हमें यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं, आज के संसार में मनुष्यों को जीना तो आता ही नहीं, परन्तु शोक तो यह है कि उन्हें मरना भी नहीं आता। जीते हैं तो पशुओं की भांति हीन दीन दशा में, और मरते हैं तो रोते झींकते, करुणा क्रन्दन करते और अपने किए अकृत्यों पर पश्चात्ताप करते। न जीते चैन न मरे चैन। परन्तु हमारे पूर्वज आज से सर्वथा विपरीत जीते थे तो आन और शान के साथ प्रज्वलित अग्नि की भांति चमकते हुए जीते थे, और मरते थे तो सर्वथा तैयार होकर सजधज और हंसी खुशी के साथ। जीवन में अभ्युदय उनके चरण चूमता था और मरने पर निःश्रेयस हाथ बांधे आगे खड़ा मिलता था।

हमने इस ग्रन्थ में जीवन को सार्थक बनाने के कुछ नियमों का दिग्दर्शन यत्र तत्र लिखा है परन्तु इस प्रघट्ट में हम उस मृत्यु विधि विधान को क्यों की कसौटी कसकर खरा २ दिखा देना चाहते हैं जिसका कि खरीदार चाहते या न चाहते प्रत्येक प्राणी को बनना ही पड़ता है।

शास्त्रीय स्वरूप

गोमयोदकेन भूमिमुपलिप्य, कुशैराच्छाद्य, कृष्णतिलान् विकीर्य उत्तराशाशिरस्कं भूमौ उत्तानशायिनं महा-प्रयाणपथिकं विदध्यात्। शनैः गङ्गोदकतुलसीदलमाचामयेद् यथाशक्ति आतुरदानं दीपदानञ्च कारयेत्। समुपस्थिता हरिस्मरणं हरिनामकीर्तनञ्च कुर्युः।

अर्थात्—गोमय जल से भूमि को लेपकर कुशाओं से आच्छादित करे, और काले तिलों को विकीर्ण करके। उस भूमि पर मुमूर्षु मनुष्य को उत्तर की ओर शिर करके सीधा लिटा दे। गङ्गाजल तुलसीपत्र सहित शनैः २ मुख में डाले यथाशक्ति आतुरकालीन दान और दीपक दान करवाया जाय। उपस्थित कुटुम्बी हरिस्मरण और हरिनाम कीर्तन करें।


'मरना कैसे चाहिये ?'—इस प्रश्न का सीधा और संक्षिप्त उत्तर यह है कि मनुष्य के शरीर में जो—गुदा, लिंग, मुख, दो कर्ण, दो नासिका, और दो नेत्र, ये नौ छिद्र प्रत्यक्ष दीख पड़ते हैं इनके अतिरिक्त कपाल में एक गुप्त दशम द्वार भी है। इनमें उत्तरोत्तर ऊपर के द्वार से प्राणों का उत्क्रमण हो—यही एक प्रयत्न मृत्युकालीन समस्त विधियों का मूलभूत उद्देश्य है। मरने के बाद जीव की क्या दशा होगी, अर्थात् उसकी सद्गति होगी या दुर्गति ? इस परोक्ष रहस्य को इदमित्थं तो स्वयं भगवान् या त्रिकालदर्शी महात्मा ही जान सकते हैं, परन्तु मरण कालीन प्राणों के उत्क्रमण का मनन करने से इस विषय में प्रत्येक व्यसनी बुद्धिमान् को कुछ आभास अवश्य मिल जाता है।

यदि किसी भाग्यशाली मनुष्य के प्राण स्वयमेव कपाल का भेदन करके प्रयाण करते हैं तो वह सर्वोत्तम मोक्षगति को प्राप्त हुआ है—चौरासी के चक्कर से छूट गया है अब वह 'न स पुनरावर्तते' का अधिकारी बन गया है।

उत्तरोत्तर ऊंचे द्वार से प्राण प्रयाण से सद्गति क्यों होती है ? यह बात अनुपद आगे की पंक्तियों में प्रकट की जाएगी, परन्तु इतना समझ लेना चाहिये कि मृत्युकालीन सब विधियें केवल इसी एक उद्देश्य की पूर्ति के लिये की जाती हैं। सो भूमि पर चित्त लिटाने की दशा में मनुष्य के मलद्वार का भूमि से स्पृष्ट रहना अनिवार्य है और भूमि का आकर्षण सर्वथा अशक्त हुवे प्राणों को चुम्बक की भांति खींचकर गुप्तद्वार से निकलने के लिये बाध्य करे यह स्वाभाविक है, अतः इस दुर्गति से बचने के लिए मुमूर्षु मनुष्य के शरीर और भूमि दोनों के मध्य में मध्य में कोई ऐसा पदार्थ होना चाहिए जो कि—'शुचि' असंक्रामक=नानकन्डक्टर (Nonconductor) हो। सो सभी वैज्ञानिक गोबर को शुचि द्रव्यों में अन्यतम स्वीकार करते हैं, अर्थात्—बिजली का करण्ट उसे पार करके दूसरे द्रव्यमें प्रवेश नहीं कर सकता। अतः हमारे शास्त्रों में गरीब अमीर सबको सर्वत्र सुलभ गोबर को ही भूमि लेपन के लिये उपयुक्त माना गया है। गोबर की विद्युत्-निरोधकारिणी शक्ति लोक में प्रायः प्रसिद्ध है, अनेक स्थानों में आकाश से गिरने वाली बिजली गोबर के ढेर पर गिरने की दशा में वहीं समा जाती है—यह लोकप्रवाद प्रत्यक्षदर्शी अनेक व्यक्तियों द्वारा समर्थित है। गोबर के ढेर में से मिलने वाला लोह धातु के मूसले जैसा तैजस् पदार्थ अग्नि के संयोग से पुनरपि उड़ जाता है यह किंवदन्ती भी निर्मूल नहीं।

इसके अतिरिक्त रोगीके स्थान में कई दिनों तक अनेक विध मलों का संपर्क रहना स्वाभाविक है। कई प्रकार के संक्रामक रोगों के कीटाणुओं का विद्यमान होना भी अनिवार्य है, इसलिए मृत्यु समय उपस्थित रहनेवाले कुटुम्बी जनों की स्वास्थ्य संरक्षा के विचार से भी नानाविध कीटाणुओं को विनाश कर सकने की क्षमता रखने वाले तैजस् (फासफोरस) जैसे तत्त्वों से परिपूर्ण गाय के गोबर से चौका लगाना बहुत आवश्यक है।