आज कथित समाजवादी उदरम्भर पाश्चात्य देशों की झूठन समेटकर भारत में भी तादृश समाज रचना की रेतीली दीवार खड़ी करने का विडम्बना पूर्ण प्रयास कर रहे हैं, परन्तु यदि वे सनातन धर्म की समाज रचना के एक साधारण नियम 'बलि वैश्वदेव' का ही मनन कर सकें और राजसत्ता के प्रभाव से जनता में तादृश आचरण का वातावरण उत्पन्न कर सकें, तो अपने आप ही खाद्य समस्या हल हो जाए, फिर घूसखोरी और चोर बाजारी के जननी जनक राशन व्यवस्था और कंट्रोल की आवश्यकता ही न पड़े। परन्तु दुर्भाग्यवश ! आज तो खाद्य समस्या को हल करने के लिए केवल कागज के कलेजे पर कलम चलाना मात्र पर्याप्त समझा जा रहा है।
अस्तु, 'बलि वैश्वदेव' में श्रोत्रिय विद्वान् से लेकर कीट पतंग पर्यन्त सभी उपजीवियों को परितृप्त करने के अनन्तर ही गृहाध्यक्ष दम्पति को भोजन करने की आज्ञा है। धर्मशास्त्रों की इस व्यवस्था के नियमों को पढ़ते हुए सुस्पष्ट यह भान होने लगता है, कि हिन्दू धर्म में केवल मौज मजा उड़ाने के लिए ही किसी व्यक्ति को विवाह करने की आज्ञा नहीं दी जा सकती। जो, न केवल सब आश्रमों के ही पालन पोषण का भार उठाने को प्रतिज्ञाबद्ध हो किन्तु 'आब्रह्मस्तम्ब पर्यन्त' समस्त विश्व को परितृप्त करने के लिये अपने ऊपर दायित्व ले सके, वही व्यक्ति समावर्तन संस्कार की दीक्षा पा सकने का अधिकारी समझा जा सकता है।
यद्यपि बौद्ध शासन काल से ही अन्यान्य वैदिक प्रथाओं की भांति उक्त प्रथा भी बहुत शिथिल पड़ने लगी थी, परन्तु तब भी आद्य शंकराचार्य, श्री रामानुजाचार्य आदि धर्माचार्यों के प्रबल परिश्रम से यथा कथञ्चित् सुरक्षित रह पाई थी। गत सहस्राब्दी से तो अहिन्दू शासन के कारण राजसत्ता के नियन्त्रण बिना प्रायः नाम शेष ही रह गई है।
बलिवैश्वदेव के जटिल विधान का सुगम संक्षिप्त संस्करण पञ्चग्रासी है, जो जैसे तैसे भी धर्म रक्षण किये जाने के सद्विचार से यथाशासन प्रचरित हुआ है। बलिवैश्वदेव में जहां मण्डल बनाकर अमुक-अमुक दिशा में अमुक-अमुक देवता के नाम से अमुक-अमुक संख्याक ग्रास रक्खे जाते थे, वहां 'पञ्चग्रासी' में केवल पांच ग्रास और वे भी एक ही साधारण स्थान में रखने से शास्त्र विधान का रक्षण हो जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी के समय में ही बलिवैश्वदेव का स्थान पञ्चग्रासी ने ग्रहण कर लिया था। तभी तो रामचन्द्र जी की बारात की जोनार का वर्णन करते हुए गोस्वामी जी ने—'पञ्च कवलि करि जेमन लागे'—लिखा है।
बलिवैश्वदेव में समस्त ब्रह्माण्ड के प्राणियों को परितृप्त करने के लिये प्रत्याहार सिद्धान्त से काम लिया गया था। यह तो सभी जानते हैं कि कोई व्यक्ति अपने चार मुट्ठी भर भोजन में से अनन्त प्राणियों को साक्षात् खिलाकर परितृप्त नहीं कर सकता और नाही अनेक जीवों को, चिड़ियाघर को छोड़कर अन्यत्र कहीं इकठ्ठा किया जा सकता है। तथापि महर्षियों ने वैदिक दूरवीक्षण यन्त्र की सहायता से इस कठिनाई को सुगम बनाने के निमित्त प्रत्येक वर्ग के सर्वोत्तम और सर्वाधम जीवों को चुनकर विश्वपूजा का आदर्श उपस्थित किया था, जैसे मनुष्यों में सर्वोत्तम वेदपाठी ब्राह्मण हो सकता है और सर्वाधम श्वपाक चाण्डाल हो सकता है। पशुओं में सर्वोत्तम गौ और सर्वाधम कुत्ता, पक्षियों में गरुड़ और काक,—इस प्रकार उक्त सब जीवों को यथायोग्य ग्रास दिया जाता है। जैसे कोई भारत का सम्मान करने के निमित्त यदि यहां के किसी एक प्रतिनिधि का भी सम्मान करे तो वह समस्त देश का सम्मान समझा जाता है, ठीक यह व्यवस्था वैश्वदेव विधि में प्रस्तुत है। पञ्चग्रासी में केवल पांच ग्रास निकालने का भी यही तात्पर्य है। वेद में यत्र तत्र 'पञ्चजन' शब्द का बहुत प्रयोग आता है। भाष्यकारों ने,—देव, ऋषि, पितृ, मनुष्य और गन्धर्व, तथा चार वर्ण पांचवां निषाद, एवं उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज, जरायुज और मनसिज, इस प्रकार से विभिन्न अर्थ करके समस्त चराचर को पांच भागों में विभक्त किया है। लोक में भी समस्त मनुष्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था का नाम भी 'पंचायत' और 'पंचों में परमेश्वर' ये दोनों कहावतें प्रसिद्ध हैं।