मीन के सूर्य में अन्य सब कृत्य जहां वर्जित हैं वहां ब्राह्मण कुमार के उपनयन संस्कार के लिये मीन बहुत प्रशस्त है, यह क्यों ? इसलिए कि 'उपनयन' का तात्पर्य है शिष्य का गुरु के उप=समीप नयन=प्रापण ! यही इस संस्कार का प्रधान लक्ष्य है। जब गुरुदेव के घर में स्वयं शिष्य पधारे हों ऐसे अवसर पर यदि 'यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः' के अनुसार संसार के अन्यान्य शिष्य भी गुरु के समीप जाएं तो यह 'यथा राजा तथा प्रजा' का ही उदाहरण होगा।

परन्तु यह आज्ञा केवल ब्राह्मण बालक के लिए ही है—यह क्यों ?—इसलिए कि 'देश वैचित्र्यवाद' और 'व्यक्ति वैचित्र्यवाद' सिद्धान्त के अनुसार ज्ञान के अधिष्ठाता बृहस्पति पिण्ड का, ज्ञानके मुख्य अध्यक्ष ब्राह्मण वर्ण पर विशेष प्रभाव पड़ता है, मीन गुरुदेव का घर है सूर्य के मीन राशिमें स्थिति उसके भावि उच्चतम पद की सूचक है। जिस प्रकार सूर्य आदि ग्रह अमुक राशि के स्वामी माने जाते हैं इसी प्रकार सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र और शनि—क्रमशः मेष, वृष, मकर, कन्या, कर्क मीन और तुला राशि में आजाने पर 'उच्चस्थ' माने जाते हैं। इनकी यह उच्चता भी 'देश वैचित्र्यवाद' सिद्धान्त के अनुसार आकाश के तत्तत् प्रदेश-वैलक्षण्य पर आधारित है। जब कोई ग्रह अपनी उच्च कही जानेवाली राशि से पहिली राशि में अवस्थित हो जाता है तो उच्चाभिलाषी कहा जाता है। जैसे मेष का सूर्य उच्च होता है तो मीन का उच्चाभिलाषी कहा जाएगा। इसी प्रकार चन्द्रमा वृष का उच्च का होता है तो मेष राशि का उच्चाधिकारी कहा जाएगा। सो मीन का सूर्य उच्चाभिलाषी है अर्थात् वह अपने उच्चतम स्थान मेष राशि पर आरूढ होने का उम्मदवार हो गया है इस लिए मीन के सूर्य में ब्राह्मण कुमार का उपनयन भी उसको ज्ञान के उच्च पद पर आरूढ करने का द्योतक है। परन्तु क्षत्रिय और वैश्य का परम ज्ञानी बन जाना उन्नतिसूचक नहीं किन्तु क्षत्रिय का वीर बनना और वैश्य का व्यवसायी बनना ही उसके वर्ण धर्म की दृष्टि से परम उन्नति का आदर्श है क्योंकि क्षत्रिय और वैश्य तो ज्ञानी बन जाने पर अर्जुन और समाधि वैश्य की भाँति युद्ध व्यवहार से उपरत होकर 'भैक्ष्यमपीह लोके' कहने पर उतारू हो जाएंगे। जिसे उनकी उन्नति नहीं पतन ही समझा जाएगा, अतः मीन राशिस्थ सूर्य का केवल ब्राह्मण कुमार पर ही अनुकूल प्रभाव पड़ेगा अन्य वर्णों के बालक पर नहीं। इसलिए मीनस्थ सूर्य में केवल ब्राह्मण कुमार का ही उपनयन विज्ञान संगत है अन्य का नहीं। एतावता धनस्थ सूर्य, गुरु भवनस्थ होता हुआ भी उच्चाभिलाषी न होने के कारण ग्राह्य नहीं हुआ, 'क्यों' का यह छोटा सा पुछल्ला भी इससे समाहित हो जाएगा।