मत्स्य, कुक्कुट, सूकर जैसे मलभोजी जानवरों के मलाशयों तक का माँस भक्षण करने वाले कई अहिन्दू गाय के दूध, दही, घृत, गोमूत्र और गोमय द्वारा वैज्ञानिक विधि से निर्मित पञ्च गव्य के पान पर कटु आक्षेप किया करते हैं। परन्तु वे स्वयं नित्य मधु मक्खियों की वमन=शहद और बारहसिंगे की भस्म तथा हिमालय के वानरों की विष्ठा=शिलाजीत तथा मनुष्य की विष्ठा से निर्मित नौसादर को तोलों के भाव से खरीद २ कर खाते हैं।
वास्तव में वस्तु विशेष की पवित्रता और अपवित्रता उसके तत्तद् गुणों पर ही निर्भर है। यकृत और प्लीहा की खराबी को दूर करने के लिये 'गोमूत्र' के गुणों का परीक्षण हमने स्वयं किया है। वैद्य और डाक्टरों की बहुमूल्य औषधियें जिस रोग को चार वर्ष तक सेवन करने पर भी दूर न कर सकी, वही रोग गोमूत्र सेवन से चन्द दिनों में काफूर हो गया। गोमय मक्खी, मच्छर, रोग कीटाणुओं तथा सील सीमक आदि दोषों को दूर करने में अमोघ है। इसमें गन्धक और पारद के तात्त्विक अंश प्रचुर मात्रा में होते हैं। नये अनुसन्धान में गोबर से एक विशेष प्रकार की गैस उत्पन्न की गई है और उससे बिजली पैदा करके गांवों को प्रकाशित करने का प्रयोग चल रहा है।
प्रभु के अनन्त धन्यवाद के साथ इस भाग को हम यहीं समाप्त करते हैं। अस्तु,
सुकवि तुलसी की विदित भणन्त,
अमित हरि औ, हरि कथा अनन्त।
सहैतुक कतिपय कहे सुकर्म्म,
यही अध्याय तुर्य्य का मर्म ॥