चंक्रमण के बाद भोक्ता को बांई करवट से लेटना चाहिये—ऐसी शास्त्र की आज्ञा है यथा—

वामपार्श्वेण संविशेत्।

अर्थात्—भोजनानन्तर बांई करवट से विश्राम करना चाहिये।

हम प्राणायाम प्रकरण में यह प्रकट कर आये हैं, कि मनुष्य के शरीर में नासिका के जो दो छेद हैं, उनमें क्रमशः बांया चांद है और दांया सूर्य है। अपने-अपने नामानुसार यह दोनों शरीर में ठण्डक और गर्मी का तारतम्य ठीक रखते हैं। यह बात प्रत्यक्ष देखी जा सकती है, कि बांई करवट से लेटने पर दांया=सूर्य स्वर चलने लगता है और इसी प्रकार दांई करवट से लेटने पर स्वभावतः बांये=चन्द्र स्वर से श्वास आने लगता है। सो भोजन के परिपाक के लिये जाठराग्नि का उद्दीप्त होना अभिप्रेत है। इसलिये बांई करवट लेटने से ही लाभ हो सकता है।


शास्त्र में मल मूत्र त्याग और स्नान भोजन के सम्बन्ध में कुछ ज्ञातव्य विशेष नियम लिखे हैं यथा—

सन्देहेऽपि द्वयं कुर्य्यात्सन्देहेऽपि द्वयं नहि।
कुर्य्यान्मूत्रपुरीषे द्वे, न कुर्य्यात्स्नान-भोजने॥
(शिष्टस्मृति)

अर्थात्—स्वास्थ्य में गड़बड़ी होने के समय 'करूँ या न करूँ'-ऐसा सन्देह हो जाने पर दो काम करने चाहिये और दो काम न करने चाहिये, यदि मल मूत्र के त्याग की शङ्का हो तो वे दोनों त्याग ही देने चाहियें। परन्तु यदि स्नान और भोजन में विचिकित्सा हो तो ये दोनों काम नहीं करने चाहिये।

कारण सुस्पष्ट है, कि आलस्यवश मल मूत्र के निरोध में तो रोग उत्पन्न हो जाने की सम्भावना है, परन्तु त्यागने की दशा में शौच की शङ्का न होने की अवस्था में भी किसी प्रकार की हानि की सम्भावना नहीं। ठीक इसी प्रकार अजीर्ण खट्टी डकार और अरुचि होने पर भी जिह्वालौल्यवश पुनरपि भोजन ठूंस लेने की दशा में तथा सर्दी जुकाम ज्वरांश होने पर भी स्नान करने की अवस्था में तो रोग बढ़ने की सम्भावना है, न करने पर कोई खतरा नहीं।


ग्रीष्म ऋतु के अपवाद को छोड़कर अन्य किसी भी ऋतु में बाल वृद्ध रुग्ण और रात भर जगे पुरुष के अतिरिक्त सर्व साधारण को दिन में नहीं सोना चाहिए-यह शास्त्राज्ञा है यथा-

दिवास्वापं च वर्जयेत्

अर्थात्—दिन में नहीं सोना चाहिए।

यह क्यों ? इसकी हेतु परम्परा बतलाते हुए आयुर्वेद में लिखा है, कि दिन में सोने से 'प्रतिश्याय' जुकाम हो जाता है, वह चिरस्थायी होकर 'कास' रोग को उत्पन्न करता है, कास ही आगे चलकर 'श्वास' रूप में परिणत हो जाता है। श्वास के प्राबल्य से फुफ्फुस=फेफड़े खराब हो जाने पर 'क्षय' तपेदिक (T B) जैसा असाध्य रोग बन जाता है। कहना न होगा, कि इस हेतु परम्परा का सभी भुक्तभोगी व्यक्ति समर्थन कर सकते हैं। जीवन में अनेक बार ऐसे अवसर आते हैं जब कि दिन में—आलस्यवशात् सो जाने पर प्रतिश्याय का आक्रमण हो जाता है। शास्त्र मर्य्यादा का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को प्रकृति कभी क्षमा नहीं कर सकती। कारणान्तर से, दण्ड मिलने में देर हो सकती है, परन्तु न मिले ऐसा अन्धेर नहीं।