वैदिक-स्वरूप

युवा सुवासाः परिवीत आगात्स उ श्रेयान् भवति जायमानः।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः॥
(ऋ० ३।८।४)

जब पुरुष यज्ञोपवीत के अनन्तर पूर्ण ब्रह्मचर्य से युक्त होकर युवावस्था प्राप्त कर (समावर्तित हो जाने पर) सुन्दर वस्त्र धारण कर के गृहस्थाश्रम में आता है इस नवजन्म को प्राप्त करके वह कल्याणयुक्त हो जाता है और धैर्यशाली विद्वान् पुरुष उसे उन्नति की ओर ले जाते हैं।

गुरुगृह या शिक्षालय में रहते हुए यथाविधि पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करके शिक्षा सम्पूर्ण कर लेने पर शास्त्रकारों ने समावर्तन संस्कार का विधान किया है। यह आज भी किसी न किसी रूप में प्रचलित है जिसे कन्वोकेशन (Convocation) या दीक्षान्त समारोह के नाम से स्मरण किया जाता है, किन्तु इसके वैदिक और वर्तमान-कालिक रूप में आकाश पाताल का अन्तर है। आज इस अवसर पर दिये जाने वाले भाषणोंमें स्नातक युवकों के लिए न तो कोई संयमित जीवन की शिक्षा न आदर्श-जीवन का कोई चित्रण ही ! यही कारण है कि आधुनिक शिक्षणालयों—जिन्हें दूसरे शब्दों में विलासिता तथा व्यसनों का केन्द्र भी कहा जा सकता है—से निकलने वाला साक्षरवर्ग अपने चरित्र-दौर्बल्यके लिए काफी बदनाम है। आधुनिक शिक्षाके ये केन्द्र चरित्रगठन ब्रह्मचर्य आदि की शिक्षा के सर्वथा अभाव के कारण देश के लिए बलशाली नागरिक उत्पन्न करने में सर्वथा अक्षम हैं। इनसे निकलने वाले अधिकांश युवक युवावस्था में ही जर्जर तथा अस्थि पंजर मात्रावशिष्ट देह यष्टि को पतलून और कोट के आवरण में छिपाए देश में क्षयवृद्धि के कारण बन रहे हैं।

गम्भीर दृष्टि से देखा जाय तो क्षय का मूल कारण संस्कार परम्पराओं के लुप्त होने में ही है। ब्रह्मचर्य एवं तपोबल सम्पन्न महर्षियों के आश्रमों का स्थान आज स्कूल और कालेजों ने लिया हुआ है। इनमें शिक्षा देने वाले रसिक एवं सहृदय अध्यापक तथा प्रोफेसर महानुभाव ही जब स्वयं विषय वासनाओंके दास होते हैं और सिनेमा नाच गाने आदि मनोरंजक अवसरों पर बढ़ चढ़ कर अपनी रसिकता का परिचय देते हैं तब उनके शिष्यों में ब्रह्मचर्य की भावना के स्वप्न देखना निरी मूर्खता ही तो है। फलतः स्कूल एवं कालेजों के विषाक्त वातावरण में पले हुए वे युवक जब शिक्षा समाप्त कर बाहर आते हैं तब अबाधगति से विषय भोग में प्रवृत्त होकर क्षय को निमन्त्रण देते हैं। पुरातनकाल में समावर्तन संस्कार के अवसर पर जहां स्नातक को एक सभ्य नागरिक बनने के लिए उपयुक्त शिक्षायें दी जाती थीं वहां 'प्रजायै गृहमेधिनाम्' का अनुपम आदर्श उसके सामने रखकर उसे गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होने की अनुमति देते हुए भी संयम का पुनीत पाठ सिखाया जाता था।

इस संस्कार के अवसर पर निम्नलिखित क्रियाओं का विधान शास्त्रकारों ने किया है यथा—गृहयज्ञ, ८ घटों द्वारा दीक्षान्तस्नान, वस्त्रालंकार धारण एवं दीक्षान्त उपदेश, यह सभी क्रियाएं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण हैं और अत्यन्त महत्वशाली हैं।

ग्रह पूजनादि के विषय में हम पिछले अध्यायोंमें पर्याप्त वर्णन कर आए हैं और बतला आए हैं कि हमारे इस मानव जगत् से दूर रहते हुए भी सूर्य चन्द्रादि ग्रह किस प्रकार इस पर अपना प्रभाव डालते हैं आदि २।

आठ घटों द्वारा जलाभिषेक—

आठ घटों द्वारा जलाभिषेक इस संस्कार का मुख्य अंग है। यह आठों घट पूर्वादि आठों दिशाओं में क्रम से रख दिये जाते हैं और अभिमन्त्रित जल से समावर्तन कराने वाले ब्रह्मचारी को स्नान करना पड़ता है। वेदमन्त्रों से अभिमन्त्रित यह जल आध्यात्मिक शक्ति से पूरित होने के कारण स्नातक को शक्ति-सम्पन्न तो बनाता ही है साथ ही उसको भावि गृहस्थ जीवन में भी उन आठ मैथुनों से सावधान रहने की प्रेरणा देता है जो (अष्ट मैथुन) ब्रह्मचर्याश्रम में उसके लिए सर्वथा त्याज्य थे। यद्यपि इस अवसर पर स्नातक, अपनी ब्रह्मचर्यावस्था के सम्पूर्ण कठोर नियमों को समाप्त कर गृहस्थ में प्रवेश का अधिकारी बन रहा होता है, कोट कमीज, जूता, छतरी, अलंकार, सुगन्धित तैल पुष्पमाला आदि वे सभी वस्तुयें जो उसके लिए अभी तक सर्वथा त्याज्य थीं स्वयं गुरु द्वारा उसे धारण करवाई जा रही हैं किन्तु एतावता यह न समझ लेना चाहिये कि अब उसे सब बातों की खुली छुट्टी दी जारही है कि वह चाहे कुछ करे और अपने उस जीवन को 'सद्गृहस्थ' बनाने में लगाने की बजाय विषय-लम्पट और आवारा बनाने में लगादे। गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने पर भी उसे पर-स्त्री ध्यान, कथा, स्पर्श, क्रीड़ा, दर्शन आलिंगन, एकान्त वास और समागम रूप आठ मैथुनों से सर्वदा इसी प्रकार बचना चाहिए, जैसे कि वह ब्रह्मचर्यावस्था में बचता रहा है। इस महत्वपूर्ण शिक्षा को हृदयगम्य कराने के लिए ही शास्त्र ने ८ घटों के जल से स्नान करने का विधान किया है जिससे ८ की संख्या हृदय में सर्वदा स्मरण रहे और युवकवर्ग उससे बचता हुआ अपने गृहस्थ को सुखमय बना सके।

इस महत्त्वपूर्ण शिक्षा से बेखबर रह जाने के कारण आधुनिक युवकों का गृहस्थ जीवन दुःखमय बन जाता है। विवाह के बाद घर में आनेवाली भोली भाली पत्नी को जब मालूम पड़ता है कि पतिदेव को तो कालेज की जिन्दगी से ही 'ताक-झांक' का चस्का है और उसके घर में होने पर भी न जाने किसके विरह के गीत गुनगुनाते रहते हैं तो उसके हृदय पर वज्रपात हो जाता है। इससे ऊपर की यदि किसी घटना का उसे भान हो जाय तो फिर उसका हृदय इस गृहस्थी से फट जाता है घर में क्लेश रहने लगता है और अन्त में 'तू तू मैं मैं' होने के बाद तलाक की नौबत आती है।

इस शिक्षा पर समुचित ध्यान न देने का दूसरा परिणाम यह होता है कि स्त्रियों के निरन्तर चिन्तन कथा सम्भाषण दर्शनादि विकारों से युवकवर्ग का चारित्रिक पतन हो जाता है और वह तरह २ की बीमारियों का ग्रास बन जाता है इसलिए इस आठ की संख्या पर सर्वदा ध्यान रहे यही इस क्रिया का उद्देश्य है।

वस्त्रालङ्कार-धारण

मानव जीवन में वस्त्र अलङ्कारादि का उत्कृष्ट स्थान है। गर्मी वर्षा आदि से शरीर को बचाकर यह उसके विकास में ही सहायक नहीं होते अपितु उसके सौन्दर्य की अभिवृद्धि में भी सहायक सिद्ध होते हैं। उत्तम-वस्त्र उत्तम जीवन स्तर के सूचक समझे जाते हैं और उनमें मनुष्य के विचारों, उसकी आर्थिक स्थिति आदि की पर्याप्त झलक देखने को मिल जाती है यह सुन्दर भाव किसी कवि ने—

'वासः प्रधानं खलु योग्यतायाः'

आदि प्रसिद्ध पद्य में व्यक्त किया है कि वस्त्रों से मनुष्य की परिस्थिति तथा योग्यता को पहिचाना जाता है और उसी से मनुष्य का आदर होता है। समुद्रने भगवान् विष्णु को तो सुन्दर पीताम्बरधारी देखकर अपनी पुत्री लक्ष्मी समर्पित की और भगवान् शंकर को दिगम्बरत्व (वस्त्ररहित) के कारण हलाहल विष !

उपरोक्त सूक्ति में कवि ने उत्प्रेक्षा द्वारा वस्त्रालंकारादि के महत्त्व पर पर्याप्त प्रकाश डाल दिया है। ब्रह्मचर्यावस्था के दश बारह वर्षों में स्नातक को धोती कौपीन गाती आदि साधारण वस्त्रों में ही रखा गया है। पुष्पमाला, अलंकार, तेल, साबुन, अंजन, दर्पण आदि वस्तुओं से उसका सख्त परहेज था। बारह वर्ष के दीर्घकालिक अभ्यासवश यदि स्नातक इन वस्तुओं के प्रति उपेक्षा तथा अरुचि का भाव रखने लग जाए तो यह कोई आश्चर्य नहीं होगा। किन्तु जिस जीवन में अब वह पदार्पण कर रहा है उस जीवन में ये वस्तुएँ उसके लिए हेय नहीं किन्तु ग्राह्य हैं। इनके बिना एक सीमा तक अब वह अपने समस्तर समाज में आदर का अधिकारी नहीं बन सकता, साथ ही उनके प्रयोग से होने वाले लाभ से वंचित रहकर वह अपने शरीर की सुरक्षा को भी खतरे में डाल देता है इसलिए उस संस्कार के अवसर पर आचार्य स्नातक को विधिवत् मन्त्र पाठपूर्वक वस्त्रादि धारण करवा मानो अपने शिष्य को भावि गार्हस्थ्य जीवन में इन वस्तुओं के प्रति अरुचि न रखने की शिक्षा दे रहा है।

इस अवसर पर पढ़े जाने वाले सभी मन्त्रों में अमुक अमुक वस्तुओं के गुणों का पर्याप्त वर्णन मिलता है जिससे उनके महत्त्व को भली प्रकार समझा जा सके।

दीक्षान्त उपदेश—

यों तो आचार्य निरन्तर ही शिष्य को उपदेश देते रहे हैं किन्तु इस अवसर का उनका उपदेश अत्यधिक महत्वपूर्ण और गम्भीर है। उनके एक एक वाक्य में समस्त जीवन के अनुभव का निचोड़ निहित है और उनके द्वारा दिया गया उपदेश चाहे हमें साधारण सी बातें मालूम पड़ें किन्तु इन साधारण सी शिक्षाओं में मनुष्य जीवन को बनाने और बिगाड़ने की अतुल शक्ति विद्यमान है। आचार्य का यह सदुपदेश जो कि शिक्षा के रूप में शायद अन्तिम बार दिया जा रहा है केवल इसी अभिप्राय से दिया जाता है कि स्नातक के हृदय में सर्वदा स्मरण रहे और जीवन में वह उसका उपयोग करे।

हम ग्रन्थ विस्तार भयात् इस उपदेश को उद्धृत करना उचित नहीं समझते, पाठक संस्कार पद्धतियों में इसे देख सकते हैं।


वैदिक-स्वरूप

(क) गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथा सः।
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः॥
(अथर्व १४।१।५०)

(ख) ममेयमस्तु पोष्या मह्यं त्वादाद् बृहस्पतिः।
मया पत्या प्रजावति, संजीव शरदः शतम्॥
(अथर्व०)

अर्थात्—(क) हे शोभने मैं ऐश्वर्य की वृद्धिके लिए तेरे हाथ को ग्रहण करता हूं, तू मेरे साथ वृद्धावस्था तक सुख पूर्वक निवास कर। भग अर्यमा सूर्य इन्द्र आदि देवताओं ने तुझे गृहस्थ धर्मके लिए मुझे दिया है। (ख) यह पत्नी मेरे द्वारा पोषणीया बने। हे शुभे ! देवगुरु बृहस्पति ने तुझे मुझे दिया है। हे प्रजावति, तुम मुझ पति के साथ सौ वर्ष तक कल्याणपूर्वक जीवित रहो।

षोडश संस्कारों में सब से मुख्य तथा महत्त्वपूर्ण संस्कार 'विवाह' है। यह संस्कार न केवल सम्पूर्ण आश्रमों और वर्णों का मूल आधार है किन्तु समस्त सृष्टि का ही मूल कारण है। विशद दृष्टिकोण से देखने पर हम कह सकते हैं कि विवाह=स्त्रीत्व पुरुषत्वयुक्त दो विभिन्न पदार्थों का संयोग—एक प्राकृतिक संस्कार है जिसकी प्रक्रिया समस्त भूमण्डल में नैसर्गिक रूप से विस्तृत है। जगत् के छोटे से छोटे अणु से लेकर बड़े से बड़े पदार्थ का उद्भव इसी प्रक्रिया द्वारा होता है। मानव, पशु, पक्षी, आदि की चर्चा ही क्या, वनस्पति ओषधि लता आदि उद्भिज्जों का जन्म भी इसी स्त्री पुरुष संयोगात्मक प्रक्रिया से ही होता है। मानव पशु पक्षी आदि स्थूल प्राणधारियों का संयोग तो प्रसिद्ध ही है किन्तु बहुत कम व्यक्ति इस बात से परिचित होंगे कि सभी प्रकार के फल, अनाज, धान्य, फूल औषधि आदि भी स्त्री पुरुष वनस्पतियों के विवाह अर्थात् संयोग के ही परिणाम हैं। वृक्ष पौधे आदि भी स्त्री और पुरुष भेद से दो प्रकार के होते हैं। रज वीर्य की तरह इनके पराग या पुष्परेणु भिन्न २ प्रकार के होते हैं। ऋतुकाल में प्रकृति वायु द्वारा या मक्खियों भ्रमरों आदि द्वारा उन विभिन्न परमाणुओं को संयुक्त कर गर्भाधान करती है और तब आगे फलादि उत्पन्न होते हैं। बहुत से पौधों में एक में ही दोनों शक्तियों का पृथक् २ निवास होता है और वायु के संचालन से उनका सम्मिलन हो जाता है और इस प्रकार वे फलादि देने में समर्थ होते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि यह सम्पूर्ण भूमण्डल ही वैवाहिक भाव पर अवलम्बित है। जहां तक मानव जाति का सम्बन्ध है हम कह सकते हैं कि यह संस्कार शिक्षित से शिक्षित और असभ्य से असभ्य सभी जातियों में भिन्न २ प्रकार के रीति रस्मों के बीच सम्पन्न होता है। इस अवसर पर सभी देशों में समान उल्लास और प्रसन्नता देखने को मिलती है। प्रत्येक देश ने अपनी धारणा के अनुसार कुछ ऐसी क्रियाओं और रिवाजों का निर्धारण किया हुआ है जिसे विवाह कहा जाता है किन्तु यह क्रियाएं और रीतियां वैज्ञानिक भित्ति पर स्थिर न होने के कारण अध्यात्मभाव की शून्यता के कारण न केवल दम्पति को विवाह के वास्तविक लाभ से ही वंचित रखती हैं किन्तु उनमें परस्पर अनेक प्रकार की कलह तथा विरोध की सृष्टि करके गार्हस्थ्य जीवन को दुःखमय भी बना देती है। यही कारण है कि भारतवर्ष के अतिरिक्त अन्य देशों ९० प्रतिशत विवाह सम्बन्ध असफल रहते हैं और वहां के गृहस्थ जीवन को शान्ति एवं सुख के स्थान पर संघर्ष, पारस्परिक कलह तथा दुःख का ही सामना करना पड़ता है।

आर्य जाति के अतिरिक्त दूसरी जातियों में इस बात की शायद कल्पना भी न की जासके कि विवाह का सांसारिक सुख के अतिरिक्त अन्य कोई आध्यात्मिक उद्देश्य भी हो सकता है। वहां तो विवाह का एक ही उद्देश्य समझा जाता है वह है केवल सांसारिक भोगविलास और उसकी सिद्धि के लिए स्त्री पुरुष का शारीरिक सम्बन्ध=इन्द्रियतृप्ति पर्यन्त दो प्राणियोंका स्वल्पकालिक लौकिक सम्बन्ध मात्र ही समझती है। परन्तु भारतीय ऋषियों ने इस संस्कार द्वारा न केवल दो शरीरों का ही सम्मिलन चाहा है किन्तु दम्पति के आत्मा, मन, प्राण, शरीर सभी का एकीभाव ही वैदिक विवाह संस्कार की अपनी विशेषता है। इसका उद्देश्य इन्द्रिय-तृप्ति जैसी तुच्छ वस्तु नहीं, किन्तु आदर्श गार्हस्थ्य धर्म द्वारा मोक्षलाभ करना ही है। आर्य दम्पति समझते हैं कि उन दोनों का (स्त्री पुरुष का) केवल इस जन्म का ही नाता नहीं है किन्तु वे जन्म-जन्मान्तर से एक दूसरे के संगी हैं और सर्वदा रहेंगे। यही,—केवल यही भावना है जिसने अनन्तकाल से आर्य गृहस्थ को सुदृढ और सुखी बनाया है। इसी भावना के वश होकर दो अपरिचित प्राणी—जिन्होंने कभी एक दूसरे को देखा भी नहीं होता इस पुनीत संस्कार के संपन्न हो जाने के अनन्तर एक दूसरे को सदा के लिए आत्म समर्पण कर देते हैं। उनकी आत्माएँ प्रथम मिलन में ही एक दूसरे को इतना स्नेह करने लगती हैं मानो उनका जन्म-जन्मान्तर का सम्बन्ध है। संक्षेप में महर्षियों की दृष्टि में विवाह, सांसारिक सुख प्राप्ति के लिए इस जन्म में किया जाने वाला स्त्री पुरुष का (Contract) ठेका नहीं और न ही सौदा ही, यह तो आत्म-त्याग संयम और आध्यात्मिक भावों का उज्ज्वल आदर्श है।

विवाह की विभिन्न रीतियां—

हमने पीछे कहा है कि यह संस्कार भिन्न २ देशों में भिन्न २ रीति रस्मों के बीच सम्पन्न होता है। पाठकों के अवलोकनार्थ हम भिन्न २ देश, जातियों और मतों में होने वाली एतत्कालीन रीतियों का संक्षेप दिग्दर्शन कराना उचित समझते हैं—

विलायतः—में ईसाई वर वधू इस अवसर पर किसी चर्च में उपस्थित होते हैं। पादरी के समक्ष वे अपने रूमाल अंगूठी आदि बदलते हैं और उससे बाईबिल सुनते हैं जीवन पर्यन्त भलाई बुराई, अमीरी गरीबी बीमारी और तन्दुरुस्ती में एक दूसरे से मिला रहने, एक दूसरे को प्यार करने और एक दूसरे की खबरगिरी रखने की कसमें खाते हैं। स्त्री के बाएं हाथ की अनामिका अंगुली में छल्ला पहिनाते हुए वर कहता है—'इस छल्ला से तुझे ब्याहता हूं और अपना 'दुनियावी माल' तुझे देता हूं, बाप बेटे और रूह उलकुद्स के नाम से'। और इस प्रकार उनकी शादी की रस्म सम्पन्न हो जाती है।

आस्ट्रेलियाः—में वैवाहिक रस्मों में वधू का भाई जलता हुआ मशाल लेकर वर के घर जाता है और वर का भाई वधू के घर पर। इसके अनन्तर उनका विवाह सम्पन्न हो जाता है।

बापर द्वीपः—में शादी के लिए आवश्यक है कि वर, घने अन्धकारावृत कमरे में छिपी हुई वधू को ढूंढ निकाले। निश्चित समय के अन्दर यदि वह ढूंढ निकाले तो शादी हो जाती है अन्यथा नहीं होती।

बलगेरियाः—में दूल्हा और दुलहिन शादी से पूर्व एक सप्ताह तक अन्धेरे कमरे में बन्द कर दिए जाते हैं। इसके बाद दोनों की सम्मति से विवाह सम्पन्न हो जाता है।

जेरुसलमः—में इस अवसर पर वधू की आंखों में पट्टी बांध दी जाती है और जब तक विवाह की सब रस्में पूरी नहीं हो जाती तब तक नहीं खोली जाती।

जापानः—में स्त्रियों का सफेद कपड़ा पहिनना अच्छा नहीं समझा जाता, परन्तु शादी के अवसर पर वहां दुलहिन को सफेद वस्त्रों में सजाया जाता है। इन कपड़ों का मतलब होता है कि लड़की अब परकीया हो चुकी है।

मिश्रः—में विवाह की रस्म पूरी होने तक वर वधू एक दूसरे को बिलकुल नहीं देख सकते। इस नियम को पालन करवाने में वहां अत्यन्त कठोरता बरती जाती है।

कोर्यक और शबरः—नाम की जातियों में विवाह की रस्म वधू द्वारा बेंत की छड़ी से खूब पीटकर पूर्ण की जाती है। इस मारको वर, विवाहानन्तर सुखकी आशा में खुशी २ सहते हैं।

तिब्बतः—में इस अवसर पर वधू को वर का जूठा दूध पिलाया जाता है। उस देश में विवाह का यही मुख्य नियम समझा जाता है।

महाशयों में विवाह संस्कार की मिट्टी पलीद

विवाह के इस आलोचनात्मक प्रसंग में आर्यसामाजिक विवाह प्रणाली पर दो शब्द लिखना अप्रासंगिक न होगा।

पिछले दिनों हमें अपने एक मित्र की कन्या के विवाह में उपस्थित होना पड़ा। मित्र महाशय उदारधर्मी थे किसी विशेष धर्म के प्रति उनका आग्रह न था परन्तु वर पक्ष वाले कट्टर समाजी विचारों के थे फलतः आर्यसमाजी विधि से ही विवाह होना निश्चित हुआ। विवाह कार्य प्रारम्भ हो गया। वरपूजन, मधुपर्क-प्राशन गोदान कन्यादानादि सभी विधियें सामने आईं। वे ही मन्त्र थे और लगभग वही सब कुछ जैसा कि सनातन-पद्धतियोंमे देखता आ रहा था। रह-रहकर हृदय में यही विचार उठ रहा था कि गणेश पूजनादि आध्यात्मिक अंश को निकाल देने के अतिरिक्त आर्यसामाजिक पद्धति में अन्य क्या विशेषता ? स्वामीजीने प्रत्येक दिशा में अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी रांधने का प्रयत्न क्यों किया ? तभी आर्यसमाज पुरोहित ने किन्हीं मस्तराम जी को ऊंची आवाज में पुकारा और आगे आने के लिए कहा। मैंने देखा एक लट्ठधारी हट्टा कट्टा नौजवान बड़ी शीघ्रता से वेदी की ओर लपका जा रहा है। विचारों की सरणी टूटी; मन यह जानने को उत्सुक हो उठा कि इस सुख शान्तिमय मांगलिक वातावरण में अचानक क्या उपद्रव उठ खड़ा हुआ जो ये महाशय लट्ठ लिए भीड़ को चीरते हुए आगे जा रहे हैं। मैं उत्सुकतावश खड़ा हो गया कोई विशेष बात नहीं थी, फेरों की तैयारी हो रही थी। रंग बिरंगे वस्त्रों में सजी कन्या आगे खड़ी थी वर उसके पीछे, और इन दोनों के पीछे कन्धे पर पानी का घड़ा संभाले लट्ठधारी मस्तराम। इस दृश्य से हृदय में बड़ा कुतूहल-सा हुआ और तब तो मेरे अचम्भेका ठिकाना न रहा जब मैंने देखा कि मस्तराम तो साथ २ फेरे भी ले रहा है। विवाह पढ़ाने वाले आर्यपुरोहितने जो कि आरम्भ से ही समस्त वैवाहिक विधियों की व्याख्या करके उपस्थित जनता को स्वामी दयानन्द का भक्त बना डालने का शिरतोड़ प्रयत्न कर रहे थे—लट्ठधारी मस्तराम के सम्बन्ध में भी कहना आरम्भ किया—

'सज्जनो ! श्रीस्वामीजी महाराजने यह विधि सुरक्षाको ध्यान में रखकर बनाई है। जैसे राजा महाराजाओं के अङ्गरक्षक होते हैं इसीप्रकार दूल्हा भी चूंकि बारात का राजा होता है इसलिए उसके साथ भी एक दृढाङ्ग—लट्ठधारी पुरुष, संरक्षक होना चाहिए जो विवाह में उपद्रव करने वालों का दमन कर सके। कदाचित् हवन की अग्नि वस्त्रादि में न लग जाय, इसी कारण यह पानी का घड़ा साथ उठा रखा है जिससे आवश्यकता पड़ने पर उसे बुझाया जा सके। इसीलिए तो इसका नाम 'दृढ पुरुष' रखा गया है'

वर का राजा होना और लट्ठधारी जवान अङ्गरक्षक होना किसी अंश तक समझ में आगया किन्तु राजा साहब के अपने अन्तःपुर में एकान्त सेवन के समय भी 'बाडी गार्ड' महाशय का दाल भात में मूसलचन्द बन जाने को प्रस्तुत होना तो समझ से परे की बात थी।

आग के भय की बात भी खूब कही गई ! यदि वास्तव में हवन की अग्नि भड़क ही उठे और ईश्वर न करे मण्डप और शामियाने को छू जाए तो फिर उन लट्ठधारी महाशय का एक छोटा सा पानी का घड़ा उसे कहां तक बुझा पायेगा ? हमारा सुझाव है कि इसके लिए तो आर्यसमाजी भाइयों को पहले ही से कुछ माशकी तैनात रखने चाहिएं तथा म्युनिसपल कमेटी में सूचना देकर दमकल (Fire Brigade) को तैयार रहने का प्रबन्ध कर रखना चाहिए जिससे समय पर अग्नि दुर्घटना से रक्षा हो सके। विवाह में उपद्रव मचानेवाले दल को दबाने के लिए भी एकमात्र बेचारा मस्तराम कहांतक सफल हो पाएगा, इसके निमित्त तो पूर्व से ही कोतवाली में 'नुकसेअमन' की रिपोर्ट करके पुलिस का एक सशस्त्र दल तैयार रखना चाहिए था। मस्तराम के बाडी-गार्ड होने और उसके लट्ठ तथा पानी का घड़ा उठाने की तुक तो आर्यपुरोहित ने मिला दी परन्तु यह दोनों काम तो एक जगह तैनात मस्तराम भी आवश्यकता पड़ने पर कर सकता था, परन्तु भावरी (फेरे) लेने के समय भी वर के साथ २ उसके अग्नि परिक्रमा करने से तो आर्यसमाज में एक कन्या का दो व्यक्तियों से विवाहा जाना सिद्ध हो रहा है इस अनर्थ का भी कुछ समाधान है ? हो सकता है आर्यसमाज में नियोग की प्रथा का विधान है अतः भावि उम्मीदवार पति का स्वत्व स्थापन करने के लिए पूर्व से ही यह उपक्रम किया जाता हो !