछे नहीं रहा। शक्तिशाली चक्रवर्ती सम्राटों के अतिरिक्त भारतीय...
read moreआज की दयनीय दशा
स्वास्थ्य की दृष्टि से आज हमारा देश बहुत पिछड़ा हुआ है। उस भारत में जहाँ कि—'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः'—का घन गम्भीर वेदघोष देशवासियों को शारीरिक तथा आत्मिक बल सम्पादन की प्रेरणा देता था, जिस देश में पु...
read moreतैल मर्दन | तैल मर्दन क्यों ? रवि मंगल आदि वारों को क्यों नहीं ?
अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं स जराश्रमवातहा।दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुः स्वप्नसुत्वक्त्व-दार्ढ्यकृत्।शिरःश्रवणपादेषु तं विशेषेण शीलयेत्।(वाग्भट-सूत्र स्थान अध्याय २)अर्थात्—प्रतिदिन तेल मालिश करनी चाहिये इससे बुढ...
read moreस्नान | स्नान विधि | बिना स्नान, खायें क्यों नहीं ?
नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्याद्देवर्षिपितृतर्पणम् (मनु)अर्थात्—प्रतिदिन प्रातः स्नान करके शुचि होकर सन्ध्या वन्दन तथा देवर्षि तर्पणादि नित्य कर्म करे।हिन्दू जाति के सभी धार्मिक तथा सामाजिक कृत्यों में...
read moreआसन-विज्ञान | मृग, व्याघ्र सिंह चर्म ग्राह्य क्यों ? कपड़ा, कुर्सी , पत्थर की शिला, वर्जित क्यों ?
प्रत्येक धार्मिक कार्य के अनुष्ठान में कर्ता के लिए अमुक २ आसन पर बैठना भी, शास्त्र में आवश्यक माना गया है। यथा-शास्त्रीय-स्वरूप(क) कृष्णाजिनमखण्डम्। (दयानन्दीय सं० विधि पृष्ठ १९)(ख) आसीनासो अरुणीनामु...
read moreअमुक दिशा को ही मुख क्यों ?
प्रातः सन्ध्या पूर्वाभिमुख होकर और सायं सन्ध्या पश्चिमाभिमुख होकर करनी चाहिये, तथा देवकर्म्म पूर्व दिशा को, ऋषिकर्म्म उत्तर दिशा को और पितृकर्म्म दक्षिण दिशा को मुख करके करना चाहिए-ऐसी शास्त्रोंमें वि...
read moreतिलक धारण क्यों ? तिलक की सार्वभौम विजय
शास्त्रों में तिलक धारण भी एक आवश्यक धार्मिक कृत्य माना गया है यथा—शास्त्रीय स्वरूप(क) ऊर्ध्वपुण्ड्रं मृदा धार्य्यं, भस्मना तु त्रिपुण्ड्रकम्।उभयं चन्दनेनैव, ह्यभ्यङ्गोत्सवरात्रिषु॥(ख) शतं चैका च हृदय...
read moreमांग में सिंदूर क्यों ? श्री हनुमान् जी सिन्दूरी चोले में क्यों ?
सधवा स्त्रियों को कुंकुम के अतिरिक्त खासकर सीमन्त (मांग) में सिन्दूर लगाना चाहिए। विवाह-संस्कार के समय ही वर वधू के मस्तक में सिन्दूर लगाता है—यह शास्त्रीय प्रथा प्रायः सब देशों में प्रचलित है।अद्भुत...
read moreशिखा बन्धन क्यों ? कुशा धारण क्यों ? धर्मानुष्ठान में ही बाधक क्यों ?
समस्त धार्मिक अनुष्ठानों के आरम्भ में ग्रंथी लगाना भी सर्वथा आवश्यक माना गया है यथा—शास्त्रीय स्वरूप(क) यशसे श्रियै शिखा। (यजु.)(ख) सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च।(ग) गायत्रीमन्त्रेण शिखां बद्ध्वा।...
read moreसंकल्प क्यों ? संकल्प में जल ग्रहण क्यों ? तीन आचमन क्यों ?
प्रत्येक धर्मानुष्ठान के आरम्भ में संकल्प परमावश्यक है—यह सर्वतन्त्र सिद्धान्त है। मनुस्मृति (२।३) में लिखा है कि—संकल्पमूलः कामो वै यज्ञाः संकल्पसंभवाः।व्रता नियमधर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृताः॥अर्थ...
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प्राणायाम | प्राणायाम क्यों ?
हमने पीछे कहा है कि सन्ध्या का मुख्य तत्त्व प्राणायाम है। प्राणायाम का तात्पर्य साधारणतया तो प्राणों का व्यायाम है, किन्तु इसका वास्तविक तात्पर्य है प्राणशक्ति पर विजय। शास्त्रकारों ने लिखा है—प्राणास...
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प्राणायाम के पांच रहस्य
(१) शारीरिक विकास—यद्यपि प्राणायाम का सम्बन्ध मानव जीवन के विभिन्न उपादानों के साथ है। मानव शरीर के विकास से प्रारम्भ करके मनुष्य को अमर बना देने की समस्या के हल तक उसकी पहुँच है, तथापि प्राणायाम का फ...
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सूर्योपस्थान क्यों ?
सन्ध्या का उपसंहारात्मक अन्तिम अनुष्ठान सूर्योपस्थान है। साधक सूर्याभिमुख खड़े होकर सूर्य भगवान् को जल की तीन अंजलि प्रदान करता है और दोनों हाथ उत्तान रूप में फैलाकर सविता देव की स्तुति करता है। वेद म...
read moreवैदिक सन्ध्या बनाम आर्यसमाज !
यहां प्रसङ्ग वश पाठकों को यह बता देना भी अनुचित न होगा, कि सन् १८७५ से प्रादुर्भूत हुये, नये वैदिकधर्मी आर्यसमाजी महाशयों की भी एक छपी हुई सन्ध्या केवल एक पैसा कीमत में यत्र-तत्र बिकती है। इस पुस्तक क...
read moreमाला आवश्यक क्यों ? मध्यमांगुली से ही क्यों ? तुलसी रुद्राक्ष आदि की क्यों ?
शास्त्र में लिखा है कि—विना दर्भैश्च यत्कृत्यं यच्च दानं विनोदकम्।असङ्ख्यया तु यज्जप्तं तत्सर्वं निष्फलं भवेत्॥(अङ्गिरा स्मृति)अर्थात्—बिना कुशा के जो तत्तद् धर्मानुष्ठान, और बिना जल संस्पर्श के जो दा...
read moreमाला कण्ठी गले में क्यों ? माला के एक सौ आठ दाने क्यों ? श्री १०८ क्यों ?
प्रसंग-वश यहां यह भी प्रकट कर देना अनावश्यक न होगा; कि गले में माला कण्ठी बांधने की भी शास्त्र में व्यवस्था मिलती है यह क्यों ? इसलिये कि—(१) अधिक जाप करने वाले व्यक्ति को—खासकर जो उपांशु=चुपचाप ओष्ठ...
read moreभोजन | सबको खिलाकर खाओ
शास्त्रीय-स्वरूप(क) अन्नं ब्रह्म इत्युपासीत।(ख) उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः।भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत्॥पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन्।दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च...
read moreवैश्वदेव-आदर्श-समाजवाद | बलिवैश्वदेव का संक्षिप्त संस्करण
आज कथित समाजवादी उदरम्भर पाश्चात्य देशों की झूठन समेटकर भारत में भी तादृश समाज रचना की रेतीली दीवार खड़ी करने का विडम्बना पूर्ण प्रयास कर रहे हैं, परन्तु यदि वे सनातन धर्म की समाज रचना के एक साधारण नि...
read moreदरिद्रनारायण संस्करण | भोग लगाने से क्या लाभ ?
त्रिकालज्ञ महर्षि आज के युग से सर्वथा सुपरिचित थे। यह तो केवल हमसे अल्पज्ञ प्राणी ही 'किं भविष्यति' के विषय में किंकर्तव्य विमूढ़ हैं। परन्तु अपनी 'ऋतम्भरा' प्रज्ञा द्वारा जिन्होंने हस्तामलक की भांति...
read moreभोजन के समय पालनीय नियम | नियमों का स्पष्टीकरण
अनेक शास्त्रों का मथन करने पर जो भोजन करने के समय अवश्य पालनीय नियम मिलते हैं—हम पाठकों के ज्ञान की अभिवृद्धि के लिये उन्हें यहां अंकित करते हैं—'आचारादर्श' ग्रन्थ में उक्त महर्षियों के नाम से ये प्रम...
read moreभोजन के नियम पालन से आयुष्य वृद्धि | कितनी बार चबाकर खाना चाहिए ?
यह बात कोई भी प्रतिपक्षी स्वीकार कर सकता है, कि आज भी भोजन की जो मर्यादा वैष्णवों में—उनमें भी खासकर श्री सम्प्रदाय में प्रचलित है, यह शास्त्रोक्त आदर्श के सर्वाधिक निकट है, क्योंकि पीछे हमने भोजन के...
read moreउक्त विधि से भोजन करने के लाभ । पेट पर हाथ फेरना क्यों ?
हमने जो शास्त्रानुमोदित भोजनविधि लिखी है तदनुसार भोजन करने से भोक्ता को निम्नलिखित मुख्य लाभ होंगे—(१) भोजन को अन्न रूपी ब्रह्म की उपासना समझने से यह भी एक धार्मिक अनुष्ठान बन जाएगा, जिससे मनुष्य की ध...
read moreजलार्द्र अंगुली आंखों पर क्यों लगायें ? चंक्रमण (चहल कदमी) क्यों ?
प्रक्षालित गीली करांगुलियों द्वारा नेत्रों को छूने का प्रत्यक्ष लाभ तो तत्काल ही अनुभव होने लगता है। भोजन के समय मुख यन्त्र के व्यापार संलग्न रहने के कारण स्वभावतः समस्त शरीर में और खासकर नेत्रों में...
read moreबांई करवट से लेटना क्यों ? दो काम करने और दो नहीं करने | दिन में क्यों न सोए ?
चंक्रमण के बाद भोक्ता को बांई करवट से लेटना चाहिये—ऐसी शास्त्र की आज्ञा है यथा—वामपार्श्वेण संविशेत्।अर्थात्—भोजनानन्तर बांई करवट से विश्राम करना चाहिये।हम प्राणायाम प्रकरण में यह प्रकट कर आये हैं, कि...
read moreअन्यान्य उपयोगी नियम | लांग खोलकर मूत्र त्याग करे | लांग बांधना
प्रतिदिन पालन करने योग्य कुछ आवश्यक नियमों का भी हम यहाँ दिग्दर्शन कराते हैं, जिससे सर्व साधारण को लाभ हो।अमुक्त्वा पश्चिमां कक्षां मूत्रयेद्योद्विजाधमः।रेतोधाः पितरस्तस्य, तन्मूत्रक्लेशपूरिताः॥(शिष्ट...
read moreरात्रि-चर्या | सोते समय दक्षिण दिशा को पांव क्यों नहीं?
प्रातःकाल की भांति सायंकाल भी सन्ध्या वन्दन भगवदाराधन आदि कृत्य विधिवत् करने चाहियें। एक ही प्रहर के अन्दर दो बार भोजन नहीं करना चाहिए, ऐसी शास्त्राज्ञा है यथा—याममध्ये न भोक्तव्यम्।आयुर्वेद शास्त्र म...
read moreसंस्कार | संस्कार कब से ? संस्कार की आवश्यकता
संसार में दो प्रकार की वस्तुएँ हैं एक प्राकृत, दूसरी संस्कृत। प्रकृति—आदि पुरुष की कार्यरूपाशक्ति—ही अखिल विश्व का मूल है। सम्पूर्ण दृश्यादृश्य पदार्थ मानो इसी अबोध बालिका के स्वरचित खिलौने हैं, जिनसे...
read moreसंस्कार क्यों ? संस्कार कितने ?
पीछे बतलाया गया है, कि 'संस्कार' मानव प्रकृति का स्वाभाविक अंग है। किन्तु कैसे वह मानव प्रकृति का अंग बना इसके तीन कारण हैं। प्रकृति से प्राप्त होने वाली प्रत्येक वस्तु हमारे लिये उसी रूप में उपयोगी न...
read moreस्वस्तिवाचन और शान्ति पाठ | हरिः ॐ क्यों ?
प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान के आदि में वातावरण की विशुद्धता के लिए सर्व प्रथम तार स्वरेण स्वस्तिवाचन और शान्तिपाठ करना आवश्यक है। इस कृत्य में यूँ तो भी सभी समुपस्थित अधिकारी सज्जन सम्मिलित हो सकते हैं,...
read moreश्री गणेश प्रथम पूज्य क्यों ? गणेश पूजन, यत्र तत्र सर्वत्र
(आदौ गणपतिं वन्दे विघ्ननाशं विनायकम्)श्रीगणेश जी महाराज का—प्रत्येक शुभाशुभ कार्य के आरम्भ में आस्तिक हिन्दू समाज, पूजन वन्दन एवं ध्यान अपना परम कर्तव्य समझता है। योगी याज्ञवल्क्य ने अपनी स्मृति में ल...
read moreअहिन्दुओं में परोक्षतया गणेश का ही पूजन | शास्त्रीय-स्वरूप
ग्रीक (Greece) यूनान के निवासी श्रीगणेशजी को 'ओरेनस' (Ouranos) नाम से पूजते हैं उनके प्राचीन धर्मग्रन्थों में ओरेनस का बड़ा भारी महत्व वर्णित है। हिन्दू-धर्म ग्रन्थों के अनुसार श्री गणेश जी 'लाक्षासिन...
read moreगणेशपूजन और एकेश्वरवाद
(एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति)हिन्दू धर्मावलम्बी आदि काल से एक मात्र परमात्मा की ही उपासना करते हैं जो लोग हिन्दू धर्म पर यह आक्षेप करते हैं “कि हिन्दू लोग एक ईश्वर को छोड़कर अनेक देवी देवताओं और यहां त...
read moreहाथी का शिर क्यों ? हाथी की आंख क्यों | लम्बी नाक क्यों ? बड़े कान क्यों ?
गणेश गायत्री में लिखा है कि—तत्पुरुषाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।अर्थात्—हाथी के समान मुखवाले—वक्रतुण्ड और एकदांत वाले गणेश का हम मनन और ध्यान करते हैं वह हमें सन्मार्ग में प्...
read moreहाथी की जीभ क्यों ? हाथी के दांत क्यों ?
सब विघ्नों को दूर करने किंवा उसको बुलाने में जिह्वा का सर्वाधिक हाथ है। एक शब्द अनुकूल निकल गया तो बुराई पर तुला हुआ घोर शत्रु भी मोम बन गया, एक शब्द प्रतिकूल बोला गया, कि अपने पसीने के स्थान में खून...
read moreआकण्ठ नर-शरीर क्यों ? लम्बोदर क्यों ? मूषक वाहन क्यों ? ऋद्धि सिद्धि सेविकाएँ ?
अपने किसी कार्य्य में विघ्न न चाहनेवाले पुरुष के लिए उचित है, कि वह स्पष्टवादी हो, मानव हृदय रखता हो, मनुष्योचित कर्म्मकलाप में सतत निरत रहे एवं उसकी गति विधि मानवोचित होनी चाहिए। उक्त गुणों को सीखने...
read moreगणेश की विचित्र उत्पत्ति
पौराणिक स्वरूप—पुराण ग्रन्थों में गणेश की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई कथाएँ उपलब्ध होती हैं, यद्यपि कल्प भेद के कारण तत्तत् कथानकों में किञ्चित् भेद भी पाया जाता है, परन्तु मूल बातें सभी कथाओं में समान...
read moreवैदिक स्वरूप | आध्यात्मिक-भाव
(क) रुद्रो वै ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च देवानाम्। (कौषीतकी २५।१३)(ख) ततः पतिश्च पत्नी चाभवताम्। (शतपथ १४।३।४।४)(ग) अस्माद् वीर्य्यमुदक्रामत्। (शतपथ ७।१।२।१-६)(घ) ततो विराडजायत। (यजु० ३१।५)(ङ) …त्वं कुमारः…...
read moreस्वरूप विवेचन | आधिदैविक-भाव
गणपति के स्वरूप में नर तथा गज इन दोनों का ही सामञ्जस्य पाया जाता है। यह मानो प्रत्यक्ष ही परस्पर विरोध से प्रतीयमान तत्पदार्थ तथा त्वं पदार्थ के अभेद को सूचित करता है। क्योंकि तत्पदार्थ सर्व जगत्कारण...
read moreविघ्न-विनाशक गणेश | क्या गणेश अनार्य्य देवता है ?
इस तरह मन्त्र प्रतिपाद्य गणपतितत्त्व सर्व विघ्नों का विनाशक है। अतएव गणपत्यथर्वशीर्ष के नवें मन्त्र में—"विघ्ननाशिने शिवसुताय वरदमूर्तये नमः" ऐसा आया है। सायणाचार्य ने इसका व्याख्यान करते समय "कालात्म...
read moreगणेश के द्वादश नाम | मनोमूर्ति गणेश | गणेश विश्वतोमुख प्रणव है|
गणेश परमात्मा का विघ्न-नाशक स्वरूप है, इसीलिए प्रत्येक कार्य के आरम्भ में सर्वप्रथम गणेश जी के पूजन व ध्यान का शास्त्रीय आदेश है, विघ्न—दैवी और लौकिक—दो प्रकार के होते हैं, दैवी विघ्नों की निवृत्ति के...
read moreग्रह पूजन विज्ञान | ब्रह्माण्ड भर से भाईचारा | शास्त्रीय-स्वरूप
सनातनधर्म्मी प्रत्येक शुभाशुभ कर्म के प्रारम्भ में नवग्रह पूजन अवश्य करता है, यह क्यों?योगी याज्ञवल्क्य ने अपनी स्मृति में मन्त्र विनियोगपूर्वक ग्रह-शान्ति प्रकरण लिखा है, यथा—श्रीकामः शान्तिकामो वा ग...
read moreआवाहन करने से ग्रह कैसे आ सकते हैं ? ग्रह मनुष्य पर कैसे चढ़ जाते हैं ?
सूर्यादि ग्रह हमारी पृथ्वी से लाखों योजन दूर हैं और लाखों गुणा बड़े हैं यह सभी वैज्ञानिक जानते हैं, सो सनातनधर्मियों के डेढ़ बालिस्त के मण्डप में अथवा चुटकीभर चावलों के छूमंतर में कैसे समा सकते हैं? औ...
read moreक्या पोप जी ग्रहों के एजेन्ट हैं ?
कहा जाता है कि अमुक वस्तु दान देने से ग्रह टल जाएगा। क्या ग्रह घूसखोर हैं और पोप जी ग्रहों के एजेण्ट हैं? जो इनको पाकेट भरने से सब काम ठीक बन जाएगा।मालूम होता है कि महाशय जी को यह विदित नहीं है कि अचा...
read moreअण्ड-पिंड मूलक आयुर्वेद
यहां इतना और भी अधिक समझ लेना चाहिए कि ब्रह्माण्ड व्याप्त तत्तद् दैवी शक्तियों का केवल 'मानव-पिण्ड' पर ही प्रभाव नहीं पड़ता अपितु घास-फूस मिट्टी पत्थर पानी जैसे जड़ पदार्थों पर भी पड़ता है। क्योंकि ये...
read moreहवन-विचार | देवताओं की तृप्ति से क्या लाभ ?
आरब्ध कर्म के निर्विघ्न परिसमाप्त्यर्थ जैसे प्रत्येक संस्कार के प्रारम्भ में गणपत्यादि देवों का पूजन आवश्यक है इसी प्रकार प्रायः सभी धार्मिक अनुष्ठानों में हवन भी तदङ्गभूत होने के कारण करणीय है यह सर्...
read moreगर्भाधान संस्कार विचार | गर्भाधान-संस्कार क्यों ? गर्भाधान क्रिया ज्ञान
वैदिक स्वरूप(क) गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति गर्भं ते अश्विनोभा धत्तां पुष्करस्रजा।(ख) गर्भं ते मित्रावरुणौ गर्भं देवो बृहस्पतिः। गर्भं त इन्द्रश्चाग्निश्च गर्भं धाता दधातु ते॥ (अथर्व ५, २५,...
read moreस्त्री की अनुमति— | पर्वादिकों में सहवास निषेध—
नारी विषयभोग की पूर्ति का साधन नहीं है, यह सृष्टि सौन्दर्य की पवित्र प्रतिमा है। विश्व की समस्त सुकुमार भावनाओं को उद्ग्रथित करके विधाता ने नारी की सृजन किया है। प्रेम, दया, माया, ममता धैर्य और कोमलता...
read moreअमुक रात्रि में सहवास निषेध क्यों ? अमुक रात्रि में अमुक संतान क्यों ?
भौतिक विलास परिपूर्ण आधुनिक जगत् में उपरोक्त प्रश्न कोई आश्चर्य नहीं है। Eat drink and be marry या 'यावज्जीवेत्सुखं जीवेत्' जैसी सुन्दर एवं सरल फिलासफी के मुकाबले मनु के उपरोक्त विधि निषेधमय नियम, ज्व...
read moreरजस्वला अशुचि क्यों ?
गर्भाधान संस्कार में प्रसंगवश रजस्वला स्त्री के विषय में कुछ लिखना अप्रासंगिक न होगा। रजस्वला स्त्री के विषय में शास्त्रकारों ने लिखा है—एवं शुद्धशुक्रार्तवा ऋतौ प्रथमदिवसात् प्रभृति ब्रह्मचारिणी दिवा...
read moreपुंसवन संस्कार विचार | पुंसवन के लिए दो अव्यर्थ उपचार
(क) पुमाँसौ मित्रावरुणौ पुमाँसावश्विनावुभौ पुमानग्निश्च वायुश्च पुमान् गर्भस्तवोदरे।(ख) पुमानग्निः पुमानिन्द्रः पुमान् देवो बृहस्पतिः। पुमाँसं पुत्रं विन्दस्व तं पुमाननु जायताम्। (साम० मं० ब्रा० १।४।९...
read moreसीमन्तोन्नयन संस्कार | सीमन्त की इति-कर्तव्यता का प्रभाव | जात कर्म संस्कार विचार
येनादितेः सीमानं नयति प्रजापतिर्महते सौभगाय।तेनाहमस्यै सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि॥(ऋग्वेद)अर्थात्—जिस प्रकार प्रजापति ने देवमाता अदिति का सीमन्तोन्नयन किया था, उसी प्रकार इस गर्भिणी का सी...
read moreमाता या धाय—किसका दूध ? मधु घृत क्यों चटायें ?
विदेशी शिक्षा तथा वहां की सभ्यता के प्रभाव से आज भारतीय स्त्रियों में जन्म के तुरन्त बाद पुत्र को किसी धाय (दूध पिलाने वाली) को सौंप देने या उसे ऊपरी दूध—जिसके लिए कि अधिकतर विलायती डब्बों का दूध पसन्...
read moreनामकरण संस्कार विचार | नामकरण संस्कार क्यों ? नाम कैसा हो ? नामकरण कब ?
किसी पदार्थ के निर्णय में उसका नाम भी गुण अथवा अवगुण बताने का एक साधन माना जाता है। प्राचीन काल से यह प्रथा चली आती है कि किसी भी पदार्थ-विशेष या व्यक्ति-विशेष का वैसा ही नामकरण हो जो कि अधिक से अधिक...
read moreनिष्क्रमण संस्कार विचार
शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ, शं ते सूर्य आतपतु शं वातो वातु ते हृदे। शिवा अभिक्षरन्त्वापो दिव्या पयस्वतीः। (अ० ८।२।१४)अर्थात्—हे बालक ! तेरे निष्क्रमण काल में द्युलोक और पृथ्वी लोक कल...
read moreअन्न प्राशन संस्कार विचार
शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबला सावदो मधौ।एतौ यक्ष्मं विबाधेते, एतौ मुञ्चतो अंहसः॥(अथर्व० ८।२।१८)अर्थ—हे बालक, जौ और चावल तुम्हारे लिए बलदायक तथा पुष्टिकारक हों, क्योंकि यह दोनों वस्तुएं सभी प्रकार के यक्...
read moreचूडाकरण संस्कार विचार
निवर्तयाम्यायुषेऽन्नाद्याय प्रजननाय रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय। (यजु० अ० ३ म० ३३)अर्थात्—हे बालक दीर्घायु के लिए, अन्न ग्रहण में समर्थ बनाने के लिए, उत्पादन शक्ति के लिए, ऐश्वर्य की वृद्धि के...
read moreशिखा क्यों ? शिखा और संसार की विभिन्न जातियें
वर्तमान भौतिक युग में जब कि मनुष्य के सम्पूर्ण कार्य-कलाप बिना मतलब के कभी नहीं होते, जब कि प्रत्येक वस्तु का प्रत्यक्ष दृष्ट लाभ उसमें प्रवृत्ति का कारण होता है तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि शिखा क्यो...
read moreउपनयन संस्कार विचार
वैदिक स्वरूपआचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः।तं रात्रिस्तिस्र उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभियन्ति देवाः॥(अथर्व० ११।५।७)अर्थ—आचार्य बालक का उपनयन संस्कार करके उसे ब्रह्मचर्य व्रत का आदेश...
read moreक्या यज्ञोपवीत धारण काम्य है ? यज्ञोपवीत क्या है ? यज्ञोपवीत कब से ?
यज्ञोपवीत के विषय में आज अनेक भ्रान्तियां भी जनसाधारण में फैली हुई हैं। भगवान मनु के आदेशानुसार जबकि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य बालकों का उपनयन ८,११,१२ वर्ष की अवस्था में ही होना चाहिए था तब वह आज बीस पच...
read moreसंस्कार का संक्षिप्त स्वरूप | आधुनिक गवेषकों के दृष्टिकोण से—
इस संस्कार को उपनयन, यज्ञोपवीत, व्रतबन्ध मौञ्जीबन्धन आदि किसी भी नाम से यथेच्छ पुकारा जा सकता है। यह सब नाम यों ही नहीं पड़ गये हैं, किन्तु इस संस्कार के समय होने वाली तत्तत् क्रियाओं के कारण अन्वर्थ...
read moreयज्ञोपवीत की व्यापकता
यज्ञोपवीत के सदृश ही सूत्रनिर्मित चिह्न विशेष प्रायः सभी देशों और सभी जातियों में पाये जाते हैं जो इस बात के सूचक हैं कि एक समय सभी जातियें आर्य-जाति का अभिन्न अंग थीं, किन्तु कालान्तर में अशिक्षावश अ...
read moreउपनयन कब ? काल विभाग क्यों
स्मृतिकारों ने उपनयन के लिये वर्णों के आधार पर पृथक्-पृथक् समय का निर्देश किया है, यथा—गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम्।गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः॥(मनु २-३६)अर्थात्—ब्राह्मण...
read moreउपनीत के लिए आवश्यक नियम
संसार में प्रत्येक वस्तु की सफलता का रहस्य उसके नियम पालन पर ही निर्भर है। इसके बिना इस वस्तु से लाभ न हो यह तो सुसम्भव है ही किन्तु कभी २ तो वह इतनी विपरीत फलदायक हो जाती है कि जिसकी हम कल्पना भी नही...
read moreशौचादि के समय कान पर क्यों ? यज्ञोपवीत निर्माण विधि—
गृह्यसूत्रकारों ने शौच लघुशंका आदि के समय यज्ञोपवीत को कान पर लपेटने का विधान किया है, जैसा कि—दिवासन्ध्यासु कर्णस्थो ब्रह्मसूत्र उदङ्मुखः।कुर्यान्मूत्रपुरीषे च रात्रौ चेद्दक्षिणामुखः॥—इत्यादि शास्त्र...
read more९६ चप्पे क्यों ?
सब से प्रधान प्रश्न यह है कि यज्ञोपवीत का परिमाण ९६ चप्पे ही क्यों है ? ९५ या ९७ क्यों नहीं, एकाध ज्यादा या कम हो गया तो उससे क्या हानि ? कम से शायद कुछ हानि हो सकती है किन्तु 'अधिकस्याधिकं फलम्' तो ह...
read moreतीन सूत और त्रिवृत क्यों ? ब्रह्मग्रन्थि क्यों ? दो यज्ञोपवीत क्यों ?
तीन की संख्या ऐहलौकिक और पारलौकिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक सभी क्षेत्रों में अपना विशेष स्थान रखती है। ऋग् यजु, साम-वेद तीन, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यु,-लोक तीन, सत्त्व, रज तम-गुण तीन, ब्रह्मा, विष्णु महे...
read moreसमावर्तन संस्कार विचार | विवाह संस्कार विचार
वैदिक-स्वरूपयुवा सुवासाः परिवीत आगात्स उ श्रेयान् भवति जायमानः।तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः॥(ऋ० ३।८।४)जब पुरुष यज्ञोपवीत के अनन्तर पूर्ण ब्रह्मचर्य से युक्त होकर युवावस्था प्राप्त कर...
read moreविवाह कितने हैं ? ब्राह्म विवाह बनाम प्रेम विवाह
विवाह विधि पर विचार करते हुए भगवान् मनु ने भिन्न २ जातियों एवं देशों में होने वाले विवाहों को अष्टविध विवाहों के अन्तर्गत परिगणित किया है। उनके नाम क्रम से ये हैं—ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्त...
read moreविवाह कब ? विवाह क्यों ? विवाह संस्कार की रूपरेखा
विवाह की अवस्था के विषय में आज संसार में एक विचित्र हास्यास्पद स्थिति दिखलाई देती है। एक ओर हमें इस प्रकार के विवाह देखने को मिलते हैं जिनमें वर वधू की अवस्था इतनी छोटी होती है कि उन्हें उस विवाह में...
read moreवानप्रस्थ विचार | संन्यास आश्रम विचार
मनुष्य का जन्म केवल कोल्हू के बैल की भांति सदैव घर गृहस्थी में जुते २ मर जाने के लिए नहीं हुआ है, किन्तु शास्त्र आयु को चार भागों में बांटकर यथासमय सभी मानव कर्तव्यों के पालन का आदेश करता है। आयु का प...
read moreमृत्यु-सज्जा-विचार | गोबर से लेपन क्यों ?
हमें यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं, आज के संसार में मनुष्यों को जीना तो आता ही नहीं, परन्तु शोक तो यह है कि उन्हें मरना भी नहीं आता। जीते हैं तो पशुओं की भांति हीन दीन दशा में, और मरते हैं तो रोते झी...
read moreकुशा आस्तरण क्यों ? भूमि पर बिस्तर क्यों ? चौकी तख्त क्यों नहीं ?
पूर्वोक्त स्थापना के अनुसार मुमूर्षु मनुष्य के शरीर और भूमि के मध्य में शुचि पदार्थों का अन्तर होना चाहिए। इसके निमित्त जैसे गोबर का चौका आवश्यक है, इसी प्रकार 'द्विर्बद्धं सुबद्धं भवति' के न्यायानुसा...
read moreउत्तर दिशा को शिर क्यों ? चित क्यों लेटाएँ ? शिर के नीचे घुटना क्यों ? मुमूर्षु स्वयं अपना भला कर सकता है ?
हम इसी ग्रन्थ के पृष्ठ २९४ पर अहोरात्रचर्या अध्याय के शयन प्रकरण में यह सिद्ध कर चुके हैं कि 'जीवन काल में मनुष्य को दक्षिण दिशा को पांव करके कभी नहीं सोना चाहिए'—परन्तु मृत्यु के समय इस के विपरीत दक्...
read moreगंगाजल और तुलसीदल क्यों ? नाम स्मरण क्यों ? ॐ—या राम नाम ? दीप दान क्यों ?
जब रोगी का उपचार कर २ थक जाते हैं, और यह भान होने लगता है कि अब रोगी का शरीर न रहेगा तब सब बुद्धिमान् एक स्वर से यही कहने लगते हैं कि अब मुख में 'गंगाजल, और तुलसीदल डालो'।गंगाजल और तुलसीदल का यह अन्ति...
read moreअन्त्येष्टि संस्कार विचार | शव को जलाना ही क्यों चाहिये ?
अन्यान्य अहिंदू मतों में जहाँ मृत शरीर को जमीन में दफना देने=गाड देने मात्र की प्रथा पाई जाती है वहाँ आर्य शास्त्रों में भूमि में गाडना, अग्नि में फूंकना, जल में बहाना और निर्जन वन में छोड़ देना—ये चा...
read moreकपाल क्रिया क्यों ? सचैल स्नान क्यों ? अग्निस्पर्श और निम्बपत्र चवर्ण क्यों ? अस्थियों को गंगा में क्यों डालें ?
मृतक शरीर के इस हद्द तक जल जाने पर कि उसकी कपालास्थि परिपक्व होने लगे तब अर्थी के लम्बे डंडे से कपाल स्थान को तीन बार स्पर्श करते हुवे ब्रह्मरन्ध्र स्थान को अति चोट से फोड़ दिया जाता है जिसे 'कपाल क्र...
read moreप्रकीर्णाध्यायः (चौथा अध्याय)
वैदिक्यो या मुहूर्ताद्या, नाना शास्त्रमताः क्रियाः।हेतुवादैः परिष्कृत्य, प्रदर्श्यन्तेऽत्र सप्रमाः॥विगत अध्यायों में वे सिद्धान्त—जो ध्रुव की भांति सदैव अटल हैं तथा प्रातःकाल से शयन पर्यन्त की समस्त श...
read moreमुहूर्त विज्ञान
वेदादि शास्त्रों में—सूत्र ग्रन्थों में और तदुपजीवी ज्योतिष शास्त्रों में प्रत्येक शुभाशुभ कर्म के लिए तदनुकूल काल साधन विज्ञानके आधार पर मुहूर्त साधन का विस्तृत विधान विद्यमान है तदनुसार प्रत्येक हिन...
read moreअन्यान्य मतों में मुहूर्त साधना
मुहूर्त साधने की भावना अन्यान्य मतों में भी पाई जाती है, वे भी अमुक दिनमें अमुकसमय में ही अमुक कार्य करने को महत्त्व देते हैं। ईसाई रविवार को पवित्र मानते हैं—बाईबिल के लेखानुसार छः दिन में खुदाने सृष...
read moreवैज्ञानिक विवेचन
हम पीछे 'अण्ड-पिण्ड-वाद' की व्याख्या में यह सिद्ध कर चुके हैं कि हमारा यह मानव पिण्ड वस्तुतः ब्रह्माण्ड का ही संक्षिप्त संस्करण है तदनुसार पिण्डको सबल बनाने के निमित्त जितने संस्कार किंवा पौष्टिक शान्...
read moreमिस मियो की मरम्मत
हम 'अण्ड पिण्डवाद' में यह सिद्ध कर आए हैं कि हमारे शरीर का सब कुछ इन्हीं देवताओं की देन है। यदि गवारूभाषा में सीधा कहना चाहें तो यूं कह सकते हैं कि जो शक्तियां हमें सब कुछ देती हैं वे ही 'देवता' हैं औ...
read moreमानव पिण्ड—शामिल बाजा
कहा जाता है कि एक बार किसी महाराजा के दरबार में गाना बजाना हो रहा था, परन्तु महाराज किसी शासन सम्बन्धी अड़चन की उधेड़ बुन में पड़े आज इस आनन्द में भी गम्भीर मुद्रा बनाये सुस्त बैठे थे। चतुर मन्त्री ने...
read moreगुरु शुक्रास्त वर्जित क्यों ?
गुरु और शुक्र के अस्त हो जाने पर प्रायः सभी शुभ कर्म खासकर विवाहादि स्त्री सम्बन्धी कृत्य वर्जित हैं, क्यों ?—इसलिये कि 'अण्डपिण्ड सिद्धान्त' के अनुसार मानव पिण्ड में 'ज्ञान' गुरु की देन है और 'वीर्य'...
read moreसिंह गत गुरु में विवाह क्यों न हो ?
तेरह वर्ष के बाद जब बृहस्पति सिंह राशि में आता है तब विवाह नहीं होते, क्यों ?—इसलिये कि—'अण्ड पिण्ड वाद' के अनुसार सूर्य पिण्ड से पचास कोटि योजन सब ओर परिधि वाले आकाश प्रदेश को एक ब्रह्माण्ड कहते हैं...
read moreधन मीन के सूर्य में मलमास क्यों ?
धन और मीन राशि के सूर्य में भी विवाहादि कृत्य नहीं होते। पौष और चैत्र को इसी कारण से मलमास कहने की प्रथा प्रसिद्ध है। यहां भी सिंह गत बृहस्पति वाला विज्ञान ही पूरा का पूरा घटता है अन्तर केवल इतना है क...
read moreमीन के सूर्य में उपनयन क्यों ?
मीन के सूर्य में अन्य सब कृत्य जहां वर्जित हैं वहां ब्राह्मण कुमार के उपनयन संस्कार के लिये मीन बहुत प्रशस्त है, यह क्यों ? इसलिए कि 'उपनयन' का तात्पर्य है शिष्य का गुरु के उप=समीप नयन=प्रापण ! यही इस...
read moreआर्यसमाज में विचित्र विवाह मुहूर्त !
आर्यसमाज प्रवर्तक स्वामी दयानन्द ने प्रायः सब संस्कारों में बीना सींग पूंछ हिलाए गृह्यसूत्रों में लिखे तत्तत् मुहूर्त को ही स्वीकार किया है, परन्तु विवाह मुहूर्त जहां—'उदगयन आपूर्यमाणपक्षे पुण्यनक्षत्...
read moreयात्रा विज्ञान
वेदादि शास्त्रों में यात्रा कालीन मुहूर्त साधने का उल्लेख विद्यमान है। प्रत्येक मनुष्य को यात्रा करनी पड़ती है, इसलिए इस प्रसङ्ग में भी सर्व साधारण को उचित परामर्श देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं।शास्त...
read moreवैज्ञानिक विवेचन
हम पीछे सिद्ध कर चुके हैं कि 'अण्ड-पिण्ड-वाद' सिद्धान्त के अनुसार तत्तत् ग्रह नक्षत्र पिण्डों का मानव पिण्ड पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है और यात्रा के समय भी उन सब की अनुकूलता सापेक्ष्य है। अपनी २ कक्...
read moreअहिन्दुओं पर प्रभाव क्यों नहीं ?
यहां एक आशङ्का यह भी की जा सकती है कि अहिन्दु लोग यात्रा मुहूर्त के बखेड़े में नहीं पड़ते, उन पर कुछ भी बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। हम ऐसी आशङ्का करने वालोंसे पूछना चाहते हैं कि हमने 'अण्ड पिण्ड' व्यवस्था...
read moreदिक् शूल क्यों ?
शनौ चन्द्रे त्यजेत्पूर्वां दक्षिणाञ्च दिशं गुरौ।सूर्ये शुक्रे पश्चिमाञ्च बुधे भौमे तथोत्तराम् ॥अर्थात्—शनि सोम को पूर्व में, गुरु को दक्षिण में, सूर्य शुक्र को पश्चिम में, और बुध मङ्गल को उत्तर दिशा म...
read moreवार क्रम विज्ञान
वार क्या है ? वे सात ही क्यों हैं ? और इन का यही क्रम क्यों है ?—इस सम्बन्ध में यह जान लेना आवश्यक है कि हमारे ब्रह्माण्ड का प्रधान अवलम्ब सूर्य भगवान् हैं। इसी भांति अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों के भिन्न...
read moreचौथा ग्रह ही वाराधिपति क्यों ?
जिस वार में सूर्योदय होता है उस समय 'होरा' भी उसी ग्रह की रहती है। एक अहोरात्रि में बारह लग्न होते हैं। और आधे लग्न को खगौलिक परिभाषा में 'होरा' कहते हैं। इस तरह अहोरात्र में चौबीस 'होरा' होती है नवीन...
read moreक्या मरना भी मुहूर्त में ही
मुहूर्त विज्ञान उपक्रम में हमने यह भी चर्चा की थी, कि न केवल विवाहादि शुभ कृत्यों के लिये हम मुहूर्त साधते हैं अपितु हमारे पूर्व पुरुष तो आज की भांति बिना मुहूर्त मरने तक के लिए भी प्रस्तुत नहीं थे। अ...
read moreवैज्ञानिक विवेचन
उत्तरायण शुक्लपक्ष और दिन में मरने से मोक्ष क्यों मिलता है, इसका कारण 'अण्डपिण्ड' सिद्धान्त के अनुसार भली प्रकार मनन किया जा सकता है। मृत्यु के समय यदि प्राण शक्ति का प्राबल्य हो तो वह जीवन उन्मुक्त ह...
read moreअभिवादन विज्ञान
प्रायः सभी देशों सभी जातियों और सभी वर्गके लोगों में एक दूसरे का सम्मान सत्कार अभिवादन करने की परिपाटी अभी तक प्रचलित है। मुसलमान इसे दुवा, सलाम और ताजीम के नाम से स्मरण करते हैं, ईसाई 'ऐटिकेट' बोलते...
read moreअभिवादन क्यों करे ?
अब प्रश्न उपस्थित होता है कि आखीर अभिवादन करना ही क्यों चाहिए ? इससे क्या लाभ होता है ? क्यों व्यर्थ कवायद परेड की जाय ? इत्यादि प्रश्नों के समाधान से लिए सर्वप्रथम हमें सभी मत-मतान्तरों की प्रणाम विध...
read moreईसाई प्रथा अव्यवहार्य
सर्वप्रथम शिष्टाचार की पुतली मिस मेयो के भाई बान्धवों की ही प्रणाम-विधि पर विचार करते हैं। ईसाइयों में—प्रातःकाल परस्पर 'गुड मार्निंग' मध्याह्न में 'गुड नून' दिन ढले 'गुड ईवनिङ्ग' और रात में 'गुड नाइट...
read moreमुस्लिम प्रथा रोगों का घर
एक मुसलमान दूसरे को 'अज सलामालेकम' कहता है, तो उत्तर में दूसरा बोलता है 'वालेकम सलाम ! इनके शब्दों पर हमें इतनी आपत्ति नहीं, जितनी कि—उपर्युक्त शब्द बोलते हुए एक-दूसरे के हाथ को अपने हाथ में थामकर घर्...
read moreआर्यसमाजी गए बीते ?
अभिवादन प्रथा के सम्बन्ध में सबसे गए बीते आर्यसमाजी हैं। कहने को तो वे अपने आपको बड़े तर्कतोमर तीसमारखां समझते हैं, परन्तु वास्तव में वे सुस्पष्ट असत्य पर भी आमरण हठ ठानने वाले जटिल जन्तु हैं, जो सौ ब...
read moreनमस्ते कहना पाप !
अपने से बड़े को 'तू' कहने पर जो पाप होता है धर्मशास्त्र में उसका सुस्पष्ट प्रायश्चित लिखा है, यथा—(क) हुंकारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वंकारं च गरीयसः।स्नात्वानश्नन्नहः शेषमभिवाद्य प्रसादयेत् ॥(मनु० ११।२०...
read moreसनातन धर्मी प्रथा
समस्त मतवालों की अभिवादन की प्रथाओं का निरूपण करने के अनन्तर अब हम क्रम प्राप्त सनातनधर्मी प्रथा और उससे होनेवाले वैज्ञानिक लाभों का दिग्दर्शन कराते हैं।
read moreसाष्टांग प्रणाम क्यों ?
हम पीछे कह आए हैं कि मन्दिरों में देवप्रतिमाओं के सामने साष्टांग प्रणाम करने का विधान है। इससे सर्व प्रथम तो यह लाभ है कि मन्दिर में जानेवाले राजा, रङ्क सबका अहङ्कार समूल नष्ट हो जाएगा। क्योंकि जब तक...
read moreचरण छूकर क्यों ?
अब गुरुजनों की चरण स्पर्शपूर्वक की गई वन्दना का रहस्य समझिये। हमारे यहां प्रणाम करना अन्यान्य पन्थोंकी भांति एक निरर्थक व्यापार नहीं है। किन्तु मनु आदि महर्षियों ने इसके चार लाभ प्रकट किये हैं। यथा—प्...
read moreपञ्चगव्य-पान क्यों ?
मत्स्य, कुक्कुट, सूकर जैसे मलभोजी जानवरों के मलाशयों तक का माँस भक्षण करने वाले कई अहिन्दू गाय के दूध, दही, घृत, गोमूत्र और गोमय द्वारा वैज्ञानिक विधि से निर्मित पञ्च गव्य के पान पर कटु आक्षेप किया कर...
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