आर्यसमाज प्रवर्तक स्वामी दयानन्द ने प्रायः सब संस्कारों में बीना सींग पूंछ हिलाए गृह्यसूत्रों में लिखे तत्तत् मुहूर्त को ही स्वीकार किया है, परन्तु विवाह मुहूर्त जहां—'उदगयन आपूर्यमाणपक्षे पुण्यनक्षत्रे'—यह प्रमाण देकर उत्तरायण शुक्ल पक्ष और पुण्य नक्षत्र में माना है वहां अनुपद ही 'संस्कार विधि' पृष्ठ १२३ में—'जब कन्या रजस्वला होकर शुद्ध हो जाए, तब जिस दिन गर्भाधान की रात्रि निश्चित की हो उसमें विवाह करने के लिए प्रथम ही सब सामग्री जोड़ रखनी चाहिये'—यह भी लिखा है। स्वामी जी की इस दूसरी आज्ञा के अनुसार आर्यसमाज में विवाह का शुभ मुहूर्त (रजस्वला होकर चौथे दिन ऋतुस्नाता कन्या के विचार से) ऋतुकाल की पाँचवी रात निश्चित ही प्रशस्त है। परन्तु यहां कोई भी विद्वान् यह भली प्रकार समझ सकता है कि यह मुहूर्त साधना कन्या के माता पिता या संस्कार कराने वाले आर्योपदेशक एवं स्वयं कन्या के भी अपने हाथ की बात नहीं। प्रकृति के ही नियन्त्रण से ऋतुस्राव होता है, वह ठीक किस दिन होता है यह पहिले से ही निश्चित नहीं किया जा सकता। कई बार खान पान और गर्मी सर्दी के तारतम्य से दो दिन आगे दो दिन पीछे भी हो सकता है और होता है—यह प्रत्येक गृहस्थ अपने २ घर में स्वयं अनुभव कर सकता है। ऐसी स्थिति में आर्यसमाजी पिता पहिले से ही अपनी कन्या के विवाह का दिन निश्चय करने में सर्वथा असमर्थ हैं। सब जानते हैं कि विवाह संस्कार का दिन महीनों पहिले निश्चित करना अनिवार्य है, क्योंकि प्रायः दूरदेशस्थ वरपक्ष वालों को सूचना देना, एतदर्थ सगे सम्बन्धियों को निमन्त्रण पहुंचाना, यह सब व्यवस्था लम्बे समय की अपेक्षा रखती है। और जब तक विवाह की कोई निश्चित तिथि ही न हो, तो निमन्त्रण क्या दिया जाएगा ! इसलिए आर्यसमाज के सामने चौथे दिन का मुहूर्त साधना सर्वथा असाध्य है क्योंकि वह चौथा दिन आगे पीछे कभी भी आ सकता है।

व्यावहारिक रूप में जब समाजी विवाह साधने बैठे तो उसे सर्व प्रथम घरवाली या स्वयं कन्या से ही यह पूछना होगा कि अनुमानतः वह चौथा दिन कब पड़ेगा। कन्या ऋतुधर्म का दिन ही जानती है भावीके लिये वह बेचारी क्या गारन्टी दे सकती है। कल्पना करो, अगत्या पिछले अनुभव के आधार पर भावी दिन भी अमुक फर्ज किया और तदनुसार सबको निमन्त्रण दिया गया। अब यदि खान पान के वैषम्य में तीन दिन पूर्व ही ऋतु आगये तो बारात आने से पहिले ही मुहूर्त टल जाएगा अर्थात् ऋतु स्नान की चौथी रात्रि तीन दिन पूर्व ही हो चुकेगी। क्या ऐसी दशा में बरात को कहा जाएगा कि महाशयो ! बैरङ्ग लौट जाइये ! इस बार तो 'चास' टल चुका है आगे कृपा कीजिये। उस समय वर और उसके निजी अभिभावकोंको तो जाने दीजिये, परन्तु केवल मिठाई उड़ाने के लिये दफ्तर से 'विदाउट पे' छुट्टी लेने वाले बाराती महाशयों पर क्या बीतेगी ? इसका अनुमान स्वामी जी ने भी न किया होगा।

अब इसके दूसरे पहलू पर विचार कीजिए ! कल्पना करो पूर्व ऋतु के आधार पर निर्धारित चौथा दिन, दो चार दिन आगे बढ़ जाए, तब बारातको पूरे एक सप्ताह तक रोकना अनिवार्य होगा। इस राशनिंग के महर्घतापूर्ण समय में दर्जनों आदमियों को भोजन खिलाने में कन्या के पिता का साल भर का वेतन चट हो जाएगा। यहां यह समाधान कुछ अर्थ नहीं रखता कि नगर का नगर में ही वर निश्चय कर लिया जाए, जिस दिन कन्या रजस्वला हो जाए उसी दिन तत्काल वर पक्ष को सूचना दे दी जावे। इस तरह बारात वापिस जाने या अधिक दिन ठहरने का खतरा नहीं होगा। परन्तु समाधाता महाशय को यह मालूम नहीं कि स्वामी दयानन्दजी के मतानुसार तो भारतीय कन्या का काबुल, कन्धार, अमेरिका आदि दूर देशों में विवाह करना प्रशस्त है, वे एक ही नगरस्थ वर कन्या के विवाह के समर्थक नहीं।

हमने शान्त चित्त से और निष्पक्षपात से स्वामी जी के इस चौथे दिन वाले मुहूर्त की इतिकर्तव्यता पर खूब विचार किया कि बेचारे महाशयों के लिए कोई रास्ता निकल ही आए, परन्तु हम सोचते २ थक गए इस अनोखी पहेली का कुछ भी हल न मिल सका अन्त में—यही निश्चय करना पड़ा कि स्वामीजी का न विवाह हुआ और नाही वे सन्यासी होने के कारण कभी बारात गए। ऐसे शास्त्र और लोकव्यवहारानभिज्ञ व्यक्ति की व्यवस्था विवाह प्रसंग में मानना निरे निठल्ले का ही काम है।