विदेशी शिक्षा तथा वहां की सभ्यता के प्रभाव से आज भारतीय स्त्रियों में जन्म के तुरन्त बाद पुत्र को किसी धाय (दूध पिलाने वाली) को सौंप देने या उसे ऊपरी दूध—जिसके लिए कि अधिकतर विलायती डब्बों का दूध पसन्द किया जाता है—पर पालन का बुरा फैशन दिनानुदिन बढ़ रहा है। कुछ मनचले पाश्चात्य डाक्टरों ने इस प्रकार के विचार व्यक्त किए थे, कि स्त्रियों के स्वास्थ्यनाश का कारण उनका बच्चों को दूध पिलाना है, इससे उनके शरीर में निर्बलता आती है और वे जल्दी वृद्ध हो जाती हैं आदि २।

इन शब्दों का विदेशी शिक्षा दीक्षित जनों पर जादू का सा असर हुआ और आज शिक्षित नर नारी अपनी अबाध विलास प्रवृत्ति को पूरा करने के लिए इसी नुस्खे का प्रयोग कर रहे हैं। जन साधारण की कौन कहे, आर्य्यसमाज प्रवर्तक स्वा० दयानन्द सरीखे कथित समाजोद्धारक भी इस विषय में बहक गए हैं और केवल ६ दिन तक ही मातृ दुग्ध पान की व्यवस्था का समर्थन करके विलायती डाक्टरों की आवाज को और भी बुलन्द कर दिया है यह नितान्त शोक की बात है।

वास्तव में अत्यावश्यक स्थिति के बिना, बच्चे को धाय से दूध पिलवाना बहुत हानिकारक है। इसीलिए इस संस्कार में विशेष रूप से, दोनों स्तनों को अच्छी तरह धोकर अमुक २ मन्त्र बोलते हुए बालक के मुख में देने का विधान है। यह मन्त्रोच्चारण अदृष्ट साधक होने के साथ २ माता को इस बात का उपदेश करता है, कि वह बालक को अपने उस स्तन का ही पान करावे जोकि मधु—अर्थात् प्रेम भावना का स्रोत है, तथा जो बालक के लिये पुष्टि तथा बलदायक है। माता का यह दूध उसके वात्सल्य प्रेम से मिश्रित होता है। वह बालक में उस वंश के उत्तम और शुभ विचारों को उत्पन्न करता है। ब्राह्मण वंशोद्भव स्त्री के दूध से जो बुद्धि और ज्ञान बालक में उत्पन्न होता है, क्षत्राणी के दूध से उसकी रगों में जो शूरवीरता भर जाती है वह धाय के या डब्बों के दूध से नहीं। इतिहास साक्षी है, कि किस प्रकार वीर क्षत्राणी की कोख से उत्पन्न हुए महाराज जसवन्तसिंह के हृदय में ऐन वक्त पर कायरता की अप्रत्याशित भावनाओं ने काबू पा लिया था और वे प्राणों का मोह लेकर युद्ध भूमि से भाग आये थे। कायरता के इस क्षणिक उफान के मूल में बचपन में रोते हुए ३ वर्ष के अबोध जसवन्त को चुप कराने के लिए दासी द्वारा पिलाया हुआ दूध ही तो था जो उनके जीवन के लिए अपरिमार्जनीय कलङ्क का कारण बना। इन सब बातों को देखकर ही अकबर इलाहाबादी ने कहा था कि—

तिफ्ल में बू आए क्या, मां बाप के इतवार की।
दूध तो डब्बों का है तालीम सब सरकार की॥

तात्पर्य यह है, कि इस संस्कार के मूल भूत उद्देश्यों में मातृ दुग्ध पान एक प्रमुख वस्तु है और यदि हम बालक को अपने कुल की विशुद्धता, महानता, उदात्तता और अन्य किसी विशेषता का सच्चा उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं तो हमें उसे माता का ही दूध पिलाना चाहिए।

❀ टिप्पणी—यह प्रकरण हमारे 'चार शास्त्रार्थ' में द्रष्टव्य है।


बालक के उत्पन्न होने पर उसकी शारीरिक मशीनरी को चालू करने के लिए तत्तत् स्थानों पर जमे हुए कफ मल आदि दोषों को दूर करना आवश्यक होता है, इसके लिए चतुर दाई अंगुली में रुई लपेट कर उसके नाक कान मुख आदि को तो स्वच्छ कर देती है किन्तु प्रसव यन्त्रणा के कारण बालक की ऊर्ध्वोमुखी रक्त गति तथा तज्जन्य कफ की शान्ति के लिए बालक को अन्य उपचार की आवश्यकता पड़ती है, इसके अतिरिक्त बालक की आंतों में एक प्रकार का काला २ सा मल संचित रहता है, जिसके न निकलने से बालक को अनेक प्रकार की पीड़ायें हुआ करती हैं। इन सब बातों के उपचार के लिए आधुनिक चिकित्सक शहद मिला हुआ रेडी का तेल देने की व्यवस्था किया करते हैं किन्तु प्रयोगशालाओं में हाल ही में हुए परीक्षणों ने सिद्ध कर दिया है, कि इसके लिए शास्त्रवर्णित सुवर्णघृष्ट मधु मिश्रित घी, रेडी के तेल की अपेक्षा अधिक हितप्रद होता है। सुवर्ण से घिसे हुए इस मधु मिश्रित घी को चटाने से बालक की उपरोक्त सभी शिकायतें दूर हो जाती हैं और उसकी शारीरिक मशीनरी ठीक प्रकार से कार्य करने लग जाती है।

सुवर्ण के लिए आयुर्वेद में लिखा है कि वह वायु को उपशमन करनेवाला है, मूत्र को साफ करता है और रक्त की ऊर्ध्वगति को शान्त कर देता है। इसी प्रकार घृत, शरीर में तापवृद्धि करता है बलवर्द्धक है और विरेचक भी है। मधु के खाने से मुख में लार—जो कि पाचन शक्ति के लिए अत्यावश्यक पदार्थ है—का सञ्चार होता है, पित्त कोष सजग होता है और कफ शान्त हो जाता है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जातकर्म संस्कार की उपयोगिता और विशेषता गर्भाधान संस्कार से कम नहीं है। प्रथम यदि 'मानव' सन्तति निर्माण के पवित्र उद्देश्य से किया हुआ बीज वपन है, तो दूसरा उठते हुए कोमल पौधे को समुचित अवलंबन द्वारा उन्नत करना। इन दोनों को ही सावधानी से करना चाहिए।