यहां एक आशङ्का यह भी की जा सकती है कि अहिन्दु लोग यात्रा मुहूर्त के बखेड़े में नहीं पड़ते, उन पर कुछ भी बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। हम ऐसी आशङ्का करने वालोंसे पूछना चाहते हैं कि हमने 'अण्ड पिण्ड' व्यवस्था के अनुसार जिस सिद्धान्त की स्थापना की है तुम पहिले उसका खण्डन करो, और यह सिद्ध करो कि सूर्यादिका मानवपिण्ड पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता, तब हम तुम्हारी क्यों का उत्तर देने के लिए बाध्य हैं। यह बात कोई भी भौतिकविज्ञान-वेत्ता सात जन्म में सिद्ध नहीं कर सकता। फिर जब विवश हो कर यह स्वीकार कर लिया जाता है, कि मानव पिण्ड पर ब्रह्माण्ड की तत्तद् वस्तुओं का अनिवार्य प्रभाव पड़ता है तब अहिन्दू उस प्रभाव से कैसे बरी माने जा सकते हैं। अतः हम उच्चैस्तरां कहेंगे कि प्रभाव तो यवन म्लेच्छ नास्तिक और आस्तिक सभी पर समान रूप से पड़ता है, परन्तु मुसलमान उसे 'खुदा की मर्जी' कह कर, ईसाई 'आरडर आफ गाड' कह कर और नास्तिक इत्तिफाकिया=बाई चांस 'ऐक्सीडैण्ट' बता कर, सन्तोष कर लेते हैं। इनमें नास्तिकों का उत्तर एक दम 'अवैधानिक, अननेचरल और मूर्खतापूर्ण है अर्थात् उन्होंने बिना कारण ही कार्य की उत्पत्ति स्वीकार करते हुवे अपनी बुद्धिका स्वयं दिवाला पीट डाला है। ईसाई मुसलमान आदि ईश्वरवादी लोगों ने खुदाका नाम लेकर कुछ कारण तो बताने की चेष्टा की है, परन्तु वे यह जानने में असमर्थ हैं कि आखिर-'खुदा की मर्जी' भी बिना कारण ही किसी पर गजब कैसे ढहा सकती है। यदि इतना अन्धेर हो तो फिर खुदा की न्यायशीलता में अन्तर पड़ता है।
ऐसी स्थितिमें भारतीय ऋषियोंकी ईश्वरवादिता इस प्रकार की अन्याय मूलक नहीं, किन्तु वे तो यह मानते हैं कि ईश्वर 'कर्तुं अकर्तुं मन्यथाकर्तुं प्रभु' होते हुवे भी 'कर्म फल दाता' है। मुसलमान ईसाई आदि पुनर्जन्म में विश्वास न रखने वाले मतवादियों से जब भी हमारा 'पुनर्जन्म—जिसे वे मसला तनासुक' कहते हैं, शास्त्रार्थ=मनाजरा हुवा, तो हमारे यह प्रश्न करने पर कि अमुक बालक जन्म से ही अन्धा पैदा हुवा देखा गया, सनातनधर्म की रीति से तो उसकी यह अन्धता पूर्वजन्मकृत पाप का परिणाम है, परन्तु पुनर्जन्म न मानने वालोंके यहां केवल खुदाकी गल्ती या गैरइन्साफीके सिवा इसे और क्या कहा जा सकता है, बस ! यह सुनते ही बड़े २ मौलाना और पादरी बगलें झांकने लग जाते हैं। हमारे भारतीय वैदिक विज्ञान में ईश्वर की इच्छा भी हमारे कर्म के अनुसार ही होती है वह इत्तिफाकिया, और 'बाई चांस' नहीं होती। जैसे नास्तिक ने पहिले ही उत्तर में बुद्धि का दिवालियापन प्रकट कर दिया तो इन खुदा-परस्त मोमिनों ने भी जिरह करने पर दूसरे ही प्रश्न का उत्तर देते हुवे 'मूल कारण' अन्वेषण की अपनी अक्षमता स्वीकार करली। हम पुनः डंके की चोट उद्घोषित कर देना चाहते हैं कि यात्रा का मुहूर्त न साधने पर अमुक बुराईके शिकार तो सभी होते हैं, परन्तु अपनी अज्ञतावश उस बुराई को अकारण समझ लेना या असली मूल-कारण को छोड़ कर एक मात्र बेचारे ईश्वर पर सब भार लाद देना—यह बात दूसरी है। हम सिद्धान्त रूप से नक्षत्रों का प्रभाव मानने के लिये सब मतवालों को बाध्य कर सकते हैं। अस्तु ! हम कतिपय यात्राकालीन प्रसिद्ध बातों पर विशेष प्रकाश डालने का प्रयत्न करते हैं।