येनादितेः सीमानं नयति प्रजापतिर्महते सौभगाय।
तेनाहमस्यै सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि॥
(ऋग्वेद)

अर्थात्—जिस प्रकार प्रजापति ने देवमाता अदिति का सीमन्तोन्नयन किया था, उसी प्रकार इस गर्भिणी का सीमन्तोन्नयन कर इसके पुत्र पौत्रादिकों को मैं जरावस्था पर्यन्त दीर्घजीवी करता हूं।

पुंसवन संस्कार की भांति यह संस्कार भी बालक के गर्भस्थ होते हुए ही किया जाता है। आश्वलायन-गृह्य-सूत्रकार ने इसका विधान चौथे महीने में और पारस्कर-गृह्य-सूत्रकार ने छठे या आठवें मास में किया है। आश्वलायन गृह्य-सूत्र से यह भी जाना जाता है, कि यह संस्कार शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा के किसी पुरुषवाची नक्षत्र पर स्थित होने पर किया जाना चाहिये। यथा,—

चतुर्थगर्भमासे सीमन्तोन्नयनम्। आपूर्यमाणपक्षे यदा पुंसा नक्षत्रेण चन्द्रमा युक्तः स्यात्।
(आश्व० अ० १ कण्डिका १४ सूत्र १२)

भगवान् मनु ने इस संस्कार का फल गर्भाधान संस्कार के तुल्य ही निर्देश किया है। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार गर्भाधान का फल, क्षेत्र अर्थात् स्त्री की शुद्धि पूर्वक गर्भ गत शिशु के दोषों को दूर कर उसमें उन शुभ गुणों के बीजों को बोना है जो आगे विकसित होकर उस बालक को सर्वांग में 'मानव' बना सकें उसी प्रकार सीमन्तोन्नयन संस्कार भी क्षेत्र की पुनः शुद्धि तथा गर्भगत बालक की समुचित रक्षा एवं उपयुक्त शिक्षा दीक्षा के लिए किया जाता है। यह वह समय होता है जब गर्भ एक साधारण मांस पिंड की अवस्था से हाथ, पांव, आंख, नाक, कान तथा हृदय वाले व्यक्ति के रूप में परिणत हो रहा होता है। विशेषरूपेण मानव शरीर के प्रधान तथा प्रमुख अंग हृदय के प्रकट हो जाने के कारण जहां गर्भस्थ शिशु में चैतन्य शक्ति का प्रादुर्भाव होने लगता है, वहां उसकी माता में भी एक विलक्षण शारीरिक तथा मानसिक परिवर्तन होना आरम्भ हो जाता है। अन्य परिवर्तनों की अपेक्षा सबसे बड़ा परिवर्तन यह होता है कि अब वह दौहृदा अर्थात् दो हृदय वाली हो जाती है। एक गर्भस्थ बालक का हृदय और दूसरा अपना, क्योंकि हृदय चैतन्याधिष्ठान है इसलिये चेतनता के प्रादुर्भाव के साथ गर्भस्थ जीव इन्द्रियों के अर्थ में रुचि करने लगता है और वह इच्छाएं माता के हृदय पर प्रतिबिम्बित होकर प्रकट होने लगती हैं।

"चतुर्थे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्ततरो भवति। गर्भहृदयप्रव्यक्तभावाच्चेतनधातुरभिव्यक्तो भवति, कस्मात्तत्स्थानत्वात्, तस्माद्गर्भश्चतुर्थे मास्यभिप्रायमिन्द्रियार्थेषु करोति, द्विहृदयाञ्च नारीं दौहृदिनीमाचक्षते"
(सुश्रुत शारीर स्थान अ० ३)

स्त्री के 'दौहृदिनी' बन जाने के कारण ही उसके हृदय में उठने वाली अभिलाषायें 'दौहृद' कहलाती हैं। जिन्हें हर सम्भव उपाय से पूरा करना पुरुष का कर्तव्य है। यदि ऐसा न किया जाय तो गर्भस्थ बालक की अतृप्त अभिलाषाएं सम्पूर्ण जीवन अतृप्त ही बनी रहती हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि यह समय जच्चा एवं बच्चा दोनों के लिए ही बड़ा महत्त्वपूर्ण होता है। क्रान्तद्रष्टा महर्षियों ने इन्हीं सब बातों का अनुभव करके जहां क्षेत्र स्त्रीका पुनः संस्कार करने की आवश्यकता अनुभव की वहां गर्भस्थ बालक के हृदय पर विशद भावनाओं को सदा के लिए अङ्कित कर देने के उद्देश्य से भी इस संस्कार का विधान किया।

इस संस्कार में पढ़े जाने वाले मन्त्र, पुष्कल-घृत-मिश्रित यज्ञावशिष्ट प्रसाद भोजन, पति द्वारा उदुम्बरादि वनस्पति से गर्भिणी के सीमन्त (मांग) का पृथक्करणादि क्रियायें तथा वृद्धा स्त्रियों द्वारा दिया जाने वाला—'वीरसूस्त्वं भव' 'तू वीर माता बन'—इत्यादि आशीर्वाद एक ऐसे अलौकिक वातावरण की सृष्टि कर देते हैं, कि जिसकी स्मृति स्त्री के हृदय पटल पर चिरकाल के लिए अङ्कित हो जाता है। इस वैदिक अनुष्ठान से और स्त्रियों के बार बार कहने से उसके हृदय को एक नई प्रेरणा और स्फूर्ति प्राप्त होती है, वह ऐसे उपायों में प्रवृत्त हो सकती है जिससे वह वीरमाता बने।

शास्त्रकारों का यह अभिप्राय भी इसमें अन्तर्निहित है कि इसके लिये उसे रामायण महाभारतादि सद्ग्रन्थों का अनुशीलन करना चाहिये। वीर पुरुषों के चरित्र पढ़ने सुनने चाहियें तथा अपने को वीर माता बनाने का सर्वविध प्रयत्न करना चाहिये।


माता के इस प्रकार के सद्विचारों का बालक के निर्मल स्वच्छ एवं अछूते हृदय पर कैसा प्रभाव पड़ेगा, यह बतलाने की आवश्यकता नहीं। उसका नवोदित हृदय, नई मानसिक शक्ति और नवोन्मेषिणी बुद्धि मातृ हृदय से शुभ विचारों का सम्बल पाकर कितनी सरलता से विकसित हो सकेगी और दर्पण के समान निर्मल तथा स्वच्छ हृदय पर पड़ी हुई विचार रेखायें उसके सम्पूर्ण जीवन में कैसी अक्षुण्ण बनी रहेंगी—इसे सभी व्यक्ति भलीभांति समझ सकते हैं। हमारे प्राचीन इतिहास में इस प्रकार की घटनाओं की कमी नहीं जिनमें माता की गर्भावस्था की भावना के सर्वथा अनुरूप ही बालकों ने जन्म लेकर इस संस्कार की वैज्ञानिक लक्ष्यभूत भावना को सिद्ध कर दिया है। महाभारत में अभिमन्यु सम्बन्धी ऐसी ही एक रोचक कथा का उल्लेख मिलता है।

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महाभारत का युद्ध अपने पूर्ण यौवन पर था। दोनों ओर के सहस्रों लाखों सैनिक प्रतिदिन नर मेध की उस भीषण ज्वाला में अपनी आहुति दे देते थे। चारों ओर विनाश का महाताण्डव था। भाई भाई के हृदय में वर्षों से संचित द्वेष और दर्प मानो ज्वालामुखी बनकर एक दूसरे को निगलने के लिये तत्पर हो। ऐसे समय में दुर्योधन के अत्यधिक आग्रह पर द्रोणाचार्य ने 'चक्रव्यूह' की स्थापना की। उस दिन भाग्यवशात् अर्जुन अपने शिविर में न थे। भगवान् कृष्ण के साथ वे संसप्तकों के साथ युद्ध करने गए हुए थे। जब पाण्डवों को चक्रव्यूह का समाचार मिला तो वे बड़े हैरान हुए। अर्जुन के अतिरिक्त पांचों पाण्डवों में कोई ऐसा न था जो चक्रव्यूह का भेदन कर सके।

अब क्या होगा ? क्या चक्रव्यूह पाण्डवों की पराजय का कारण बन जायेगा ? यह विचार करते २ युधिष्ठिर एक गहन निराशा में डूब गये। आज पाण्डवों के जीवन मरण का प्रश्न उपस्थित था और तभी सहसा १६ वर्ष के कुमार अभिमन्यु ने वहां पहुँच कर निराशा की अन्धकारमयी रात्रि को आशा के अरुणोदय में परिवर्तित कर दिया।

'महाराज ! पिताजी नहीं हैं तो क्या ? उनके अंश से उत्पन्न आपका बालक अभिमन्यु तो है। मैं करूंगा चक्रव्यूह भेदन ! अपनी जान पर खेल कर भी मैं पाण्डव कुल की लाज बचाऊंगा' अभिमन्यु ने कहा।

'तुम अभिमन्यु, तुम ! नहीं बेटा, ऐसा कैसे हो सकता है। चक्रव्यूह की अभेद्य रक्षा पंक्ति में तुम्हें झोंक कर हम अर्जुन को क्या मुंह दिखायेंगे, और फिर यह साधारण युद्ध नहीं वत्स, यह चक्रव्यूह है। हममें से कोई भी तो इसका वेध करना नहीं जानता।'

'तभी तो कहता हूं महाराज ! आज मुझे व्यूहभेदन की आज्ञा दीजिए, मैंने गर्भावस्था में इस व्यूह का ज्ञान पिता जी से प्राप्त किया था। वे एक बार माताजी की तबियत बहलाने के लिये उनके सामने इसका वर्णन कर रहे थे अभी भेदन करने की रीति का वर्णन ही किया था कि माताजी को नींद आगई और पिता जी ने भी इस प्रसंग को वहीं छोड़ दिया, व्यूह भेद कर वापिस लौट आने की रीति न बता सके। तात ! इसलिये मैं वापिस तो चाहे न लौट सकूं। किन्तु व्यूह भेदन तो निःसन्देह कर सकूंगा।'—अभिमन्यु ने कहा।

और हुआ भी यही। भारतीय इतिहास के उज्ज्वल रत्न रणबांकुरे अभिमन्यु ने महाभारत युद्ध में जिस अपूर्व वीरता तथा शौर्य का प्रदर्शन किया है उसे भारत का प्रत्येक नरनारी जानता है। हमारा अभिप्राय महाभारत की कथा सुनाने का नहीं है। हम तो केवल यह दिखलाना चाहते हैं कि किस प्रकार अनेक ऐतिहासिक साक्षियें सिद्ध कर रही हैं, कि गर्भस्थ जीव के हृदय पर अच्छे, बुरे संस्कार डाले जा सकते हैं। और तब शास्त्रकारों ने इस अभिप्राय के लिए जिन संस्कारों का विधान किया वे क्या विज्ञान पर आधारित नहीं ? अस्तु

प्रस्तुत सीमन्तोन्नयन संस्कार में पर्याप्त घी मिली हुई खिचड़ी जो कि यज्ञावशिष्ट होती है—खिलाने का विधान है। गोभिल गृह्यसूत्र में लिखा है—

किं पश्यसीत्युक्त्वा प्रजामिति वाचयेत् तं सा स्वयं भुञ्जीत वीरसूर्जीवपत्नीति ब्राह्मण्यो मंगल्याभिर्वाग्भिरुपासीरन्
(गोभिल गृ० सू० २।७।९-१२)

क्या देखती हो—यह पूछने पर स्त्री कहे—सन्तान देखती हूं। उस खिचड़ी को वह स्वयं खाये, और इस शुभ संस्कार के समय एकत्रित स्त्रियें उसे यह आशीर्वाद दें—'तू वीर सन्तान उत्पन्न करनेवाली हो, तू जीवित सन्तान उत्पन्न करने वाली हो। तू चिरकाल तक सौभाग्यवती बनी रहे।'

यह विधान केवल कर्मकाण्ड का क्रिया-कलाप मात्र नहीं। इस क्रिया के द्वारा पति पत्नी का ध्यान एक विशेष आवश्यकता की ओर आकृष्ट किया जाता है। यह संस्कार जिस काल में किया जाता है, उस समय गर्भवती स्त्री को घृतादि पौष्टिक पदार्थों की बड़ी आवश्यकता होती है। अपने भोजन द्वारा इस समय एक ओर तो वह अपने शरीर का पोषण करती है दूसरी ओर उसे गर्भगत बालक का पोषण करना पड़ता है। इसलिये उसे ऐसा भोजन मिलना चाहिये जो बलवर्धक एवं पुष्टिकारक हो जिसमें अधिक से अधिक विटामिन हो, साथ ही सुपाच्य हो। खिचड़ी इसी प्रकार का सुस्वादु भोज्य पदार्थ है। इसमें मिश्रित वस्तुओं में निम्नलिखित पौष्टिक तत्त्व निम्न प्रतिशत पाए गए हैं।

प्रोटीन चिकनाई मिठास नमक पानी ताकत ४० तोले में
मूंग की दाल २३ ३ ६० ३ ११ १५६५
चावल ६½ ½ ६१ १ ११ १२४०
घी ० १०० ० ० ० ३६०५

इस प्रकार हम देखते हैं, कि खिचड़ी एक सुपाच्य किन्तु पौष्टिक तत्त्वों से परिपूर्ण वैज्ञानिक भोजन है। इसीलिये डाक्टर रोगी को पथ्य के तौर पर खिचड़ी का ही निर्देश किया करते हैं। स्त्री को चाहिये इसके बाद से इसी प्रकार के बलवर्द्धक और सुपाच्य भोजन करने का नियम बनाले जिससे उसका शरीर भी स्वस्थ रहे तथा भावि शिशु भी स्वस्थ एवं हृष्ट पुष्ट उत्पन्न हो। घृतादि के उचित मात्रा में सेवन से कब्जी आदि की शिकायत भी नहीं रहती है और प्रसव होने में विशेष कष्ट नहीं होता।

संस्कार प्रथा के लुप्त हो जाने के कारण आज गृहस्थों में स्त्री के सगर्भा हो जाने पर भी, चूंकि ऐसा कोई अवसर नहीं आता जिसमें कि पुरुष को स्त्री तथा भावि शिशु के स्वास्थ्य के लिये पौष्टिक भोजन की आवश्यकता अनुभव कराई जाय, इसलिये अधिकांश बालक इतने निर्बल उत्पन्न होते हैं, कि उनके शरीर में बाल्यावस्था में प्रथम अनुभूत होनेवाली गर्मी सर्दी को सहने की तथा तत्सम्बन्धी रोगों के कीटाणुओं से लड़ने की शक्ति ही नहीं होती फलतः वे अकाल में ही मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं।


दशमासाञ्छशयानः कुमारो अधि मातरि। निरैतु जीवो अक्षतो जीवो जीवन्त्या अधि (ऋग् ५।७८।९)

अर्थात्—हे परमात्मन्, दश मास तक माता के उदर में सोने वाला सुकुमार जीव प्राण धारण करता हुआ अपनी प्राण शक्ति सम्पन्न अर्थात् स्वस्थ माता से सुख से बाहर निकले।

उपर्युक्त संस्कार का तात्पर्य उसके नाम से ही स्पष्ट हो जाता है। जातकर्म का अर्थ है वे क्रियायें जो बच्चे के उत्पन्न होने पर की जाती हैं। यह संस्कार आज अपने स्थूल रूप में तो सर्वत्र प्रचलित दिखलाई देता है किन्तु इसका भावना संबन्धी या यों कहिये आत्मा सम्बन्धी अंश सर्वथा लुप्त हो चुका है। भारतीय ऋषियों ने न केवल इस संस्कार में किन्तु सभी संस्कारों—नहीं नहीं मनुष्य के समस्त दैनिक कार्यकलाप में भी, मनुष्य को एक अस्थि मांस निर्मित शरीर के साथ उसे आत्मवान् के रूप में देखा है। उनकी अन्तर्भेदिनी दृष्टि केवल बाह्य शरीर पर ही नहीं रुकी किन्तु उसके अन्तर में विद्यमान—'अङ्गुष्ठमात्रं हृदि शयानम्'—आदि श्रुतिवाक्यों से बोधित प्रत्यक् चैतन्य आत्मा पर भी पड़ी। उन्होंने देखा पूर्ण मानव निर्माण के लिए शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उन्नति की परमावश्यकता है इसलिए उन्होंने दोनों ओर ध्यान दिया।

जातकर्म संस्कार की क्रियायें गृह स्वच्छता, बालक का स्नान, नाभि छेदन, दूध पिलाना आदि क्रियायें इस समय भी सभी घरों में बालक के जन्मोपरान्त की जाती हैं तथा दाई नर्स आदि महिला चिकित्सकों की सहायता से बड़ी अच्छी तरह की जाती है जिनसे जच्चा और बच्चा का शारीरिक स्वास्थ्य ठीक रहता है, किन्तु उस सद्योजात शिशु के हृदय पर, उसके कोमल मन मस्तिष्क, वाणी, आत्मा पर प्रभाव डालने के लिये आधुनिक डाक्टर वैद्यों ने क्या व्यवस्था की है ? क्या शारीरिक संस्कार की तरह उसके मानसिक तथा आध्यात्मिक संस्कार की आवश्यकता नहीं ?

जातकर्म संस्कार की यही अपनी विशेषता है। इसमें बालक को स्नान कराकर मधु स्वर्ण मिश्रित औषधि प्रदान, नालछेदन तथा मातृ स्तन पान कराकर जहां उसके शरीर को जीवन मार्ग की ओर बढ़ने के लिए सहारा दिया जाता है वहां उसके कान के पास गंभीरता पूर्वक—

अग्निरायुष्मान्स वनस्पतिभिरायुष्मांस्तेन त्वाऽऽयुष्मन्तं करोमि।

अर्थात्—जिस प्रकार अग्निदेव वनस्पतियों द्वारा आयुष्मान् है उसी प्रकार उनके अनुग्रह से मैं तुम्हें दीर्घायु युक्त करता हूं'—इत्यादि ८ मन्त्रों को जपकर तत्तत् देवताओं से उसके आयुष्य की अभ्यर्थना करके बालक के हृदय में दीर्घ जीवन की भावना को दृढ़ किया जाता है। इसी प्रकार शिशु का शरीर स्पर्श करते हुए गाई जाने वाली—

अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमश्रुतं भव। आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम्।

अर्थात्—'हे बालक तू पत्थर की भांति दृढ़ तथा कुल्हाड़े की भांति शत्रु विनाशक हो। स्वर्ण के समान स्वच्छ तथा तेजस्वी बने। तू पुत्र नाम से मेरा ही स्वरूप है, तू सौ वर्ष तक जी'—आदि पावन ऋचायें बालक के निर्मल हृदय पर मानवोचित दृढ़ता, पराक्रम, तेज, आदि शुभ गुणों की सदा के लिए अमिट छाप छोड़ देती हैं। इससे उसकी आत्मा और मन को अपूर्व पोषण प्राप्त होता है !

प्रसवोत्पीडित जननी जब वेद के—'हे वीर स्त्री ! तू इडा है, तूने वीर पुत्र को उत्पन्न करके हमें वीर पुत्र वाला बनाया है, इस पुत्र से तू भी वीर माता बन,—आदि धैर्यप्रद शब्दों को सुनती है तो उसके हृदय में साहस का संचार हो जाता है। वह कष्ट में घबराती नहीं और उस पीड़ा को वीरमाता बनने के चाव में सहर्ष झेलती है। इस प्रकार यह संस्कार बालक के शारीरिक और मानसिक दोनों पक्षों का अभिवर्द्धन परक कहा जा सकता है।