गुरु और शुक्र के अस्त हो जाने पर प्रायः सभी शुभ कर्म खासकर विवाहादि स्त्री सम्बन्धी कृत्य वर्जित हैं, क्यों ?—इसलिये कि 'अण्डपिण्ड सिद्धान्त' के अनुसार मानव पिण्ड में 'ज्ञान' गुरु की देन है और 'वीर्य' (काम=स्त्री सम्बन्धी सब चेष्टाएं) शुक्र की देन है सो जब ये दोनों महाग्रह अस्त हों तो 'ज्ञान दुर्बल' और 'हीन वीर्य' मनुष्य जो कुछ भी करेगा वे सब कृत्य अज्ञान विजृम्भित तथा क्लैव्यपूर्ण होंगे। सही मस्तिष्क वाला बलवान् मनुष्य ही सब कृत्यों को औचित्य की भित्ति पर स्थिर करने में समर्थ हो सकता है इसीलिये आज के कानून में भी किसी रहन व, वसीहत नामे के परिलेख में कानूनन यह लिखना अनिवार्य है कि—'मुझ लिखने वाले का मस्तिष्क सही है और अपनी होश हवास में यह परिलेख लिख रहा हूं'—कहना न होगा कि हमारे ऋषियों ने केवल वाचिक प्रतिज्ञामात्र से यह स्वीकार करना पर्याप्त नहीं समझा किन्तु उन्होंने तत्तत् ग्रहों के अस्तकालीन समय में किए हुए कार्यों को धर्म शास्त्रीय कानून के अनुसार अकृत्य समझा क्योंकि ऐसे समय में मनुष्य के मस्तिष्क के सही न होने में ब्रह्माण्डीय वातावरण प्रत्यक्ष प्रमाण है।
कदाचित् कोई अक्ल का कोल्हू यह शंका कर बैठे कि सूर्य और चन्द्र के अस्त हो जाने पर तो रात में धड़ाधड़ विवाह होते हैं परन्तु इन छोटे २ तारों के अस्त हो जाने पर अमुक कृत्य करने से आफत का पहाड़ आ पड़ेगा ! यह क्या पोप लीला है !!
हम यहां यह बता देना चाहते हैं कि अस्त से तात्पर्य यहां आंखों से ओझल हो जाना नहीं है, किन्तु सूर्य पिण्ड के अत्यन्त सन्निधान में जाकर उसके मण्डल में विलीन हो जाना है, सूर्य कभी अस्त नहीं होता, वह तो रात में केवल आंखों से ओझल मात्र हो जाता है। उसे उपचारात् अस्त कह देते हैं। इस प्रकार का अस्त तो गुरु शुक्रादि का भी वर्जित नहीं। चन्द्रमा भी अमा के दिनों में ही 'अस्त' रहता है तब भी विवाहादि शुभ कृत्य नहीं होते। मङ्गल बुध और शनि का किसी आध्यात्मिक तत्त्व से सम्बन्ध नहीं किन्तु उनका स्थूल मानवपिण्ड से सम्बन्ध है। यह 'अण्ड पिण्ड वाद' में सिद्ध कर आए हैं। उनका मन, बुद्धि अन्तःकरण पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ता।