हम पीछे सिद्ध कर चुके हैं कि 'अण्ड-पिण्ड-वाद' सिद्धान्त के अनुसार तत्तत् ग्रह नक्षत्र पिण्डों का मानव पिण्ड पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है और यात्रा के समय भी उन सब की अनुकूलता सापेक्ष्य है। अपनी २ कक्षा में जिस प्रकार ग्रहों की अवस्थिति है, इसी प्रकार शनि कक्षा से ऊपर नक्षत्र कक्षा का स्थान है। ग्रहों की भांति नक्षत्रों में भी अनेक वैचित्र्य विद्यमान हैं जिन्हें 'देश वैचित्र्यवाद' और वस्तु वैचित्र्यवाद' के अनुसार भली भांति मनन किया जा सकता है, जो नक्षत्र जैसा विशेष गुण रखता है और मानव पिण्ड पर उसका जैसा प्रभाव पड़ता है तदनुसार ही उस २ नक्षत्रके देवता के नाम की कल्पना की गई है। यह कल्पना कोरी कल्पना नहीं बल्कि 'यथा नाम तथा गुणः' के अनुसार जिस देवता का जैसा नाम है वह वैसा ही फलदायक है। जैसे कृतिका नक्षत्र का अधिष्ठाता अग्नि है तो, उक्त नक्षत्रकी कक्षा आग्नेय परमाणुओं से व्याप्त रहती है। भरणी नक्षत्र का देवता यम=मृत्यु है तो आकाश का यह प्रदेश संहारक गैस से उपप्लुत रहता है। इसी प्रकार शतभिषज् का देवता वरुण=पर्जन्य है, तो उक्त नक्षत्र के चारों ओर जलीय परमाणुओं के सघन पटल सदैव परिव्याप्त रहते हैं।

हमने 'अण्डपिण्डवाद'में सिद्ध किया है कि मानव पिण्ड का सब कुछ उक्त ब्रह्माण्डवर्ती तत्तत् पिण्डों की ही देन है, हमारी अमुक शक्ति का मूल स्रोत उक्त ग्रह नक्षत्रात्मक पिण्ड ही हैं। जैसे 'पावर हाउस' की खराबी से समस्त नगर में अन्धेरा छा सकता है और 'वाटर वर्क्स' की खराबी से शहर भर प्यासा मर सकता है ठीक इसी प्रकार उक्त पिण्डों की अनुकूलता किंवा प्रतिकूलता से मानव पिण्ड परिपुष्ट और उपद्रुत हो सकता है।

जैसे लोक में प्रत्यक्ष है कि ग्रीष्म ऋतु में सामने का सूर्य यात्री को चकाचौंध करता है और शिरदर्द आदि अनेक व्याधियों का कारण बन जाता है इसी प्रकार अन्यान्य अमुक ग्रह और नक्षत्र भी अपने से सम्बद्ध तत्त्व पर बुरा या भला प्रभाव अवश्य डालता है। हम उसे सूक्ष्म होने के कारण चाहे सहसा अनुभव न कर पाते हों, परन्तु कोई भी सिद्धान्तवादी हमारी इस स्थापना=मान्यता से इन्कार नहीं कर सकता। अन्तर केवल इतना है कि सूर्य शारीरिक दृष्टि से दायें नेत्र पर प्रभाव डालेगा तो चांद बायें पर डालेगा, वह आत्मा को प्रभावित करेगा तो चांद मन को उद्वेलित करेगा। मंगल रक्त संचार='ब्लड प्रसर' को उत्तेजित करेगा, बुध बोलती बन्द कर देगा—कई बार प्रत्यक्ष देखने में आता है कि बड़े २ प्रगल्भ वक्ता अमुक समय मूक हो जाते हैं, समय पर उचित बात भी कहना भूल जाते हैं। अपनी इस अतर्कित मूकता के कारण वे कई प्रकार की हानि भी उठा लेते हैं, समय निकल जाने पर जब दूसरे लोग कहते हैं कि आज तुम चुप क्यों हो गए ? तब वक्ता स्वयं भी अपनी भूल पर बहुत पश्चात्ताप करता है, परन्तु—'समय चूकि पुनि का पछिताने' कहना न होगा कि उसकी इस प्रवृत्तिमें 'दैव' ही हेतु है। वैज्ञानिकोंकी दृष्टि में कोई भी कार्य निर्हेतुक नहीं होता हमारे महर्षि भी 'सति मूले तद् विपाकः' सिद्धान्त के पक्षपाती हैं। समस्त अज्ञात कारणों का ही एक समष्टिनाम 'दैव' है। आस्तिक समुदाय संक्षेपमें किसी भी अज्ञात हेतु को दैव कहकर संतोष करते हैं। परन्तु वैज्ञानिकदृष्टि से जब उस अनेकता का विश्लेषण किया जाता है तो वह एक ही 'दैव' अनेक नामों से सामने आता है। इसी व्यष्टि के अनेक नाम ग्रह, नक्षत्र, पञ्च महाभूत आदि कहे जा सकते हैं।