गणपति के स्वरूप में नर तथा गज इन दोनों का ही सामञ्जस्य पाया जाता है। यह मानो प्रत्यक्ष ही परस्पर विरोध से प्रतीयमान तत्पदार्थ तथा त्वं पदार्थ के अभेद को सूचित करता है। क्योंकि तत्पदार्थ सर्व जगत्कारण सर्वशक्तिमान् परमात्मा होता है। एवं त्वं पदार्थ अल्पज्ञ अल्प शक्तिमान् जीव होता है। उन दोनों का ऐक्य उपरिष्टात् (स्थूल-दृष्टि से) यद्यपि विरुद्ध है, तथापि लक्षणा से विरुद्धांशद्वय का त्याग कर एकता सुसम्पन्न होती है। तद्वत् लोक में यद्यपि नर और गज का ऐक्य असमञ्जस है, तथापि सकलविरुद्धधर्माश्रय भगवान् में वह समञ्जस है। अथवा जैसे 'तत्पद' लक्ष्यार्थ सर्वोपाधिविनिकृष्ट "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" एवं लक्षण लक्षित ब्रह्म है, वैसे ही 'त्वं' पदार्थ जगन्मय सोपाधिक ब्रह्म है। इन दोनों का अखण्डैक रस 'असि' पदार्थ में सामञ्जस्य है। इसी तरह नर और गज स्वरूप का सामञ्जस्य गणपति स्वरूप में है। 'त्वं' पदार्थ नर स्वरूप है तथा 'तत्' पदार्थ गज स्वरूप है एवं अखण्डैक रस गणपति रूप 'असि' पदार्थ में इन दोनों का सामञ्जस्य है।
शास्त्रों में नरपद से प्रणवात्मक सोपाधिक ब्रह्म कहा है, तथाहि—
"नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति विदुर्बुधाः।"
गज शब्दार्थ शास्त्रों में ऐसा किया है—समाधिना योगिनो गच्छन्ति यत्र इति 'गः',—यस्मात् बिम्बप्रतिबिम्बवत्तया प्रणवात्मकं जगज्जायते इति 'जः' समाधि से योगी लोग जिस परमतत्त्व को प्राप्त करते हैं वह 'ग' है और जैसे बिम्ब से प्रतिबिम्ब उत्पन्न होता है, वैसे ही कार्य-कारण-स्वरूप' प्रणवात्मक प्रपंच जिससे उत्पन्न होता है उसे 'ज' कहते हैं। तथाहि "जन्माद्यस्य यतः" "यस्मादोङ्कारसम्भूतिः यतो वेदो यतो जगत्" इत्यादि वचन भी उसके पोषक हैं। सोपाधिक 'त्वं' पदार्थात्मक गणेश का पादादि कण्ठपर्यन्त नरदेह है। यह सोपाधिक होने से निरुपाधिकापेक्ष या निकृष्ट है। अतः अधोभूताङ्ग है। निरुपाधि सर्वोत्कृष्ट 'तत्' पदार्थ मय गणेश जी का कण्ठादि मस्तक पर्यन्त गजस्वरूप है क्योंकि वह निरुपाधिक होने से उत्कृष्ट है। सम्पूर्ण पादादि मस्तक पर्यन्त गणेश का देह 'असि' पदार्थ अखण्डैक रस है।
यह गणेश एकदन्त है। 'एक' शब्द 'माया' का बोधक है और 'दन्त' शब्द 'मायिक' का बोधक है। यथा—'मौद्गले'
"एकशब्दात्मिका माया, तस्याः सर्वसमुद्भवम्"
"दन्तः सत्ताधरस्तत्र, मायाचालक उच्यते।"
अर्थात्—गणेश जी माया और मायिक का योग होने से 'एकदन्त' कहलाते हैं।
गणेश जी वक्रतुण्ड भी हैं। 'वक्र आत्मरूपं मुखं यस्य।' वक्र कहते हैं टेढ़े को। आत्मस्वरूप टेढ़ा है क्योंकि—सर्वजगत् मनोवचन का गोचर है, किन्तु आत्मतत्त्व उसका (मनोवाणी का) अविषय है। तथा च—"यतो वाचो निवर्त्तन्ते" और भी—
कण्ठाधो मायया युक्तं मस्तकं ब्रह्मवाचकम्।
वक्राख्यं तेन विघ्नेशस्तेनायं वक्रतुण्डकः॥
गणेश चतुर्भुज भी हैं। क्योंकि देवता, नर, असुर और नाग इन चारों का स्थापन करने वाले हैं। एवं चतुर्वर्ग चतुर्वेदादि के भी स्थापक हैं यथा—
स्वर्गेषु देवतांश्चायं पृथ्व्यां नरांस्तथाऽतले।
असुरान्नागमुख्यांश्च स्थापयिष्यति बालकः॥
तत्त्वानि चालयन्विप्रास्तस्मान्नाम्ना चतुर्भुजः।
चतुर्णां विविधानाञ्च स्थापकोऽयं प्रकीर्तितः॥
और वह भक्तानुग्रहार्थ चारों हाथों में पाश, अंकुश, दन्त और वरादि धारण करते हैं। सर्व जगन्नियन्तृ रूप ब्रह्म अंकुश है। दुष्टों को नाश करने वाला ब्रह्म दन्त है। सर्वकामनाओं को पूर्ण करने वाला ब्रह्म वर है।
गणपति भगवान् का वाहन मूषक है मूषक सर्वान्तर्यामी सर्व प्राणियों के हृदय रूप बिल में रहने वाला सर्व जन्तुओं के भोगों को भोगने वाला ही है। तथा वही चोर है, क्योंकि जन्तुओं के अज्ञात सर्वस्व को हरने वाला है। उसको कोई जानता नहीं, क्योंकि माया करके गूढ़ रूप अन्तर्यामी ही समस्त भोगों को भोगता है। इसीलिए 'भोक्तारं सर्वतपसां' कहा है। मुष स्तेये धातु का मूषक बनता है। जैसे मूषक प्राणियों के सर्वभोग्य वस्तुओं को चुराकर भी पुण्यपाप वर्जित ही होता है, वैसे ही मायागूढ़ सर्वान्तर्यामी भी सर्वभोग्य को भोगता हुआ भी पुण्यपाप वर्जित है। सर्वान्तर्यामी गणपति की सेवा के लिये मूषक रूप धारण कर वाहन बना।
मूषकं व्यापकाख्यं च पश्यन्ति वाहनं परम्।
तेन मूषकवाहोऽयम् वेदेषु कथितोऽभवत्॥
मुषस्तेये तथा धातुर्ज्ञातव्य स्तेयब्रह्मधृक्।
नामरूपात्मकं सर्वं तत्रासद् ब्रह्म वर्तते॥
भोगेषु भोगो भोक्ता च ब्रह्माकारेण वर्तते।
अहङ्कारयुतास्तं वै न जानन्ति विमोहिताः॥
ईश्वरः सर्वभोक्ता च चोरवत् तत्र संस्थितः।
तदेव मूषकः प्रोक्तो मनुजानां प्रचालकः॥
भगवान् लम्बोदर हैं, क्योंकि उनके ही उदर में समस्त प्रपञ्च प्रतिष्ठित है और वह किसी के उदर में नहीं है। तथा च—तस्योदरात्समुत्पन्नं नाना विश्वं न संशयः। एवं शूर्पकर्ण हैं, क्योंकि योगीन्द्र मुख से वर्ण्यमान तथा उत्तम जिज्ञासुओं से श्रूयमाण हृद्गत होकर शूर्प के समान पाप पुण्य रूप रज को दूर करके ब्रह्मप्राप्ति सम्पादित कर देते हैं।
रजोयुक्तं यथा धान्यं रजोहीनं करोति च।
शूर्पं सर्वनराणां वै योग्य भोजनकाम्यया॥
तथा मायाविकारेण युतं ब्रह्म न लभ्यते।
त्यक्तोपासनकं तस्य शूर्पकर्णस्य सुन्दरि।
शूर्पकर्णं समाश्रित्य त्यक्त्वा मलं विकारकम्॥
ब्रह्मैव नरजातिस्थो भवेत् तेन यथास्मृतः।
गणेश जी ज्येष्ठराज हैं—सर्वज्येष्ठों के अधिपति या सर्वज्येष्ठ जो ब्रह्मादि उनके बीच में विराजमान हैं। वही गणेश जी शिव-पार्वती के तप से प्रसन्न होकर पार्वती-पुत्र रूप होकर प्रादुर्भूत हुए हैं। जैसे रामभद्र और श्रीकृष्णचन्द्र दशरथ और वसुदेव के पुत्र रूप से प्रादुर्भूत होकर भी उनसे अपकृष्ट नहीं हैं, वैसे ही भगवान् गणेश उनसे उत्पन्न होकर भी उनसे अपकृष्ट नहीं हैं। अतएव उनकी शिवविवाह में विद्यमानता और पूज्यता भी हुई।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में लिखा है कि—पार्वती के तप से गोलोकनिवासी पूर्ण परब्रह्म श्रीकृष्ण परमात्मा ही गणपतिरूप से प्रादुर्भूत हुए हैं। गणपति, श्रीकृष्ण, शिव आदि एक ही तत्त्व हैं। इसी गणपति तत्त्व को सूचित करने वाला ऋग्वेद (अष्टक २ अध्याय ६ वर्ग २९) का यह मन्त्र है—
"गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्।"
इससे मिलता-जुलता ही यजुर्वेद में भी गणपतिस्तावक मन्त्र है। "गणानान्त्वा गणपतिं…" इत्यादि ऋग्वेद का जो मन्त्र है उसका सर्वथा ही गणपति-स्तुति में तात्पर्य है। एवं यजुर्वेदगत मन्त्र का विनियोग यद्यपि अश्वस्तवन में है, तथापि केवल अश्व में मन्त्रोक्तगुण अनुपपन्न होने से अश्वमुखेन गणपतितत्त्व की ही स्तुति इस मन्त्र से होती है। मन्त्रार्थ यों है—
(हे वसो!) वसति सर्वेषु भूतेषु व्यापकत्वादिति तत्सम्बुद्धौ (गणानां) महदादीनां ब्रह्मादीनामन्येषां वा (गणपतिं) गणरूपेण साक्षिरूपेण, ज्ञेयाधिष्ठानरूपेण वा 'गण सङ्ख्याने' इत्यस्माद् गण्यते बुध्यते योगिभिः साक्षात्क्रियते यः स गणस्तद्रूपेण वा पालकः, एतादृशं (त्वा आह्वयामहे) तथा (प्रियाणाम्) वल्लभानां (प्रियपतिं) प्रियस्य पालकं तच्छेषतयैव सर्वस्य प्रेमास्पदत्वात्, 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवतीति श्रुतेः। (निधीनां) सुखनिधीनां सुखनिधे मदन्तःकरणे प्रादुर्भूय स्वस्वरूपानन्दसमर्पणेन (ममापि) पतिर्भूयाः। पुनः हे देव! (अहन्ते गर्भधम्) अजायां प्रकृतौ चैतन्य-प्रतिबिम्बात्मकं चैतन्यम्, (तथा च—मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहमिति भगवत्स्मरणात्।) (आकृष्य) योगबलेन, (अजानि) स्वहृदि स्थापयानि, (त्वं च मम हृदि) (अजासि) क्षिपसि स्वस्वरूपं स्थापयसि।
भावार्थ—अधिकारी उपासक गणपति की प्रार्थना करता है—हे सर्वान्तर्यामिन्! देवादि समूहों का अधिष्ठान तथा साक्षीरूप से पालन करने वाले, प्रियों को प्रियरूप से पालन करने वाले, लौकिक प्रेमास्पदों को परम प्रेमास्पदरूप से स्वसम्बन्ध द्वारा पालन करने वाले, लौकिक सुखराशियों को अलौकिक परमानन्दरूप से पालन करने वाले, अर्थात् अपने अंश से सम्पादन करने वाले आपको मैं पतिरूप से आह्वान करता हूँ। आप मुझे भी स्वस्वरूपानन्द समर्पण द्वारा पालन करें। जगदुत्पादनार्थ प्रकृतिरूप योनि में स्वकीय चैतन्य प्रतिबिम्बात्मकरूप गर्भ को धारण करने वाले बिम्बचैतन्यरूप को मैं अपने हृदय में विशुद्धान्तःकरण से धारण करूँ। एतदनुकूल आप अनुग्रह करें, ऐसी प्रार्थना है।