अपने से बड़े को 'तू' कहने पर जो पाप होता है धर्मशास्त्र में उसका सुस्पष्ट प्रायश्चित लिखा है, यथा—

(क) हुंकारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वंकारं च गरीयसः।
स्नात्वानश्नन्नहः शेषमभिवाद्य प्रसादयेत् ॥
(मनु० ११।२०४)

(ख) गुरुं हुंकृत्य त्वंकृत्य विप्रान्निर्जित्य वादतः।
श्मशाने जायते वृक्षो गृध्रकङ्कादिसेवितः ॥
(स्मृतिसंग्रह)

अर्थात्—(क) ब्राह्मण को 'हुं' कहे जाने पर और किसी गुरुजन को 'त्वं' कहे जाने पर वक्ता को स्नान करके दिन भर भोजन नहीं करना चाहिए, और चरण स्पर्श पूर्वक अभिवादन करके उनसे क्षमा मांगनी चाहिए। (ख) [यदि यह प्रायश्चित न किया जाएगा तो] गुरुजनों को हुं तू बोलने वाला व्यक्ति, श्मशान भूमि में वृक्ष योनि को प्राप्त होगा, जिस पर गीध, चील, कव्वे बैठा करेंगे।

महाभारत में भी एक ऐसी गाथा आती है कि जिसमें 'तू' शब्द को मृत्युदण्ड के समान माना है। प्रसंग यह है कि महाभारत संग्राम में एक दिन अर्जुन दूसरे मोर्चे पर युद्ध कर रहे थे और युधिष्ठिरादि दूसरे मोर्चे पर। इस दिन कौरवों ने अर्जुन की अनुपस्थिति में युधिष्ठिरादि की बहुत दुर्गति की। सायंकाल जब अर्जुन वापिस लौटे तो दिन भर के प्रहारों से तंग हुए युधिष्ठिर ने अर्जुन को निहोरा देते हुए कहा कि तेरे जीते जी हमारी यह दुर्गति ! तेरे 'गाण्डीव' को धिक्कार है ! यह सुनते ही अर्जुन बहुत खिन्न हुवा, क्योंकि अर्जुन की यह अटल प्रतिज्ञा थी कि जो मेरे गाण्डीव धनुष का अपमान करेगा मैं उसका वध कर डालूंगा। प्रतिज्ञा पालन के लिये अर्जुन पिता के समान ज्येष्ठ भ्राता का वध करने के लिये उद्यत हो गया। और स्वयं भी प्रायश्चित्तार्थ जलने को चिता पर चढ़ने की तैय्यारी कर ली। बड़ा अनर्थ होने लगा तब अनेक ऋषि मुनि और स्वयं भगवान् कृष्ण, धर्मशास्त्र की कोई ऐसी व्यवस्था ढूंढने लगे कि जिससे अर्जुन की प्रतिज्ञा भी पूरी हो जाए और दोनों के प्राण भी बच जाएँ। अन्त में सर्व सम्मति से यह निर्णय हुवा कि 'वध' केवल शिर काटने से ही नहीं होता बल्कि शास्त्र दृष्टि से विभिन्न श्रेणी के व्यक्तियों का विभिन्न रीति से वध होता है। जैसे राजा का वध करना हो तो—

'आज्ञाभंगो नरेन्द्राणाम्'

अर्थात्—राजा की आज्ञा न मानना ही उस का वध है। यदि स्त्री का वध करना हो तो—

'पृथक् शय्या च नारीणामशस्त्रवध उच्यते'

अर्थात्—स्त्री से पत्नी का सम्बन्ध न रखना ही बिना शस्त्र स्त्री का वध करना है। ब्राह्मण का वध भी—

'वपनं द्रविणादानम्'

—के अनुसार उसका शिर मूंडकर धन छीनकर अपमान पूर्वक देश से निकाल देने मात्र से सम्पन्न हो जाता है। बस ! ठीक इसी प्रकार गुरु पिता माता ज्येष्ठ भ्राता आदि गुरुजनों का वध भी—

'त्वंकारञ्च गरीयसः'

—के अनुसार उनको 'तू' कह देने मात्र से सम्पन्न हो जाता है। इस व्यवस्था के अनुसार तब अर्जुन ने युधिष्ठिर को कहा—'सर्व अनर्थों का मूल तू ही है। तूने ही जूवा खेला, तूने ही द्रोपदी को हारा' इत्यादि २। कहना न होगा कि इस ऐतिहासिक तथ्य से यह भली भांति सिद्ध हो जाता है कि बड़ों के प्रति 'तू' शब्द का प्रयोग उनका वध करने के बराबर होता है। ऐसी दशा में 'नमस्ते' कहने वाले महाशय स्वयं तो श्मशान के वृक्ष बनेंगे ही, साथ ही वह गुरुजनों का भी तो वध करते हैं। प्रत्यक्ष में भी देखा जाता है कि जब लड़ाई झगड़ा आरम्भ होता है तब—

'रंज की जब गुफ्तगू होने लगी,
आप से तुम, तुम से तू होने लगी।

अर्थात्—पहिले आप २ बोलते हैं, फिर तुम २ बोलने लगते हैं फिर एक वचन तू तू पर ही उतर आते हैं, और तू तू के बाद क्रम प्राप्त डण्डे सोटे का ही अवसर है। इसलिये नमस्ते 'कहना' भी वह अक्षम्य अपराध होगा जिसके उत्तर में यदि डण्डा चल जाए तो निर्हेतुक न होगा। 'नमस्ते' के उत्तर में ऐसे काण्ड न होने का एक ही कारण है कि महाशयों के सौभाग्य से सर्व साधारण संस्कृत व्याकरण से अपरिचित हैं, वे नहीं जानते कि 'ते' क्या बला है ? क्या हम आशा करें कि महाशय लोग ठण्डे दिलसे हमारे इस लेख पर ध्यान देकर (यदि वे नमस्ते से चिपके ही रहना पसन्द करते हैं, और इस पुरानी बीमारी से किसी प्रकार पिण्ड छुड़ा नहीं सकते तो) कम से कम 'नमस्ते' से पूर्व 'ओं' शब्द और अधिक संयुक्त कर लिया करें। जिससे यह गुरुजनों के प्रति न होकर ईश्वर के लिए हो जाए, और इस तरह वे इस अक्षम्य पाप से बच सकें।

अन्यान्य मतों और नास्तिक समाज की प्रथाओं का विभिन्न विवेचन करने से यह एक ही विषय—'बाढ़े कथा पार नहिं लहऊं' का निदर्शन बन जाएगा। इसलिए यही कहना पर्य्याप्त होगा कि साष्टांग प्रणाम और चरणस्पर्श से क्रमशः घटते २ यह प्रथा आज कहां जा पहुंची है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि हिन्दू तो अब भी कम-से-कम दोनों हाथ जोड़कर शिर झुकाना आवश्यक समझते हैं, परन्तु मुसलमानों ने दोनों हाथों के स्थान में केवल एक हाथ ही मस्तक की ओर करना आरम्भ किया। फौजी लोगों ने केवल डेढ़ अँगुली मात्र को ही बड़े अन्दाजे के साथ मस्तक की ओर उठाना काफी समझा। अब कुछ दिनसे सबकुछ छोड़कर केवल जाति या पेशे का नाम मात्र ग्रहण करना ही चल पड़ा है—जैसे ब्राह्मण को आते देखकर 'पंडित जी ३ !' उत्तरमें लालाजी ३ ! या वैद्यजी ३ ! और मुनीम साहिब ! का बोल बाला है। संसार उत्तरोत्तर संक्षेप की ओर बढ़ रहा है। परन्तु इस संक्षेप से मानव समाज किन २ अलभ्य लाभों से दिनोदिन वञ्चित होता जारहा है यह सर्वसाधारण को कानोकान खबर नहीं।