एक मुसलमान दूसरे को 'अज सलामालेकम' कहता है, तो उत्तर में दूसरा बोलता है 'वालेकम सलाम ! इनके शब्दों पर हमें इतनी आपत्ति नहीं, जितनी कि—उपर्युक्त शब्द बोलते हुए एक-दूसरे के हाथ को अपने हाथ में थामकर घर्षण करने में है। इस मुसलमानी प्रथा को ईसाइयों ने तो अपनाया ही था, अब देखा-देखी हिन्दुओंने भी परस्पर हाथ मिलाना आरम्भ कर दिया है। निःसन्देह यह प्रथा एक-दूसरे की संक्रामक बीमारियों के आदान-प्रत्यादान में बड़ी खतरनाक सिद्ध हुई है। कलतक हमारी चिल्लाहट की परवाह नहीं की गई थी, परन्तु अब तो पाश्चात्य देशों के अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने घण्टा घोष के साथ यह घोषणा की है कि एक बार सेक हैण्ड—अर्थात् हाथ से हाथ मिलाने में हम क्षण मात्र में दूसरे के शरीर में व्याप्त संक्रामक बीमारियों के कितने कीटाणुओं को अपने शरीर में ग्रहण कर लेते हैं और अपने कितने ऐसे कीटाणुवों को दूसरे के शरीर में पहुंचा देते हैं इसका लेखा जोखा करके ठीक संख्या, अधिक से अधिक शक्तिशाली अणुवीक्षण यन्त्र भी बताने में असमर्थ है। पाश्चात्य देशों में अब यह प्रथा घटने लगी है। समझदार लोग प्रायः दस्ताने पहनकर हाथ मिलाने लगे हैं, परंतु प्रश्न तो यह है कि जिह्वा से 'अज सलामालेकुम' और 'वालेकुम सलाम' कहने से लाभ क्या हुआ ? इससे अच्छा तो अल्लाताला, रहीम और करीम आदि खुदा के नाम ही बोल दिये जाते तो कुछ तो फायदा होता !
क्यों