जब रोगी का उपचार कर २ थक जाते हैं, और यह भान होने लगता है कि अब रोगी का शरीर न रहेगा तब सब बुद्धिमान् एक स्वर से यही कहने लगते हैं कि अब मुख में 'गंगाजल, और तुलसीदल डालो'।
गंगाजल और तुलसीदल का यह अन्तिम उपचार धार्मिक और आयुर्वेदिक दोनों ही दृष्टियों से लाभप्रद है, आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से तुलसीदल त्रिदोषघ्न महौषधि है। इस में पारद और सौवर्ण तत्त्वों का समावेश है, किसी भी रोग के शमन में इसका प्रयोग लाभदायक ही सिद्ध हो सकता है। गङ्गोदक के गुणों पर तो आज पाश्चात्य वैज्ञानिक आश्चर्य चकित हैं, वह चाहे अभी तक यह समझने में समर्थ नहीं हो सके कि आखिर समस्त रोगों के किटाणुवों का सद्य विनाश कर सकने की क्षमता गङ्गोदक में क्यों है ? परन्तु वे अनेक बार प्रत्यक्ष अनुभव कर के इतनी बात मुक्तकण्ठ से कहने को तैय्यार हैं कि कारण चाहे कुछ भी हो परन्तु गङ्गोदक में सर्व-रोग-कीटाणु-संहारिणी दिव्य शक्ति अवश्य है। अब तो फ्रांस आदि अनेक देशों के विशिष्ट होस्पिटलों में फिल्टर किया गङ्गोदक अनेक नामों से औषधियों की भांति बर्ता जाता है। सो उभय-दृष्टि से ही तुलसीदल और गङ्गाजल मुमूर्षु का परम कल्याण कारक है। यदि रोगी को अच्छा होना है तो इन दोनों वस्तुओं से बढ़कर अन्य कोई औषधि नहीं हो सकती और यदि आयु परिसमाप्त हो चुकी है तब भी इन दोनों वस्तुओं से बढ़कर अन्य कोई कल्याणकारिणी महौषधि नहीं हो सकती।
श्रीमद्भगवद्गीता आदि ग्रन्थों में प्राण प्रयाण के समय ॐकार के जाप की बड़ी महिमा लिखी है यथा—
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥
अर्थात्—ॐ यह एक अक्षर ब्रह्म है। जो इस का जाप करता हुवा तथा मेरा स्मरण करता हुवा देह त्याग करता है वह परम गति को प्राप्त होता है।
गो० तुलसीदासजी आदि सन्तों ने तो नाम को नामी से भी बड़ा माना है। वस्तुतः नाम है भी ऐसा ही—यह बात कहने सुनने और ऊहापोह द्वारा सिद्ध करने की नहीं किन्तु एकबार स्वयं करके देखने की है। हमारा अनुभव है कि जब अन्य सब लौकिक उपाय छूछे पड़ जाते हैं और मनुष्य अपने आपको अनाथ, विवश निराश्रित सा पाता है, उस समय यदि सौभाग्यवश भगवन्नाम स्मरण की सुबुद्धि आजाए तो डूबते को थाह सी मिल जाती है। मृत्यु के समय भी मनुष्य अपने आप को सर्वथा अनाथ और विवश सा ही अनुभव करता है। पसीना गिरने की जगह खून बहाने वाले इष्ट मित्र सगे सम्बन्धी सभी उस समय लाचार और निराश से दीख पड़ते हैं। ऐसे वक्त में सिवा भगवन्नामस्मरण के और क्या अवलम्ब हो सकता है ? निःसंदेह वे मनुष्य धन्य हैं जो उस समय असीम शोक सागर की उत्ताल तरंगों के थपेड़ों से मझधार में डूबती हुई अपनी जीर्ण शीर्ण जीवन नैय्या को चतुर खिवैय्या बलदेव के भैय्या कन्हैया के हाथ में सौंप कर उसी के पवित्र नाम की रट लगाते हुवे हंसते २ प्रस्थान करते हैं।
कुछ लोग यह भी जिज्ञासा किया करते हैं कि गीता में ॐकार के जाप का विधान है परन्तु आज कल तो अधिकांश लोग राम नाम का ही जाप करते हैं इसका क्या रहस्य है ?
ॐकार की बहुत बड़ी महिमा है। इसका दिग्दर्शन हमारे 'ॐकार और शिवलिंग' नामक पुस्तक में हुवा है, यह वेदों का बीज भूत महामन्त्र है, साक्षात् ब्रह्म है, परन्तु शास्त्र-रीत्या इस के जाप में अधिकारी अनधिकारी का भी विचार परमावश्यक है। शास्त्र में श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसी तो कल्पना भी नहीं कर सकता है कि वह ॐकार की महिमा-सूचक श्रुतियों पर तो विश्वास करे और अधिकार विशेष प्रतिपादक वाक्यों की उपेक्षा करने लगे। अतः मृत्युकालीन स्थिति में मुमूर्षु पवित्र न रह सकेगा यह ध्यान में रखकर शास्त्रों ने सर्व साधारण के कल्याणार्थ ॐकार के समान फलदायक किन्तु अधिकार विशेष बंधन से सर्वथा निर्मुक्त 'राम' नाम को अधिक महत्व दिया है।
कहना न होगा कि प्रयाण काल में ॐकार के उपांशु जाप का विधान इसलिये है कि 'ॐ ॐ' ऐसा उच्चारण करने मात्र से प्राणों की ऊर्ध्वगति स्वयमेव होने लगती है। इस तरह इस मन्त्र के जाप से भी उपरितन द्वार से प्राण प्रयाण के मूल सिद्धान्त का ही संरक्षण होता है, सो जैसे ओंकार का उच्चारण प्राणों की ऊर्ध्वगति करने की क्षमता रखता है वैसी ही बल्कि उससे भी कुछ अधिक तारक मन्त्र 'राम' नाम रखता है। शब्द स्फोट के सिद्धान्तानुसार प्रत्येक अक्षर के उच्चारण से एक खास प्रकार का वातावरण उत्पन्न होता है। त्रिकालज्ञ महर्षियों ने अपनी 'ऋतम्भरा' प्रज्ञा द्वारा जब इस तत्त्व को अनुभव किया तो उन्होंने अधिकार विशेष की सीमा में आबद्ध ओंकार के स्थान में सर्व-जन-सुलभ, 'राम' नाम का प्रचार किया।
मृत्युकालीन दानों में दीप दान का बहुत महत्त्व है, अनेक देशों में बड़ी तत्परता पूर्वक इस के करने की परिपाटी पाई जाती है यह क्यों ? इसका रहस्य बड़ा ही मननीय है।
विज्ञान का यह सर्वतन्त्र सिद्धान्त है कि प्रत्येक अंग अपनी अंगी के पास पहुँच कर ही विश्राम लेता है। जैसे ऊपर को फेंका मिट्टी का ढेला पुनः भूमाता की गोद में बैठ जाता है और पानी का रेला अनवरत गति से प्रवाहित हो कर अपने उत्पत्ति-स्थान समुद्र में पहुँच कर ही विश्राम लेता है, इसी प्रकार अग्नि का गोला भी अबाध गति से चलता चलता अग्नि तत्त्व के एक मात्र उद्गम केन्द्र सूर्य पिण्ड तक पहुँच कर ही रुकता है। सो मरने वाले प्राणी का जीवात्मा वाग् आदि सत्रह तत्त्वों के सूक्ष्म शरीर में प्रविष्ट हो कर अपने सद्य त्यक्त शरीर से निराश हो कर जब लोकान्तर जाने को उद्यत हो जाता है, उस समय उस में मार्ग खोजने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। किधर जाऊँ ? कहाँ जाऊँ ?—बार २ ऐसा सोचता है। सो उसकी इस प्रवृत्ति को कार्यान्वित करने के लिये तात्कालिक दीपदान बहुत सहायक सिद्ध होता है। दीपक में होने वाला पार्थिव तत्त्व बत्ती की भस्म या काजल के रूप में अवशिष्ट पड़ा रहता है और जलीय तत्त्व धूमशिखा बन कर बादलों में विलीन हो जाता है, परन्तु विशुद्ध आग्नेय तत्त्व मुमूर्षु के स्थान से चल कर सूर्य मण्डल पर्य्यन्त पहुँच कर ही शान्त होता है। इस तरह दीपदान से जीवात्मा को अभिमत प्रशस्त मार्ग की उपलब्धि होती है कर्मानुसार उसे जिस लोक में भी पहुँचना है यह अर्चिमार्ग ब्रह्माण्डवर्ती उन सब लोक लोकान्तरों को लांघता हुवा सर्वोत्कृष्ट उपरिवर्ती द्युलोक पर्य्यन्त पहुँचता है। जीवात्मा इस के द्वारा कर्म्मानुसार यथेष्ट लोक को पहुँच जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता आदि ग्रन्थों में अर्चिमार्ग की बहुत प्रशंसा की है, हमारे शास्त्रों में सर्व साधारण व्यक्ति के लिये भी केवल टका भर गोघृत के व्यय से अपने घर से लेकर उद्दिष्ट स्थान पर्य्यन्त 'अर्चिमार्ग' बना देने की यह दीपदान-विधि कितनी सस्ती, कितनी सरल एवं कितनी महत्त्वपूर्ण है यह मनन किये ही बनती है।