धन और मीन राशि के सूर्य में भी विवाहादि कृत्य नहीं होते। पौष और चैत्र को इसी कारण से मलमास कहने की प्रथा प्रसिद्ध है। यहां भी सिंह गत बृहस्पति वाला विज्ञान ही पूरा का पूरा घटता है अन्तर केवल इतना है कि सिंह गत बृहस्पति में शिष्य के घर में गुरु पधारता है और धन मीन राशि के सूर्य में गुरुदेव के घर में शिष्य पहुंच जाता है। हम पीछे सिद्ध कर आए हैं कि धन और मीन ये दोनों राशि बृहस्पति के घर हैं। सो बात बराबर है, शिष्य के घर में गुरु पहुँच जाए तब भी शिष्य सेवा में व्यस्त रहता है, और जब शिष्य स्वयं गुरु-गृह में पहुंच जाए तब तो कान खुजलाने की भी उसे फुरसत नहीं हो सकती। गुरुजी तो पूरे वर्ष भर शिष्य के घर में रहते हैं, अतः शनैः २ खूब सेवा करने का लम्बा अवसर है। अतः गङ्गा और गोदावरी आदि नदों के तट पर रहने वाले सज्जन ऐसे समय में विवाहादि कृत्य करे तो कुम्भ पर पधारे हुवे गुरुदेव के अनुगामी सूर्य भगवान् यथा तथा साक्षी देने का समय निकाल भी लेते हैं इसी आशय से गङ्गा और गोदावरी के मध्यभाग को छोड़कर अन्यत्र सिंह गत गुरु में विवाह हो जाने का शास्त्र में अपवाद पाया जाता है। जिस की क्यों 'देश-वैचित्र्यवाद' से समाहित हो सकती है। परन्तु धन और मीन में तो सूर्य केवल एक मास ही ठहरता है। जब कि देव वर्ष की गणना से हमारा एक वर्ष देवताओं का एक दिन ही होता है तब हमारा एक मास तो पलक झमक में ही बीत जाएगा, ऐसी स्थित में सूर्य का साक्ष्य कथमपि सम्भव नहीं।