इस तरह मन्त्र प्रतिपाद्य गणपतितत्त्व सर्व विघ्नों का विनाशक है। अतएव गणपत्यथर्वशीर्ष के नवें मन्त्र में—"विघ्ननाशिने शिवसुताय वरदमूर्तये नमः" ऐसा आया है। सायणाचार्य ने इसका व्याख्यान करते समय "कालात्मकभयहारिणे, अमृतात्मकपदप्रदत्वात्" अर्थात्, गणेश जी कालात्मक भय को हरण करने वाले हैं, क्योंकि वे अमृतात्मकपदप्रद हैं। स्कान्द तथा मौद्गल में विनायकमाहात्म्य विषयक एक ऐसी गाथा है—किसी समय अभिनन्दन राजा ने इन्द्रभागशून्य एक यज्ञ आरम्भ किया। यह जानकर इन्द्र कुपित हुआ। उसने काल को बुलाकर यज्ञभङ्ग की आज्ञा दी। कालपुरुष यज्ञ को नष्ट करने के लिए विघ्नासुर रूप में प्रादुर्भूत हुआ। जन्ममृत्युमय जगत् काल के अधीन है। काल तीनों लोकों को भ्रमण कराता है। ब्रह्मज्ञानी पुरुष काल को जीतकर अमृतमय हो जाता है। ब्रह्मज्ञान का साधन वैदिक स्मार्त सत्कर्म हैं। "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दन्ति मानवाः।" सत्कर्म से विशुद्धान्तःकरण पुरुष को भगवत्तत्त्व साक्षात्कार होता है, और उससे ही काल का पराजय होता है। यह जानकर काल उस सत्कर्म के नाश के लिए विघ्नरूप होकर प्रादुर्भूत हुआ। सत्कर्महीन जगत् सदा ही काल के अधीन रहता है। इस वास्ते काल-स्वरूप विघ्नासुर अभिनन्दन राजा को मारकर जहाँ-तहाँ दृश्यादृश्यरूप से सत्कर्म का खण्डन करता था। उस समय वशिष्ठादि भ्रान्त होकर ब्रह्मा की शरण गये। ब्रह्मा की आज्ञा से भगवान्-गणपति की स्तुति की। क्योंकि गणपति को छोड़कर किसी भी देवता में कालनाश सामर्थ्य नहीं है। गणेश जी असाधारण विघ्न-विनाशकत्व गुण-सम्पन्न हैं। यह बात श्रुतिस्मृति शिष्टाचार तद्वाक्य एवं श्रुतार्थापत्ति से अवगत है। श्री गणेश जी से विघ्नासुर पराजित होकर उनकी शरण में गया और उनका आज्ञावशवर्ती हुआ। अतएव गणेशजी का नाम विघ्नराज भी है। उसी समय से गणेशपूजनस्मरण-रहित जो भी सत्कर्म हो उसमें विघ्न का प्रादुर्भाव अवश्य होता है। इसी नियम से विघ्न भगवान् के आश्रित रहने लगा। विघ्न भी काल-रूप होने से भगवत्स्वरूप है। "विशेषेण जगत्सामर्थ्यं हन्तीति विघ्नः" ब्रह्मादिकों में भी जगत्सर्जनादि सामर्थ्य को हनन करने वाले को विघ्न कहते हैं। अर्थात् ब्रह्मादि समस्त कार्य ब्रह्म विघ्नपराभूत होने के कारण स्वेच्छाचारी नहीं हो सकते। किंतु गणेश के अनुग्रह से ही विघ्नरहित होकर कार्यकरण क्षम होते हैं। विघ्न और विनायक ये दोनों ही भगवान् होने के कारण स्तुत्य हैं। अतएव "भगवन्तौ विघ्नविनायकौ प्रीयेताम्" ऐसा पुण्याहवाचन में लिखा है। विघ्न सिवाय गणेश के और किसी के वश में नहीं, जैसा कि—योग वाशिष्ठ में शाप देने को उद्यत भृगु के प्रति विघ्नरूप काल ने कहा है—
"मा तपः क्षपयाबुद्धे! कल्पकालमहानलैः।
यो न दग्धोऽस्मि मे तस्य किं त्वं शापेन धक्ष्यसि॥
ब्रह्माण्डावलयो ग्रस्ताः निगीर्णा रुद्रकोटयः।
भुक्तानि विष्णुवृन्दानि क्व न शक्ता वयं मुने॥"
इससे सिद्ध हुआ कि, निःश्रेयस साधन गणेशस्मरण-हीन सभी सत्कर्मों में कालरूप विघ्न के प्रादुर्भाव का होना अनिवार्य है। अतस्तन्निवारणार्थ गणेशस्मरण सभी सत्कर्मों में आवश्यक है।
यदि कहा जाय कि ओंकार ही सर्वमंगलमय है, वेदोक्त समस्त कर्म उपासनाओं के आदि में ओंकार का ही स्मरण किया जाता है, अतः गणेशस्मरण निरर्थक है, सो ठीक नहीं। क्योंकि ओंकार भी सगुण गणेशस्वरूप ही है। मौद्गल में भी कहा है—"गणेशस्यादिपूजनञ्चतुर्विधम् चतुर्मूर्त्तिधारकत्वात्।" ब्रह्मा के चारों मुखों से अष्टलक्ष पुराणों का प्रादुर्भाव हुआ। उसके बाद द्वापर में व्यासदेव ने कलियुगीय मन्दमति प्राणियों के बोधार्थ अष्टादश पुराणोपपुराणों का निर्माण किया। उनमें पहला ब्राह्म पुराण है। उसमें निर्गुण एवं बुद्धितत्त्व से पर गणेशतत्त्व का वर्णन है। अन्तिम ब्रह्माण्डपुराण है, उसमें सगुण गणेश का माहात्म्य प्रतिपादित है, क्योंकि वह विशेष रूप से प्रणवात्मक प्रपञ्च का प्रतिपादन करने वाला है। उपपुराणों में भी पहला गणेशपुराण है, जो कि सगुण निर्गुण गणेश की एकता का प्रतिपादन करने वाला और गजवदनादि मूर्त्तिधर गणेश का भी प्रतिपादन करता है। यहां पर जो यह कहा जाता है कि उपपुराण अपकृष्ट है, सो ठीक नहीं क्योंकि जैसे उपेन्द्र इन्द्र से अपकृष्ट नहीं, वैसे ही पुराणापेक्षया उपपुराण अपकृष्ट नहीं। मौद्गल अन्तिम उपपुराण है। उसमें योगमय गणेश का माहात्म्य प्रतिपादित है। इस तरह से वेद, पुराण, उपपुराण आदिकों के आदि मध्य अन्त में गणेशतत्त्व का प्रतिपादन है। इतना ही क्यों? ब्रह्मविष्ण्वादि भी गणेशांश होने से ही शास्त्रप्रतिपाद्य हैं। कोई लोग बुद्धिस्थ चिदात्मरूप गणेशस्मरण करके सत्कर्म करते हैं। कोई प्रणवस्मरणपूर्वक सत्कर्म करते हैं। कोई गजवदनाद्यवयवमूर्तिधर गणेश का स्मरण करते हैं। एवं कोई योगमय गणपति का स्मरण करते हैं। यों सभी शुभाशुभ कार्यारम्भ में येनकेनचिद्रूपेण गणेशस्मरण देखा जाता है। कोई कहते हैं—प्राणप्रयाण समय में, पितृ यज्ञादि में गणेशस्मरण नहीं प्रसिद्ध है, सो ठीक नहीं, कारण? गयास्थित गणेशपद पितृमुक्ति देने वाला है। वेदोक्त पितृयज्ञारम्भ में गणेशपूजन का निषेध नहीं है। इसीलिए वहां भी गणेशपूजन होता है और वह युक्त है। इसीलिए श्रुति गणेशको ज्येष्ठराज शब्द से सम्बोधित करती है।
'गणेशगीता' में मरणकाल में भी गणेशस्मरण कहा है—
"यः स्मृत्वा त्यजति प्राणमन्ते मां श्रद्धयान्वितः।
स यात्यपुनरावृत्तिं प्रसादान्मम भूभुज॥"
गणेशतापिनी में भी कहा है—
"ओं गणेशो वै ब्रह्म तद्विद्यात्, यदिदं किञ्च, सर्वं भूतं भव्यं सर्वमित्याचक्षते"
इस तरह यह सिद्ध हुआ कि—पूर्ण परब्रह्म परमात्मा ही निर्गुण एवं विघ्न विनाशकत्वादि गुणगण विशिष्ट गजवदनादि अवयव मूर्त्तिधर रूप में गणेश है।
इस प्रकार आधिदैविक पक्ष में गणेशलोक के स्वामी भक्तों के समस्त विघ्नों को दूर करने वाले भगवान् गणेश हैं। वे 'यद्रूपं कामयते तत्तद् देवता भवति' के अनुसार भक्तों की भावना के अनुसार यथेच्छरूप बनाकर समय समय दर्शन देते हैं।
आजकल कुछ ग्रन्थ-चुम्बक पण्डितम्मन्य पाश्चात्यों के शिष्य होकर बाह्यकुसंस्कार दूषितान्तःकरण सुधारक श्री गणेशतत्त्व पर विचार करने का साहस कर बैठते हैं। वे अपने गुरुओं के विपरीत कितना विचार कर सकते हैं। उनका कहना है पहले गणेश आर्यों के देवता नहीं थे किन्तु, एतद्देशीय अनार्यों को पराजित करने पर उनके सान्त्वनार्थ गणेश को अपने देवताओं में मिला लिया गया। ग्रन्थ-चुम्बक होने के कारण कुछ पुराण, कुछ वेदमन्त्र, कुछ चौपाइयों का संग्रह कर अपनी अनभिज्ञता का परिचय देते हुए ऐसे स्वरूप में गणपति का वर्णन किया करते हैं कि जिससे शास्त्रीय गणपतिस्वरूप समाच्छन्न हो जाता है। यद्यपि थोड़े से भी तत्त्वज्ञों के लिए ऐसे असम्बद्धालाप हेय ही हैं, तथापि मूर्खों के लिए व्यामोह होना स्वाभाविक ही है। कोई इन महानुभावों से पूछे कि गणेश नाम का कोई तत्त्व है यह कैसे जाना गया? पुराणादि शास्त्रों से या यत्र-तत्र गणपति की मूर्त्तियों को देख कर। यदि शास्त्रों से ही गणेशतत्त्व समझा जाय तब तो फिर उन्हें अनार्यदेव कैसे कहा जाय, क्योंकि शास्त्र से तो वे ब्रह्मादियों के पूज्य पाये जाते हैं। यदि द्वितीय पक्ष उचित समझें तब तो उसे देवता या पूज्य समझना यह केवल मूर्खता ही है, कारण, केवल काष्ठ मृत्पाषाणादि को कौन अभिज्ञ देवता समझेगा। यदि अदृश्य देवशक्तिविशेष का आवाहन कर उस मूर्त्ति का पूजन किया जाता है, तो भी वह देवशक्ति किस प्रमाण से जानी तथा आहूत की गई है? इसका उत्तर यदि यह कहा जाय कि शास्त्र ही से यह बात जानी गई तब फिर शास्त्र ने तो गणेशतत्त्व को अनादि ईश्वर ही कहा है। फिर वह अनार्यों के देवता कैसे हुए। फिर दूसरी विलक्षण बात यह है कि शास्त्रों के भी आधार पर गणेश को अनार्यों का अभिमत देव मानना और आर्यों का बाह्य देश से आना, भारतवर्ष में प्राथमिक अनार्यों का निवास, अनार्यों के देवता गणेश को आर्यों का ग्रहण! भला ऐसी बेसिरपैर की बातें अनार्य्य शिष्यों के सिवा किसे सूझ सकती हैं? भला कोई भी सहृदय क्या वेद-पुराणादि शास्त्रों को मानता हुआ भी आर्यों का बाहर से आना तथा गणेश का अनार्य्यदेवत्व स्वीकार कर सकता है? वस्तुतः यह सब फल दूषित संस्कारों तथा आचार्यशून्य मनमाने शास्त्रों के पुस्तकी ज्ञान का है। इसीलिए ज्ञानलवदुर्विदग्ध अनभिज्ञों से भी शोचनीय समझे जाते हैं, और इसीलिए हमारे यहां किसी भी सच्छास्त्र के अध्ययन का नियम है कि आचार्य्य परम्परा से शास्त्रीय निगूढ़ रहस्यों को समझना चाहिए, परस्पर विरोधी वाक्यों का समन्वय करना चाहिए। ऐसा न होने से गणपति की भिन्न-भिन्न लीलाएँ प्राणियों को मोहित करने वाली होती हैं, जैसे उनका नित्यत्व और पार्वती पुत्रत्व शनि की दृष्टि से शिरच्छेद गजवदन का सन्धानादि।
इसीलिए गोस्वामीजी ने कहा है कि अनादि देवता समझकर गणेशादि के रूप भेद, शिव पूज्यता आदि अंगों में संशय न करें।
'जनि कोई अस संशय करै, सुर अनादि जिय जानि।