हम इसी ग्रन्थ के पृष्ठ २९४ पर अहोरात्रचर्या अध्याय के शयन प्रकरण में यह सिद्ध कर चुके हैं कि 'जीवन काल में मनुष्य को दक्षिण दिशा को पांव करके कभी नहीं सोना चाहिए'—परन्तु मृत्यु के समय इस के विपरीत दक्षिण दिशा की ओर पांव कर के ही मुमूर्षु को लेटाने की शास्त्रविधि है, और प्रायः ऐसा ही किया भी जाता है, इस का क्या हेतु है यह यहां प्रकट करते हैं।

हम पीछे कह आए हैं कि मरणकालीन सब विधियों का मूल सिद्धान्त यही है कि 'प्राणों का प्रयाण उपरितन दशम द्वार से हो—और यदि ऐसा न हो सके तो कम से कम नाभि से नीचे के भाग में होने वाले गुदा और लिंग के द्वार से तो न होने पाए। सो इसी बात की सिद्धि के लिये जहां पूर्वोक्त अन्यान्य प्रयत्न किये जाते हैं उन्हीं में से एक यह भी प्राकृत प्रयत्न है।

कहना न होगा कि उत्तर को शिर और दक्षिण को पांव करके मुमूर्षु को लेटाने की दशा में ध्रुवाकर्षण के कारण दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर निरन्तर चलने वाला विद्युत् प्रवाह कम्पास यन्त्र की सूई की भान्ति मनुष्य के निकलते हुवे प्राणों को नीचे के छिद्रों की ओर खींच लेजाने में सहायक सिद्ध होता है। इस तरह हम प्रकृति प्रवाह को मरण काल में अपना सहायक बनाने में सफल होते हैं और ध्रुवाकर्षण के दिव्य प्रवाह से लाभान्वित होते हैं, यही मुमूर्षु के उत्तर दिशा को शिर और दक्षिण दिशा की ओर पांव करने का अन्यतम हेतु है।


मुमूर्षु को बाईं दाईं किसी करवट न लिटा कर उत्तानशायी सीधा चित लेटाने का यह रहस्य तो जल्दी ही समझ में आ सकता है कि सीधा चित लेटने की दशा में रीढ़ की हड्डी सीधी तनी रहती है और इस तरह स्वास नलिका भी अन्त तक खुली रहती है, यह दोनों बातें प्राणोत्क्रम के समय मुमूर्षु को बिना किसी कष्ट के मरने में सहायक सिद्ध होती हैं, दाईं करवट लेटाने से दाईं नासिका से और दाईं करवट लेटाने से बाईं नासिका से श्वास प्रश्वास का संचार होता है यह कोई भी जिज्ञासु स्वयं लेट कर अनुभव कर सकता है इस तरह किसी भी करवट लेटने से चन्द्र या सूर्य दोनों स्वरों में से केवल एक स्वर ही चल पाता है दूसरे का निरोध रहता है। स्वर विज्ञान के अनुसार चन्द्र से शीतता और सूर्य से उष्णता का संचार होता है यह बात हम इसी ग्रन्थ के पृष्ठ २८९ पर लिख आए हैं। सो मृत्यु काल में किसी एक स्वर का निरोध अथवा गर्मी या ठण्डक इन दोनों में से किसी एक का होना मुमूर्षु के लिए लाभदायक नहीं उलटा कष्ट-कारक है, परन्तु सीधा चित लेटाने की दशा में दोनों स्वरों में श्वास चलने की स्वतन्त्रता तथा शीतोष्णसमता का अवकाश रहता है जोकि उस समय सापेक्ष्य है इसलिए मुमूर्षु का उत्तान शयन—सीधा चित्त लेटाना ही उचित है।


प्रायः सभी देशों में मुमूर्षु के शिर के नीचे उस का पुत्र और कारणवशात् उस के अनुपस्थित होने की दशा में अन्य कोई निकट सम्बन्धी बायां घुटना उपबर्ह—सिरहाने—तकिये की भांति रखता है इस प्रथा का आधार वेद का—'आच्या जानु दक्षिणतो निषद्य' [यजु १९-६२] अर्थात् बायां घुटना झुका कर दाईं ओर बैठे। यह मन्त्र हो सकता है। इससे मुमूर्षु के प्रति जहाँ सम्मान और श्रद्धा का भाव व्यक्त होता है वहां अन्तिम समय में श्वास के वेग के साथ बढ़ता हुवा कफ का जो वेग कण्ठ में पहुँचकर घुरघुरायमान होने लगता है और श्वास की स्वाभाविक गति में रुकावट होने लगती है—वह भी घुटने पर ऊंचे उठे शिर के कारण कुछ-न-कुछ शान्त होने लगता है। साथ ही जब कण्ठवर्ती उदान वायु की शक्ति के प्रायः क्षीण हो जाने के कारण मुमूर्षु स्वयं अपने कफ को बाहिर निकाल सकने की क्षमता नहीं रखता तब अनन्यमनस्क समुपस्थित घुटने की टेक देने वाला व्यक्ति अपने हाथ से मुमूर्षु के मुख में पहुँच जानेवाले कफ को निकाल डालने की आवश्यक सेवा भी कर सकता है। जब मुमूर्षु की मृत्युकालीन करुणापूर्ण दशा को बार-बार देखता हुवा सहृदय पुत्र एकमात्र अवलम्ब सर्वार्तिहरणक्षम भगवान् के पवित्र नाम को उस समय अनन्यमनस्क होकर स्वयं कहता है तब बुझते हुवे दीपक की भान्ति मृत्यु से पहिले एक बार सर्वथा स्मृतिसम्पन्नता—जिसे लौकिक भाषा में 'संभाला लेना' कहते हैं—की दशा में मुमूर्षु को भी हरिस्मरण दिलाने का कल्याणमय कार्य करता है। यह सब बातें कार्यान्तर व्यापृत व्यक्ति द्वारा सम्भव नहीं किन्तु सब काम काज भूलकर मुमूर्षु संपृक्त व्यक्ति द्वारा ही सुसम्भव है। इसलिए शिर के नीचे घुटना देने का यह प्रथा अनेकविध लाभों से परिपूर्ण है। संसार में यह कहावत प्रसिद्ध है कि 'क्या अमुक व्यक्ति मरने के समय मेरे शिर के नीचे गोडा देगा जो मैं उसके लिए इतना मरूं खपूं ? कहना न होगा मुमूर्षु व्यक्ति शिर के नीचे घुटना देने वाले व्यक्ति को अतीव प्रियतम मानता है और एकमात्र इसी आशा से वह सौ अकृत्य करके भी सन्तान का पालन-पोषण करना अपना कर्तव्य बना लेता है। दुर्भाग्यवश मुमूर्षु की यह अन्तिम साध भी यदि पूरी न हो सके तो यह 'हतोऽपि निहतः पुनः'।


अब तक प्रयाणकालीन जिन शास्त्रीय विधि विधानों का उल्लेख किया गया है वे सब के सब प्रायः कुटुम्बी जनों द्वारा सम्पादनीय ही हो सकते हैं, अर्थात्—भूमिलेपन, कुशास्तरण उत्तरशिरस्क उत्तान शयन और जानुप्रदान, आदि कृत्य मुमूर्षु स्वयं अपने लिए नहीं कर सकता ये सब बातें कुटुम्बी जनों की कृपा पर ही आश्रित हैं। दुर्भाग्यवश यदि वे न करना चाहें तो मुमूर्षु लाचार है ! विवश है ! दूसरों के हाथों में बिका है परन्तु शास्त्र जब किसी को विवशता पूर्ण जीवन बिताने का आदेश नहीं करता तो वह विवशतापूर्ण—मरने देने को भी बाध्य नहीं कर सकता। अतः शास्त्र में कुछ ऐसे विधि विधान भी विद्यमान हैं जिनके द्वारा मनुष्य अपने जीवन की भान्ति अपने मरण को भी स्वयमेव सुतरां सुधार सकता है।

मृत्यु का मूल सिद्धान्त 'उपरितन द्वार से प्राणोत्सर्ग करना' हम कहते आ रहे हैं। इस एकमात्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो कृत्य किये जाते हैं इनका भी किंचित् दिग्दर्शन हो चुका है परन्तु अपनी मृत्यु को स्वयं मनुष्य किन विधियों के आचरण से सुधार सकता है, अब प्रसंग प्राप्त इस विषय पर प्रकाश डाला जाता है। हम इसी ग्रन्थ के 'सन्ध्या से पारलौकिक लाभ' प्रकरण पृष्ठ २१९ में लिख आये हैं कि सन्ध्यावन्दन प्राणायाम से जहां आयु बढ़ती है वहां इससे मरणकाल में दशम द्वार से प्राण निकाल सकने का भी अभ्यास बढ़ता है। इसीलिए वेद शास्त्र की आज्ञा है कि मृत्युकालीन उस कठिन घड़ी को सरल बनाने के लिए बाल्यकाल से ही हमें दशम द्वार का भेद जानने के लिए नित्य अधिकारानुसार सन्ध्यावन्दन प्राणायाम, और राम नाम जाप करना चाहिये। जो व्यक्ति नित्य विधिवत् प्राणों का नियमन करता रहेगा बढ़ते २ उसका अभ्यास इतना परिपक्व हो जाएगा कि प्राण प्रयाण के समय भी बिना किसी भौतिक साधन के अपने प्राणों को सुगमता से खींच कर ब्रह्मरन्ध्र की ओर उत्क्रमण करने में समर्थ हो जाएगा। यह नित्य कर्म वैसा ही कृत्य समझना चाहिए जैसा कि प्रत्येक सैनिक असली युद्ध की तैय्यारी के लिए घर में, नित्य प्रति कवायद परेड, (कृत्रिम युद्ध) करता है। जो योद्धा नित्य परेड में मनोयोग नहीं देगा और इसे व्यर्थ समय अपव्यय समझेगा, वह वास्तविक संग्राम में विजयी नहीं हो सकेगा, सतत अभ्यास के बिना समय पर चौकड़ी चूक जाएगा। ठीक इसी प्रकार जो व्यक्ति प्राणायामादि नित्य कर्म निरन्तर न करेगा, इसे कोरा ढकोसला बता कर उपेक्षा करेगा वही मृत्यु के समय दूसरों की कृपा का मोहताज अवश्य बनेगा। इसलिये अपनी मृत्यु को स्वयं सुधारने का अमोघ उपाय अधिकारानुसार नित्य प्रति सन्ध्या वन्दनादि कर्मों का विधिवत् सम्पादन करना समझना चाहिए।