सर्वप्रथम शिष्टाचार की पुतली मिस मेयो के भाई बान्धवों की ही प्रणाम-विधि पर विचार करते हैं। ईसाइयों में—प्रातःकाल परस्पर 'गुड मार्निंग' मध्याह्न में 'गुड नून' दिन ढले 'गुड ईवनिङ्ग' और रात में 'गुड नाइट' करते हैं। इन सब वाक्यों में प्रथम 'गुड' शब्द के माने हैं अच्छा=सुन्दर और शेष शब्दों के अर्थ हैं क्रमशः प्रातः, मध्याह्न, अपराह्न और रात। यदि एक-दूसरे को 'गुड मार्निंग' कहता है तो, इसका सीधा अभिप्राय है कि 'प्रातःकाल मुबारिक !' दूसरा भी उसे कहता है, 'तुझे भी प्रातःकाल मुबारिक !' इस तरह जिह्वा मात्र हिलाने से लाभ दोनों में से किसी को कुछ नहीं हुआ। कदाचित् वे 'ईसा' 'गाड्' कुछ भी कहते तो खुदाका नाम मुखसे निकलनेके कारण मुख ही पवित्र होता। परन्तु 'गुड मार्निंग' और गुड नाइट' में तो सार ही कुछ नहीं। अब जरा इसकी व्यावहारिकता पर भी विचार कीजिए। मान लीजिये कि रात में हमारे किसी मित्र के यहां किसी प्रियजन की मृत्यु हो गई, अथवा डाका पड़ गया, चोरी हो गई या मोटर ऐक्सीडैन्ट में हमारा मित्र मरणासन्न हो गया। हमें प्रातःकाल जब इस अनर्थकारी काण्ड की सूचना मिली तो मानवता के नाते हम उनके कष्ट में सहानुभूति प्रकट करने पहुँचे, और जाते ही 'शिष्टाचारानुरोधात्' तपाक से बोले 'गुड मार्निंग' अर्थात् आज का यह प्रभात तुम्हारे लिये मुबारिक=सुहावना है। अब सोचिये, हमारी यह उक्ति जले पर नमक छिड़कने से क्या कम होगी ? मैं सच कहता हूं कि यदि किसी दुःखित पुरुष को कोई मनुष्य ढाढस न देकर, उसके कष्ट में स्वयं भी चार आंसू न गिराकर—उल्टा उसे कहे कि इस कष्ट-प्राप्ति पर तुझे 'बधाई', तो यदि वह दुःखित पुरुष चिढ़कर वक्ता का शिर तोड़ डाले, तो कानून उसे उचित ही समझेगा। क्योंकि कानून की दृष्टि में किसी के जजबात भड़काना, मानो उसको अपराध करने के लिए विवश करना है। इसलिए ईसाइयों की सत्कार-पद्धति जहां निष्प्रयोजन व्यर्थ और अविचार-विजृम्भित है, वहां व्यवहारवादके अनुसार अव्यवहार्य भी है।