अभिवादन प्रथा के सम्बन्ध में सबसे गए बीते आर्यसमाजी हैं। कहने को तो वे अपने आपको बड़े तर्कतोमर तीसमारखां समझते हैं, परन्तु वास्तव में वे सुस्पष्ट असत्य पर भी आमरण हठ ठानने वाले जटिल जन्तु हैं, जो सौ बार कहने सुनने और समझ लेने पर भी अपने दुराग्रह को छोड़ने के लिये प्रस्तुत नहीं होते। फिर चाहे उनकी इस प्रवृत्ति से आर्यसमाज के चौथे नियम का भले ही दिवाला पिट जाए ? और स्वयं उनको भी कितनी ही हानि क्यों न उठानी पड़े !! हां ! स्वामी दयानन्दजी ने तो संस्कार विधि में प्रमाण पुरस्सर पदे २ अभिवाद नमस्कार पांव छूना लिखा है, परन्तु एक आध स्थान में श्रीमती 'नमस्ते' भी कहीं से आ टपकी है जो स्वामी दयानन्दजी की मृत्युके पश्चात् उनके चतुर चेलों की चञ्चल चञ्चु का चमत्कार जान पड़ता है। हम कतिपय उदाहरण देकर अपनी इस स्थापना को प्रमाणित करना चाहते हैं। यथा—
१—यह वामदेव्य-गान होने के पश्चात् नमस्कार सत्कार करे। (स० वि० सामान्य प्रकरण पृष्ठ ६१)
२—वधू 'भवन्त अभिवादयामि' ऐसा वाक्य बोलकर पति को वन्दन अर्थात् नमस्कार करे। (स० वि० गर्भाधान पृष्ठ ४३)
३—बालक पिता को नमस्कार कर हाथ जोड़ के कहे। (स० वि० वेदारम्भ पृष्ठ ६४)
४—'भवन्त अभिवादये—ऐसा वाक्य बोल कर आचार्य का वन्दन करे, आचार्य—'आयुष्मान् विद्यावान् भव सौम्य !' ऐसा आशीर्वाद दे। (स० वि० वेदारम्भ पृष्ठ ६५)
५—बड़ों को नित्य नमस्कार। (स० वि० वेदारम्भ पृ० १०५)
६—आचार्य को अनेक धन्यवाद दे नमस्कार करता हूं। (स० वि० समावर्तन पृ० ११३)
७—'अहं भो अभिवादयामि' इस वाक्य को बोल के दोनों वधू वर वृद्धों को नमस्कार करे। (स० वि० विवाह पृ० १३६)
८—वे [संस्कार में पधारे वृद्ध जन] 'सर्वे भवन्तोऽत्रानन्दिता सदा भूयास्तु' इस प्रकार आशीर्वाद दे। (स० वि० पृ० २१२)
इन प्रमाणों के अतिरिक्त एक प्रबल प्रमाण स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा छपाया गया स्वामी दयानन्द जी का पत्र व्यवहार संग्रह है जिसमें उनके लिखे सैकड़ों पत्र हैं। हमने सब पत्र पढ़े, परन्तु स्वामी दयानन्द जी ने अपने किसी पत्र में भी कभी किसी व्यक्ति को 'नमस्ते' नहीं लिखा, किन्तु सब में प्रायः 'आनन्दित रहो' ऐसा ही लिखा है। अब पाठक स्वयं विचार करें कि इतने प्रबल प्रमाणों की विद्यमानता में भी आर्यसमाजियों का 'नमस्ते' चिल्लाने का दुराग्रह कितना हठपूर्ण है। यहां यह पूछा जा सकता है कि आखिर नमस्ते में वह क्या इतना बड़ा दोष है जो सनातनधर्मी सदासे इसके प्रति बगावत करते चले आए हैं—आइए हम समझाते हैं।
'नमस्ते', 'नमः' और 'ते' इन दो शब्दोंके सम्मेलन से बना है। 'नमः' का अर्थ है नमना=झुकना=शिर नीचा करना, और 'ते' का अर्थ है 'तेरे लिए'। 'नमः' अव्यय है और 'ते' युष्मत् शब्दकी चतुर्थी का एकवचन है। अब कोई बुद्धिमान् स्वयं सोच सकता है कि गुरुजन यदि अपने से छोटे को नमस्ते कहें तो इसमें नमः शब्द बाधक है। क्योंकि संसार की सभ्यता में पुत्र के सामने माता पिता का, गुरु के सामने शिष्य का और पत्नी के सामने पति का शिर झुकाना=नमना न केवल शास्त्र के अपितु व्यवहारवाद के भी सर्वथा विपरीत है। अब इसके दूसरे पहलू पर विचार करें, यदि छोटा पुरुष अपने गुरुजनों को नमस्ते कहने चले तो इसमें एकवचन 'ते' शब्द बाधक है, अर्थात् अपने वृद्ध जनों को तू कहना सभ्यता का दिवाला पीटना है। किसी देश या जातिकी सभ्यता बड़ों को 'तू' कहने की आज्ञा नहीं दे सकती। ऐसी स्थिति में 'नमस्ते' यह वाक्य न छोटे को बड़ा कह सकता है न बड़े को छोटा बोल सकता है, दोनों रीतियों से यह हेय है।
हमारी इस स्थापना को पूरी सुने बिना ही प्रायः महाशय बीचमें ही चट बोल उठा करते हैं कि वेद में बार बार 'नमस्ते' आता है और 'नमो ज्येष्ठाय, कनिष्ठाय च नमः' आदि मन्त्रों में तो छोटे बड़े सबको 'नमः' कहनेका सुस्पष्ट विधान है, कौशल्याजी ने अपने पुत्र राम को 'नमस्ते' की है—इत्यादि २ अनेक उदाहरण देकर स्वामी दयानन्दजी के पूर्वोक्त लेखों की कपाल क्रिया करना चाहा करते हैं। इन सब उक्तियों के उत्तर में हमारा एक जवाब है कि—भारतीय साहित्य में ऐसा एक उदाहरण भी उपलब्ध नहीं हो सकता जहां मानव कोटि के माता पिता गुरुजनों को कभी किसी ने नमस्ते अर्थात्—'तू' कहकर स्मरण किया हो ! आप जितने उदाहरण दे रहे हैं या दे सकते हैं वे केवल ईश्वर को लक्ष्य कर के ही कहे गए हैं। एकेश्वरवादी की दृष्टि में जब ईश्वर भिन्न कोई पदार्थ ही नहीं है, तब ज्येष्ठ कनिष्ठ की कौन कहे—जड़ चेतन सभी कुछ तो उसका ही विराट् रूप है। ऐसी स्थिति में किसी मनुष्य विशेष की ज्येष्ठता कनिष्ठता का अप्रासङ्गिक राग अलापा जायेगा तो आगे 'नमः श्वभ्यः' तस्कराणां पतये नमः' आदि मन्त्रों में महाशय कुतुबुद्दीन को और चोरों के चौधरी को भी तो नमस्कार की गई है। क्या दयानन्दी इसका अनुकरण करके रास्ते में मिले महाशय गधे कुत्तों को भी 'नमस्ते' कहा करेंगे ? श्री कौशल्या माता का वह वचन तो हमने स्वयं ही अपने प्रमाणों में उद्धृत किया है, उसमें विद्यमान 'भक्तवत्सल !' शब्द ही महाशयों की तसल्ली के लिये पर्य्याप्त है अर्थात् वह पुत्र समझकर नहीं बल्कि भगवान् समझकर ही वहां 'ते' शब्द का प्रयोग कर रही हैं।
शायद ! पाठक अभी तक यह समस्या न सुलझा पाए हों कि यदि अपने से बड़े को 'नमस्ते' कहना अपमान जनक है, तब बड़ों से भी बड़े भगवान् को वेद में बार २ 'नमस्ते' आता है, जिसे आप भी स्वीकार करते हैं—इसका तात्पर्य ? वास्तविक बात यह है कि जैसे गुरुजनों से 'तू' कहना शोभा नहीं देता, ठीक इसी प्रकार ईश्वर को आप=भवान्—अर्थात् बहुवचन से सम्बोधित करना भी शोभास्पद नहीं। क्योंकि ईश्वर एक है=अद्वितीय है। उर्दू वाले भी 'तू खालिक है तू सर्जनहार है' इत्यादि शब्दों में उसे तू तू कहकर ही पुकारते हैं। अंग्रेजी में ईश्वर को ही 'दाऊ लार्ड' कहा जाता है, एवं भारतीय साहित्य में 'त्वमेव माता च पिता त्वमेव' ऐसा ही कहा जाता है। सो जहां हम यह नियम बना रहे हैं कि अपने से बड़ों को तू बोलना पाप जनक है वहां—ईश्वर इस नियम का अपवाद है। अर्थात्—ईश्वर को 'तू' बोलना ही शोभास्पद है। एतावता ईश्वर कोटि में आया हुआ 'नमस्ते' का प्रयोग पुरुष कोटि के प्रश्न का समाधान नहीं कर सकता।
'तू' शब्द कहाँ बोला जा सकता है इस सम्बन्ध में संस्कृत साहित्य का एक बहुत प्रसिद्ध श्लोक चला आता है। यथा—
बाल्ये सुतानां सुरतेऽङ्गनानां स्तुतौ कवीनां समरे भटानाम्।
त्वंकारयुक्ता हि गिरः प्रशस्ताः……………॥
अर्थात्—बाल्यावस्था में अबोध पुत्रों द्वारा, सुरतकालीन बेतकल्लुफी के समय स्त्रियों द्वारा, स्तुति पाठ में कवियों द्वारा और रणाङ्गण में योद्धाओं द्वारा 'तू' कहा जाना ही प्रशस्त है।