मनुष्य का जन्म केवल कोल्हू के बैल की भांति सदैव घर गृहस्थी में जुते २ मर जाने के लिए नहीं हुआ है, किन्तु शास्त्र आयु को चार भागों में बांटकर यथासमय सभी मानव कर्तव्यों के पालन का आदेश करता है। आयु का प्रथम भाग ब्रह्मचर्य पूर्वक पठन-पाठन में व्यतीत होना चाहिए और पूर्ण युवा हो जाने पर गृहस्थ बनकर आदर्श सन्तान उत्पन्न करनी चाहिए—यह दूसरा भाग घर में रहते भी विषयों से ग्लानि प्राप्त करने का साधन है। इन दोनों आश्रमों का वर्णन हम पीछे कर चुके हैं, अब क्रम प्राप्त आयु का तीसरा भाग देशसेवा, जातिसेवा और आत्म कल्याण साधना में व्यतीत होना चाहिए इसे 'वानप्रस्थ' कहते हैं।

शास्त्रीय स्वरूप

(क) भद्रमिच्छन्त ऋषयस्स्वर्विदस्तपोदीक्षामुपनिषेदुरग्रे।
(अथर्व० १९।४१।१)

(ख) गृहस्थस्तु यदा पश्येद् वलीपलितमात्मनः।
अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत्।
(मनु० ६।२)

अर्थात्—(क) स्वर्ग सुख के वेत्ता तत्त्वज्ञ ऋषि, आत्मकल्याण की इच्छा रखते हुए अनादिकाल से तपश्चर्या की दीक्षा में निरत हुए। (ख) गृहस्थ पुरुष जब अपने देह की चमड़ी ढीली हुई तथा सफेद बाल देखे और घर में पुत्र का भी पुत्र अर्थात् पौत्र उत्पन्न हो जाए तब वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करे।

वानप्रस्थ क्यों ?

आज का मानव जीवन इलाहाबादी कवि अकबर के शब्दोंमें—'बी. ए. किया, नौकर हुए, पैन्शन मिली और मर गये'—केवल इतना ही शेष रह गया है। पाश्चात्य देशों में तो इससे भी अधिक दयनीय दशा है, जहां होस्टल, होटल और होस्पीटल इन तीन स्थानों को छोड़कर चौथे स्थान की कल्पना भी नहीं की जा सकती। धनी, रंक सभी होटल में खाते हैं और होस्पीटल में मर जाते हैं। परन्तु हमारे पूर्व पुरुषों ने केवल पेट भरने मात्रकी पाशविक प्रवृत्ति से ऊपर उठकर मानव जीवन के चरमलक्ष्य भगवत् प्राप्ति की साधना का भी स्वर्णिम पुरोगम बनाया था। यह ठीक है कि दुर्भाग्यवश आज हम लोग भी इस आश्रम के महत्त्व को भूलकर अनेक दुःखों के भाजन बन रहे हैं, संसार की भेड़ोंके गल्ले में सम्मिलित होकर 'भें-भें' करने लगे हैं तथापि अन्य देशों की अपेक्षा इस गए बीते समय में भी प्राचीन मुनियों का स्मरण दिलानेवाले कुछ न कुछ आदर्श वानप्रस्थियों के भी दर्शन किये जा सकते हैं। मानव जीवन को सफल बनाने की साधना के निमित्त एकान्तवास कितना उपयोगी है यह बात अनवरत जन-संघट्ट-संकुल संकीर्ण नगरों में रहने वाले, विषकृमि-न्याय से तथैव जीवन बिताने के अभ्यासी लोगों की समझ में नहीं आ सकती, परन्तु संसार के कटु अनुभवों के तमाचों से आकुलित अनेक धनी मानी सम्राटोंको—पाश्चात्य देशों के भौतिक साधन-सम्पन्न अनेक धनकुबेरों तक को, गृहस्थ की विषम वागुरा के बन्धन से उन्मुक्त होकर हिमालय की गुफाओं की ओर भागते हुए देखते हैं तो वानप्रस्थ आश्रम की महत्ता का कुछ धुंधला आभास अवश्य मिलता है। इसलिए वन प्रस्थान की प्रवृत्ति मनुष्य की व्याकुलित आत्मा की अन्तर्ध्वनि है उसे अनसुनी करके आमरण गृहपङ्क में ही धंसे रहना जीवन की विडम्बना है।


आयुष्य का चौथा भाग सब झंझटों को छोड़कर आत्मकल्याण और केवल आत्मकल्याण की साधना में व्ययित करना ही सन्यास आश्रम का आदर्श है।

शास्त्रीय-स्वरूप

(क) यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्।

(ख) चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा सङ्गान् परिव्रजेत्
—मनु०

अर्थात्—(क) जिसदिन भी वैराग्य हो जाए, उसी दिन सन्यास ग्रहण करे (ख) आयु का चौथा भाग—सब कुछ छोड़कर सन्यास में बिताना चाहिए।

संन्यास क्यों ?

वानप्रस्थ आश्रम की विवेचना करते हुए गत पंक्तियों में हम बतला चुके हैं कि संसार से ग्लान्त होकर सब कुछ छोड़ एकान्त सेवन की भावना मनुष्य की स्वाभाविकी अन्तर्ध्वनि है। वानप्रस्थ और सन्यास में केवल इतना ही अन्तर है कि वानप्रस्थ जहां कुछ छोड़ने के आदर्श को अपनाता है वहां सन्यास सर्वस्व त्याग की पुनीत शिक्षा देता है, वास्तव में दीर्घकाल तक संग्रहमय जीवन बितानेवाले गृहस्थ का एकदम सर्वथा त्यागी बन जाना मनोविज्ञान के अनुकूल नहीं हो सकता। अतः सर्वसंग्रही को सर्वत्यागी बनाने के लिए वानप्रस्थ का माध्यस्थ आवश्यक है, उसके सम्पन्न हो जाने पर सन्यास का विधान सर्वथा युक्तियुक्त है।