पूर्वोक्त स्थापना के अनुसार मुमूर्षु मनुष्य के शरीर और भूमि के मध्य में शुचि पदार्थों का अन्तर होना चाहिए। इसके निमित्त जैसे गोबर का चौका आवश्यक है, इसी प्रकार 'द्विर्बद्धं सुबद्धं भवति' के न्यायानुसार सर्वजन सुलभ 'दर्भ' नामक घास को भी शुचि (असंक्रामक=नान कन्डेक्टर) होने के कारण बिस्तर के नीचे बिछाने का प्रयोग पूर्वोक्त भूमि आकर्षण की आशंका को सर्वथा निर्मूल करके अनेक लाभों को प्राप्त करना ही हो सकता है।
इसके अतिरिक्त अथर्ववेद (१९।३२।१-१०) में दर्भ के विशिष्ट गुणों का प्रतिपादन करने वाला पूरा सूक्त विद्यमान है जिसका कुछ दिग्दर्शन इसी ग्रन्थ के पृष्ठ २०६ पर किया जा चुका है। तदनुसार दर्भ को दैवी गुणों से संयुक्त एक प्रकार का मणि स्वीकार किया गया है जैसे सुवर्ण अपनी भास्वर तैजस्विता के कारण संक्रामक कीटाणुओं का विनाशक माना गया है (परन्तु सर्वजन सुलभ न होने के कारण बहु संख्यक रंक उससे कुछ लाभ नहीं उठा सकते) वैसे ही दर्भ कुशा नामक घास भी तादृश दिव्य तैजस गुणों का आगार होने के कारण और संक्रामक कीटाणुओं की समूल संहारक होने के कारण रोगी के नीचे बिछाने का सर्व सुलभ लाभदायक पदार्थ है।
कर्म विपाक के तारतम्य से रंक तो सम्राट् नहीं बनाए जा सकते परन्तु बड़े से बड़े धनी मानी सम्राटों को भी धार्मिक विधान में सर्व साधारण की भांति धर्मानुष्ठान करने के लिये बाध्य किया गया है जिससे कल्पित वैषम्य को मिटा कर स्वाभाविक साम्य का संरक्षण किया जा सके यही कारण है कि धार्मिक अनुष्ठानों में सोने के सिंहासन के स्थान में कुशासन और सुवर्ण निर्मित अंगूठियों के धारण स्थान में दर्भ निर्मित पवित्रियों के पहिनने का विधान किया गया है। मृत्यु के समय भी स्वर्ण निर्मित तख्त को त्याग कर कुशास्तरण का उल्लेख किया गया है। कहना न होगा यह दर्भ नामक घास सर्व साधारण गरीबों की स्वर्ण राशि है धर्मानुष्ठानों के समय बड़े से बड़े धनकुबेरों को भी जीवन में अनन्त बार इसे वनों से ढूंढ २ कर लाना पड़ा है और आज मरते समय भी इसी के बिस्तर पर पांव फैलाने पर रहे हैं।
कई अहिन्दू लोगों का कहना है कि "रोगी पुरुष निरन्तर कई दिन और महीनों तक मृत्यु शय्या पर पड़े २ वैसे ही निढाल हो जाता है, उसका एक २ अंग दुखने लगता है, मांस चर्बी सूख जाने के कारण गुदगुदा बिछौना भी उसकी उभरी हड्डियों में चुभने लगता है परन्तु ऐसी दशा में जब कि उसे अधिक से अधिक आराम पहुँचाने की आवश्यकता होती है हिन्दू लोग जमीन पर लिटा कर मुमूर्षु पर घोर अत्याचार करते हैं।" वास्तव में यह आक्षेप वही लोग करते हैं जो कि यह भी नहीं जानते कि दर असल मौत किस बला का नाम है। कहना न होगा कि आस्तिकों की दृष्टि में जड़ देह से चेतन अंश जीव=रूह का जुदा होना ही मृत्यु है, जीव की सत्ता न मानने वाले नास्तिक लोग भी कम से कम स्वास प्रस्वास की प्रगति बन्द हो जाने का नाम तो 'मृत्यु' अवश्य स्वीकार करेंगे। सो मृत्यु के समय अन्य सब गौण कष्टों को छोड़कर स्वाससंचार के सौविध्य पर विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। यदि क्षणमात्र भी नासिका और मुख को बन्द कर दिया जाए तो जितनी वेदना इससे अनुभव होगी उतनी अन्य किसी अंग की पीड़ा से नहीं हो सकती। यही कारण है कि अंगों की पीड़ा को यथेच्छ सहन करता हुवा भी मनुष्य यथातथा जीता रहता है परन्तु स्वास नलिका के बन्द होते ही तत्काल मर जाता है। स्वास क्रिया के निरोध से कितना महा कष्ट होता है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि संसार में सब से बड़ा दण्ड फांसी पर झुला देना माना जाता है। सो निवार के पलंगों और गुदगुदे गदैलों पर प्राण प्रयाण के समय मुमूर्षु को लेटाए रखना उसे फांसी के तख्ते पर चढ़ा देने के बराबर है क्योंकि मृत्यु के समय सर्वथा निढाल हुवे मनुष्य की रीढ़ की हड्डी जब तक सीधी तनी न रहेगी तब तक स्वास क्रिया के निरोध के कारण मुमूर्षु को असह्य वेदना का सामना करना पड़ेगा। समतल भूमि ही उस समय एक ऐसा बिस्तर हो सकता है कि जिस के आश्रय से उत्तानशायी मनुष्य की रीढ़ की हड्डी सर्वथा सीधी तनी रह सकती है। इस लिये बिना कष्ट उठाए प्राणोत्क्रमण संभव बनाने के लिये सद्य मुमूर्षु मनुष्य को भूमिमाता की गोद में लिटा देना ही उसकी अन्तिम सेवा करना है। यही कारण है कि आर्य संस्कृति के पुजारी लोग रातों जागकर पहिरा देकर भी अपने बन्धु को चारपाई पर नहीं मरने देते, यदि किसी भी कारणवश ऐसा हो ही जाए तो इस पाप को दूर करने के लिये विशिष्ट धर्मानुष्ठान द्वारा प्रायश्चित्त करते हैं। इसलिये भूमि के बिस्तर पर ही प्राणोत्सर्ग होना चाहिए।
यदि रीढ़ की हड्डी को सीधी रखने के लिये ही भूमि का बिस्तर आवश्यक है तो यह लाभ तो चौकी और तख्त पर लेटा देने से भी प्राप्त हो सकता है। बड़े लोगों के यहाँ ऐसी ही व्यवस्था क्यों न रहे ?
हम पीछे कह चुके हैं हमारे समस्त धर्मानुष्ठान मुष्टिमेय धनी मानियों को सामने रखकर नहीं निश्चित किये गये किन्तु बहुसंख्यक सर्व साधारण गरीबों की स्थिति को लक्ष्य में रखकर लिखे गये हैं, सो यदि शास्त्रों में चौकी या तख्त पर लेटाने की विधि होती तो सर्व साधारण गरीबों को उन के जुटाने में बड़ी परेशानी उठानी पड़ती, फिर मृत्यु का कौन ठिकाना कब कहां आ जाय ? सो चौबीसों घन्टे घर, वन, रण-क्षेत्र सभी स्थानों में चौकी तख्त को पीठ से बांधे मनुष्य घूमा करे यह कहां तक संभव है ! महामारी आदि विपत्तियों के समय तो चौकी तख्त वाली विधि पर आचरण ही नहीं हो सकता, अतः शास्त्र ऐसी अधूरी विधियें लिखने की भूल नहीं कर सकते। सो सर्वत्र सर्वजन-सुलभ पृथ्वीमाता की पवित्र गोद को छोड़ कर मरने के समय भी कृत्रिम बड़प्पन की शेखी बघारना मानवता का घोर अपमान करना है।
इसके अतिरिक्त कई बार यह भी देखा जाता है कि कुटुम्बी जन मुमूर्षु का पहरा देते हुवे भी ठीक मृत्यु के समय असावधान हो जाते हैं तब मुमूर्षु ही किसी तरह स्वयमेव चारपाई से नीचे उतर कर भूमाता की गोद में सदा के लिये सो जाता है अतः प्राकृतिक रीति से जमीन का बिस्तर ही अन्त में काम दे सकता है, चौकी तख्त आदि कृत्रिम साधन तो केवल विडम्बना मात्र है।