तेरह वर्ष के बाद जब बृहस्पति सिंह राशि में आता है तब विवाह नहीं होते, क्यों ?—इसलिये कि—'अण्ड पिण्ड वाद' के अनुसार सूर्य पिण्ड से पचास कोटि योजन सब ओर परिधि वाले आकाश प्रदेश को एक ब्रह्माण्ड कहते हैं और उपरितन कटाह को 'द्यौ' कहते हैं। इन दोनों कटाहों को ज्योति शास्त्र के अनुसार ३६० विभागों (अंशों) में बांटा जाता है सो उनमें से आधे १८० अंश भूमण्डल द्वारा दृश्य रहते हैं और आधे अदृश्य। यही कारण है कि हम एक मैदान में जब खड़े होते हैं तो क्षितिज से बनने वाले कटाह को अपने शिर पर छतरी की तरह देखा करते हैं। यही तीन सौ साठ अंशों वाला आकाश, नक्षत्र गणना के अनुसार २७ भागों में विभक्त है। सवा दो नक्षत्रों के एक समुदाय का नाम ज्योति शास्त्रीय परिभाषा के अनुसार 'राशि' है अर्थात्—एक अर्ब योजन प्रमाण वाले ब्रह्माण्ड के तीन सौ साठ अंशात्मक गोल के तीस अंश परिमित प्रदेश को एक राशि कहते हैं। इस तरह कुल ब्रह्माण्ड बारह राशियोंमें विभक्त है, उनमें से केवल छः राशि ही पृथ्वी मण्डल पर दृश्य रहती हैं और छः अदृश्य रहती हैं। एक अहोरात्र में क्रमशः बदलती हुई ये बारह राशियें एक चक्र में सब दृश्य और सब अदृश्य हो जाती हैं। क्षितिज पर प्रथम ही जब सूर्य दीख पड़ता है उस स्थान को उदयाचल मानकर सूर्य राशि के अनुसार उस समय वही लग्न माना जाता है। इस तरह सूर्यास्त के समय सातवां और आधी रात के समय दसवां लग्न आता है। 'प्रत्यक्ष और परोक्षवाद' की विवेचना के प्रसंग में हम ग्रहों का पश्चिम की ओर जाना सिद्ध कर आए हैं, तदनुसार उदयाचल पर यदि मेष राशि है तो वृष निश्चित ही उसके अधोभाग में अवस्थित है तभी सूर्य आदि ग्रहों का पश्चिम से पूर्व की ओर जाना सम्भव है इस तरह क्रमशः मेष वृष आदि द्वादश राशियों का चक्र है।
इस प्रसङ्ग में यह प्रकट कर देना भी आवश्यक है कि अश्विनी भरणी कृत्तिका रोहिणी आदि सत्ताइस नक्षत्रों और मेष वृष आदि द्वादश राशियों के जो नाम नियत किए गए हैं वे भी भारतीय ऋषियों के अलौकिक वेद विज्ञान के ज्वलन्त उदाहरण हैं। अकारण ही उन्हें वैसा नहीं कहा जाता किन्तु जिसका जैसा नाम है आकाश में उसका वैसा ही तारागण निर्मित स्वरूप भी प्रत्यक्ष देखा जासकता है। मृगशिर नक्षत्र को प्रायः किसान भी जानते हैं, वे उसे हिरणी नाम से स्मरण करते हैं। कहना न होगा कि मृगी और हरिणी दोनों समान शब्द हैं। वे प्रायः कहा करते हैं कि आगे २ हिरणी दौड़ती है पीछे २ कुत्ता और शिकारी। निःसन्देह मृगशिर के तीन तारे और उसके पीछे मृग व्याध (जिसे 'अमरकोश'कार ने 'इल्विलास्तच्छिरोदेशे तारका निवसन्ति याः' ऐसा कहते हुवे 'इल्विला' के नाम से स्मरण किया है) इसीप्रकार के जान पड़ते हैं। इन की स्थिति को व्यक्त करने के लिए इस से उत्तम अन्य कोई नाम नहीं हो सकता। इसी प्रकार इस हिरणी से पश्चिम की ओर कुछ ऊपर 'रोहिणी' नक्षत्र दीख पड़ता है। रोहिणी का अक्षरार्थ है, 'यान'=गाड़ी। सो यह नक्षत्र भी पांच तारों का एक समूह है जो ठीक गाड़ी के ढांचे की भांति अंग्रेजी के अक्षर V के समान है। इसी प्रकार अन्यान्य सब नाम सार्थक हैं।
हमारी इस सब विवेचना का तात्पर्य यह है कि पाठक द्वादश राशियों से परिचित हो जाएं। अब द्वादश राशियों की स्थिति समझ में आजाने पर यह भी जान लेना चाहिए कि सूर्यादि ग्रहों की क्रमिक अवस्थिति पृथ्वी से दूरी के अनुपात से इस प्रकार मानी जाती है—
भूमेः पिण्डः शशाङ्कज्ञकविरविकुजेज्यार्किनक्षत्रकक्षाः।
अर्थात्—भूमि, चन्द्र, बुध शुक्र, सूर्य मंगल, बृहस्पति, शनि और नक्षत्र इस क्रम से सब ग्रहों की कक्षा है।
राहु केतु स्वतन्त्र ग्रह नहीं, छाया ग्रह हैं इसलिए हमारी इस स्थापना में उनका नाम नहीं आता है। यही कारण है कि उनको वार गणना में अधिकार नहीं मिला। सो जैसे सात मुख्य ग्रहों के नामों पर सात ही वार नियत हुए हैं—जिनका रहस्य आगे प्रकट किया जायगा—इसी प्रकार उक्त द्वादश राशियों में भी सूर्य और चन्द्रमा को एक २ राशि का आधिपत्य मिला है और मङ्गल बुध गुरु शुक्र और शनि इन पांचों को दो दो राशियों का स्वामित्व प्राप्त है। राशिचक्र को एक किले की भांति समझ लेना चाहिए जिसके द्वार के पूर्व पार्श्व में सिंह राशि अवस्थित है, और माला की भांति क्रमशः कन्या, तुल, वृश्चिक आदि राशिएं मण्डलाकार में कोट बनाती हुईं अन्त में द्वार के पश्चिम पार्श्व में अवस्थित हैं। इन दोनों राशियोंको सम्भाले तो ये दोनों वीर (सूर्य चन्द्र) खड़े हैं। सिंह के पीछे कन्या और कर्क के पीछे विलोम क्रम से मिथुन अवस्थित है, अपनी कक्षा के अनुसार यहां बुध की स्थिति है अतः वही इन दोनों का संरक्षक है। कन्या के पीछे तुल है और उधर मिथुन के पीछे विलोम क्रम से वृष है। बुध के बाद शुक्र की कक्षा है अतः यहां वह विराजमान है और इन दोनों राशियों की रक्षा करता है। तुल के पीछे वृश्चिक और दूसरी ओर वृष के पीछे मेष की स्थिति है, इन दोनों की रक्षा अपनी कक्षा के अनुसार मंगल करता है। वृश्चिक के पीछे धन और दूसरी ओर मेष के पीछे मीन अवस्थित है। अपनी कक्षा के अनुसार इन दोनों का अधिष्ठाता गुरु है, धन के पीछे मकर और दूसरी ओर मीन के पीछे कुम्भ का होना स्वाभाविक है अतः पृथिवी से सुदूर ब्रह्माण्ड की अन्तिम कक्षा में शनि महाराज विराजमान हैं, इन दोनों का स्वामित्व आपके सुपुर्द है। बस ! यही राशि और उनके स्वामियों का विवेचन है। एतावता मेष का स्वामी मङ्गल ही क्यों ? बुध क्यों नहीं ? इत्यादि समस्त 'क्योंओं' का भी यहां समाधान हो जाता है।
हां, तो प्रश्न है कि सिंह के बृहस्पति में विवाहादि शुभ कृत्य क्यों नहीं होते ? हम कह चुके हैं कि सिंह राशि का पति सूर्य है जब सूर्य की राशि में गुरु आएगा तो उस समय आधिभौतिक दृष्टि से मानवपिण्ड की सूर्य सम्बद्ध आत्मा में ज्ञान के केन्द्र गुरु का प्रवेश होगा। ऐसे ज्ञान साधना के अपूर्व अवसर से लाभ न उठाकर उसे विवाह आदि सांसारिक प्रवृत्तिवर्धक रजोगुणी कृत्यों में अपव्ययित करना वैसा ही है जैसा कि सन्ध्या वन्दन के समय में गप्पशप्प हांकना और ब्रह्म मुहूर्त में नींद लेना। शास्त्र में ये दोनों कृत्य समय से लाभ न उठाने के कारण पाप ही कहे गए हैं। इसी प्रकार पूरे तेरह वर्ष के बाद सिंहगत गुरु का सुयोग आता है आयु भर में गिनती के ही ऐसे अवसर आ सकते हैं। विवाहादि लौकिक प्रपञ्च तो आयुभर ही चलते रहेंगे, अतः आत्मा और ज्ञान के अपूर्व संगम को सब प्रपञ्च छोड़कर परमार्थ साधना में ही बिताना चाहिए [ इसीलिए सिंह गत बृहस्पति में गोदावरी का कुम्भ पर्व नियत है ] सिंह गत गुरु में विवाह निषेध का यह एक आधिभौतिक कारण बताया जा सकता है।
आधिदैविक दृष्टि से—
आधिदैविक दृष्टि से गुरु समस्त देवताओं का गुरु होने के नाते सूर्यदेव का भी पूज्य गुरु है। जब शिष्य के घर में गुरु का आगमन हो तो शिष्य को गुरु सेवा से अवकाश कहां ? हमारे ब्रह्माण्ड का नियन्ता सूर्य है, उसकी साक्षी में हमारे सब कर्म सम्पन्न होते हैं। इसीलिए सूर्य का अन्यतम नाम 'कर्मसाक्षी' भी है। सब कर्म करने के अनन्तर सूर्य को अर्घ्य अञ्जलि देते हुए—'कर्मसाक्षिणे नमः' कहकर ही आस्तिकजगत् प्रणाम करता है।
सूर्य के घर सिंह राशि में गुरुदेव के पधारने पर सुयोग्य शिष्य को साक्षी देने की फुरसत कहां ? जैसे जज साहिब के यहां अमुक आवश्यक कृत्य होने के कारण उस दिन मुकद्दमे न हो सकेंगे किन्तु आगे की तारीख पड़ जायगी। ठीक इसी भांति जब सूर्य भगवान् गुरुसेवा रूप अपने घरेलू आवश्यक कार्य में व्यस्त हैं तब वे साक्षी देने की स्थिति में नहीं हैं। वेद भगवान् ने सूर्य भगवान् की छुट्टी की दरख्वास्त पर सदा के लिए लिख दिया कि जब कभी गुरुदेव पधारे आप उनकी सेवा के लिए स्वतन्त्र हैं, यदि पावाजी हजार बार भी आवाहन करे तो बेशक न जाएं। उसी दिन से शास्त्र में भी इस भगवदाज्ञा का उल्लेख हो गया।