जिस वार में सूर्योदय होता है उस समय 'होरा' भी उसी ग्रह की रहती है। एक अहोरात्रि में बारह लग्न होते हैं। और आधे लग्न को खगौलिक परिभाषा में 'होरा' कहते हैं। इस तरह अहोरात्र में चौबीस 'होरा' होती है नवीन गणना के अनुसार होरा को ही घन्टा भी कह सकते हैं। एक घन्टा पूरी अढ़ाई घड़ी का कल्पना किया गया है परन्तु हमारे गणित में तो बाल की भी खाल उतारने की परिपाटी है, क्योंकि हम गणित जैसे विषय में भी 'फरज' करने की प्रवृत्तिको कोरी मूर्खता समझते हैं।
'होरा' पूरी अढ़ाई घड़ीकी न होकर वह लग्नके परिमाण के अनुसार न्यून किंवा अधिक भी होती है। सो जिस वार में सूर्योदय हुआ उस समय तो उस ही ग्रह कक्षा के अनुसार होराएं होंगी। इस तरह सात ग्रहों के तीन चक्र हो जाने पर २१ होराएं समाप्त हो जाएंगी। चौथे चक्र में तीन ग्रहों की होरा बीतते २ चौबीस घन्टे का अहोरात्र समाप्त हो जाएगा। अतः पुनः नये अहोरात्र के समय क्रम प्राप्त चौथे ग्रह की होरा का अवसर है अतः वही वाराधिपति बनेगा, इसीलिए यह सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि ऊपर से नीचे क्रम से चौथा ग्रह आगामी दिन का वार माना जाएगा। यही सूर्य, चन्द्र, भौम, आदि वारों के क्रम का वैज्ञानिक हेतु है।
वर्ष और मासाधिपति की विवेचना का दिक्शूल से कोई सम्बन्ध नहीं है, अतः हम यहां अनावश्यक और अप्रासङ्गिक विस्तार से पराङ्मुख होते हुए पुनः प्रकृत विषय पर आते हैं। हां ! तो वार क्रम जान लेने पर यह भी जान लेना अत्यन्त आवश्यक है कि पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर ये प्रधान चार दिशाएँ हैं। पूर्व की आग्नेय, दक्षिण की नैऋत्य, पश्चिम की वायव्य और उत्तर की ऐशान्य, ये चार विदिशाएं हैं। सब मिलाकर साधारणतया आठ दिशाएं कही जाती हैं। अपनी २ कक्षा की विशेषता के कारण उक्त आठों दिशाओं के अधिपति माने गए हैं, जैसे पूर्व का अधिपति सूर्य, आग्नेय का शुक्र, दक्षिण का मंगल, नैऋत्य का राहु, (जो छायाग्रह होने के कारण स्थान और अपनी उच्चता के सम्बन्ध से बुध का प्रतिनिधि है) पश्चिम का शनि, वायव्य का चन्द्रमा, उत्तर का बुध और ऐशान्य का बृहस्पति।
दिक्शूल का रहस्य यह है कि अमुक दिशा को जाते हुए जो वार पड़े, यदि वही वार पीठ की दिशा किंवा विदिशा का स्वामी हो तो उस वार को उस दिशामें दिक्शूल समझना चाहिए। अर्थात् दिशा किंवा विदिशा के अधिपति को पीठ देकर यात्रा करना वैसा ही है जैसा कि किसी प्रार्थी का राजा के सामने, किंवा भक्त का प्रतिमा के सामने पीठ देकर खड़े होना। निःसन्देह यह चेष्टा उपास्य का एक प्रकार का अपमान ही है।
अब जरा दिक्शूल विषय को उदाहरण पूर्वक समझिए। यदि हम शनिवार को पूर्व दिशा को जाएं तो शनि महाराज की अधिष्ठित पश्चिम दिशा हमारी पीठमें पड़ेगी, इसलिए शनिवार को पूर्व में दिक्शूल हुआ। इसी प्रकार गुरुवार को दक्षिण को प्रस्थान करें तो गुरुकी दिशा ऐशान्य हमारी पीठमें रहेगी। रविवार को पश्चिम में जाते हुए सूर्याधिष्ठित दिशा पूर्व, हमारी पीठ में होगी और भौमवार को उत्तर में जाने पर भौम की अधिष्ठित दक्षिण दिशा हमारी पीठमें रहेगी। इसी प्रकार आग्नेयीके स्वामी शुक्र को पश्चिम में जाना, नैऋत्य के स्वामी राहु=तत्प्रतिनिधि बुध को उत्तर में जाना, वायव्य के स्वामी चन्द्र को पूर्व में जाना और ऐशान्य के स्वामी गुरु को दक्षिण में जाना वर्जित है। राहुके प्रतिनिधि-भूत बुध के कारण जहां इस दिन उत्तर में जाना वर्जित है, वहां उत्तर का स्वामी होने के कारण इस दिन दक्षिण को भी जाना निषिद्ध है। इस तरह यह दोनों ओर जाने में त्याज्य होने के कारण 'सर्वत्र निन्द्यो बुधवारदोषः' इस प्रवाद का पात्र बना है। कहना न होगा दिक्शूल की भांति यात्राकालीन विधि-निषेध भी जहां प्रमाण मूलक है वहां किसी न किसी वैज्ञानिक हेतु से भी परिपूर्ण है। ग्रन्थ विस्तार भयात् हम इस प्रसङ्ग में अधिक बातों पर प्रकाश डालनेमें असमर्थ हैं। अतः पाठक, अण्ड पिंड'—देश वैचित्र्य और वस्तु वैचित्र्य आदि वादों के अनुसार स्वयं तत्तत् विषयों के विज्ञान की कल्पना करके श्रीमती 'क्यों' का विसर्जन करें।