अन्यान्य अहिंदू मतों में जहाँ मृत शरीर को जमीन में दफना देने=गाड देने मात्र की प्रथा पाई जाती है वहाँ आर्य शास्त्रों में भूमि में गाडना, अग्नि में फूंकना, जल में बहाना और निर्जन वन में छोड़ देना—ये चार प्रकार की विधियें पाई जाती हैं। 'किस दशा में कौन विधि बर्ती जाए एतदर्थ भी शास्त्रों में सूक्ष्म विचार किया गया है। जैसे अजातदन्त बालकों, कुष्ठियों और वैखानस सन्यासियों के देह भूमि में दबा देने चाहिएँ। शीतला आदि संक्रामक रोगों से मरने वाले व्यक्तियों के देह जलमें प्रवाहित कर देने चाहिएँ। परमहंस वर्णाश्रमातीत महात्माओं के देह को वन में विसर्जित कर देना चाहिए और सर्व साधारण के देह को अग्नि में भस्म कर देना चाहिए। वनों में विसर्जित करने वाली प्रथा तो केवल पारसी मत में दीख पड़ती है, अन्यान्य सभी प्रथाएँ नियमानुसार आज भी हिंदू जाति में यत्र तत्र सर्वत्र प्रायः देखने में आती हैं।
शास्त्रीय स्वरूप
(क) भस्मान्तं शरीरम्
(यजु ४०।१५)
(ख) ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः
(यजु)
अर्थात्—(क) अन्त में भस्म हो जाने वाला यह शरीर है। (ख) जिन पितरों के देह गाडे, वन में फेंके, आग में जलाए, और जल में बहाए गए हैं।
मुसलमान सज्जन आक्षेप किया करते हैं कि हिंदू लोग अपने प्यारे कुटुम्बियों के देह को बड़ी बेरहमी के साथ आग में फूंक डालते हैं, इस्लाम ऐसी बेवफाई की इजाजत नहीं देता। मालूम होता है मौलाना साहिब को अपनी दफनाई हुई लाशों की अन्तिम दुर्गति का राज मालूम नहीं। हिन्दू तो शुद्ध पवित्र अग्नि की चिता में एक बार ही अपने सम्बन्धियों के देह को भस्मसात कर डालता है, परन्तु मुसलमान तो मिट्टी में दबे, गले, सड़े अगणित कीड़े पड़े देहों को कण कण करके भयङ्कर कीड़ों की जाठराग्नि में—दोज़ख की आग में—जलाता है। कहना न होगा कि अन्त में हिन्दु और मुसलमान दोनों को अग्नि की ही शरण लेनी पड़ती है अन्तर केवल इतना है कि हिन्दू विशुद्ध अग्नि में और मुसलमान कीड़ों की जाठराग्नि में अपने सम्बन्धियों के कलेवरों को स्वाहा करता है। इसलिए सर्व साधारण व्यक्ति के देहों को गाडने के बजाए जलाना ही अधिक अच्छा है।
जलाने की प्रथा को अब तो दूसरे देशों के अहिन्दू विचारक भी महत्त्व देने लगे हैं, कई आधुनिक परलोक-विद्या-विशारदों का तो यहां तक कहना है, कि "जब तक मृत शरीर अविशिष्ट रहेगा तब तक उस में से निकलने वाला जीवात्मा व्यामोह में वहीं भटकता रहेगा—उसे तिल तिल गलता सड़ता देखकर देर तक असह्य कष्ट अनुभव करता रहेगा और लोकान्तर गमन का अपना भावि पुरोगम निश्चित न कर पाएगा। परन्तु जलाने की दशा में कुछ घन्टा मिनटों के अन्दर ही शरीर के भस्मसात् हो जाने पर एक बारगी ही 'आंख फूटी पीड़ भागी' के अनुसार निर्द्वन्द्व होकर लोकान्तर गमन का अगला प्रोग्राम निश्चित कर सकेगा। इसलिये मृतशरीर को ठिकाने लगाने वाली सब क्रियाओं में दाहकर्म ही सब से सस्ता, सरल और कल्याणकारी है।
लन्दन के सुप्रसिद्ध विचारक सर टोम्पसन ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'माडर्न क्रीमेशन-इट्स हिस्ट्री एण्ड प्रैक्टिस' में यह सिद्ध किया है, कि इटली आदि देशों में प्राचीन काल में शवदाह की प्रथा विद्यमान थी। इंग्लैंड के एक दूसरे महा-विद्वान् सर हर्बर्ट स्पेंसर ने तो मृत्यु से पूर्व अपने सम्बन्धियों को वसीयत की थी कि उनके मृत देह को जलाया जाए, ऐसा ही किया गया, जिस का भारी प्रभाव समस्त पाश्चात्य जगत् पर पड़ा। अब तो यह प्रथा यूरोपीय देशों में इतनी अधिक प्रचलित हो गई है कि खास लण्डन में ही कई सरकारी श्मशान बनाने पड़े हैं। इंग्लैंड के सुप्रसिद्ध नाटककार महा कवि बर्नार्डशा ने—जिन का कि गत वर्ष देहान्त हुवा था—अपनी बसीयत में अपने शव का दाह करने की हिदायत की थी।
कबरों के कारण संसार की कितनी उपयोगी भूमि आज व्यर्थ हो रही है इस ओर यदि प्रगतिशील लोग ध्यान दें तो इससे मानव समाज का बहुत बड़ा उपकार हो सकता है। अकेले भारत की ही लाखों बीघा जमीन मुर्दे मियाओं के कलेवरों ने काबू कर रखी है यदि इस गाड़ने की कुप्रथा का अति शीघ्र अन्त न किया गया तो एक दिन समस्त संसार ही कबरिस्तान के रूप में परिणत हो जाएगा। हर एक मरने वाले के लिये कम से कम तीन गज जमीन व्यर्थ बना डाले तो इसका अन्तिम परिणाम खेतों के अभाव में संसार का भूखों मरना और बेघर-बार हो कर समुद्र में डूब मरना ही हो सकता है।