उत्तरायण शुक्लपक्ष और दिन में मरने से मोक्ष क्यों मिलता है, इसका कारण 'अण्डपिण्ड' सिद्धान्त के अनुसार भली प्रकार मनन किया जा सकता है। मृत्यु के समय यदि प्राण शक्ति का प्राबल्य हो तो वह जीवन उन्मुक्त हो जाता है, क्योंकि प्राण शक्ति का सम्बन्ध सूर्य पिण्ड से है। अतः उत्तरायणादि के समय सूर्य के आकर्षण से जीव ब्रह्माण्ड पिण्ड से पार निकल जाता है। सूर्य के आकर्षण के सामने अन्य किसी ग्रह नक्षत्र का आकर्षण उसे पुनः पृथ्वी की ओर खींचने में समर्थ नहीं है, यही मुक्ति है। इसी प्रकार दक्षिणायन कृष्णपक्ष और रात के समय मनोमय चान्द्र शक्ति का प्राबल्य रहता है, अतः उस समय मरने वाला प्राणी ब्रह्माण्ड परिधि से पार नहीं जाता। चन्द्र पिण्ड तक पहुँच कर पुनः पृथ्वी पर जन्म लेता है, क्योंकि चन्द्र पिण्ड भूपिण्ड के अत्यन्त निकट है।
इस प्रसंग में यह प्रश्न हो सकता है कि भला ! यात्रा विवाह आदि कृत्यों में तो मुहूर्तसाधना का कथित फल—सानन्द पुनः घर लौटना, दम्पति में सौमनस्य रहना—आदि यथाकथञ्चित् स्वीकार भी किये जा सकते हैं, परन्तु जब मरना ही पड़ रहा है अर्थात् सब कुछ छोड़कर जीवनलीला ही परिसमाप्त हो रही हो, ऐसी स्थिति में—'अमुक समय मरना और अमुक समय नहीं मरना'—इस प्रकार की पोपलीला का क्या फल हो सकता है ? और फिर मृत्यु तो कोई काम्यकर्म भी नहीं है कि जब चाहो मरो ! और जब चाहो न मरो—चलते फिरते हार्ट फेल हो जाए, मिनटों में लीला समाप्त !!
कहना न होगा कि ऐसे प्रश्न करने वाला सज्जन इस भ्रम में है कि शायद शरीर परित्याग के साथ मनुष्य जीवन सर्वथा और सर्वदा परिसमाप्त हो जाता है। परन्तु उसे यह विदित नहीं कि जिसका नाम मृत्यु है वह तो केवल स्थूल शरीर मात्र के वियोग का नाम है—'वागादि पञ्च श्रवणादि पञ्च पुर्यष्टकं सूक्ष्मशरीरमाहुः' के अनुसार मर जाने के बाद भी सत्रह तत्त्वों से बना सूक्ष्म शरीर और तदवच्छिन्न जीव आमुक्ति तथैव बना रहता है। ऐसी स्थिति में जीवन काल में मुहूर्त साधने से जो लाभ हो सकते हैं, उससे कहीं अधिक लाभ उपयुक्त मृत्यु से हो सकते हैं। अथच मुहूर्त न साधने पर जीवन में जो हानियें हो सकती हैं, उससे कहीं अधिक मृत्युकालीन असमय के कारण हो सकती हैं। भारतीय शास्त्रों के अनुसार जीवन का प्रमाद इतना भयावह नहीं जितना कि मृत्युकालीन हो सकता है।
वास्तव में मृत्यु एक ऐसा प्रसंग है कि जिससे हमारा भावि जीवन बनना या बिगड़ना दोनों सम्भव हैं। यदि कोई पुरुष विधिवत् मर जाता है तो वह गीता के पूर्वोक्त शब्दों में मुक्त हो जाता है। सदा के लिये जीवन मरण के बन्धन से छूट जाता है। और यदि जीवन भर ठीक रहते हुए भी प्रारब्धवश मृत्यु के समय चौकड़ी चूक जाए, तो मृत्युकालीन भावना के अनुसार ही उसे दानव, मानव, शूकर, कूकर बनने के लिए बाध्य होना पड़ता है। इसीलिए—'यं यं वापि स्मरन् भावम्' 'अन्तमता सो मता' 'बार २ मुनि जतन कराही, अन्त राम कही आवत नाही' आदि २। शास्त्रवचन सार्थक होते हैं।