वार क्या है ? वे सात ही क्यों हैं ? और इन का यही क्रम क्यों है ?—इस सम्बन्ध में यह जान लेना आवश्यक है कि हमारे ब्रह्माण्ड का प्रधान अवलम्ब सूर्य भगवान् हैं। इसी भांति अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों के भिन्न २ सूर्य हैं जिन पर तत्तत् ब्रह्माण्डों की अवस्थिति होती है। जैसे शासन तन्त्र को चलाने के लिए प्रधान शासक के साथ अनेक सहयोगियों का मन्त्रीमण्डल भी रहता है, इसी प्रकार सूर्य के साथ चन्द्र आदि छः ग्रह भी हमारे ब्रह्माण्ड के अन्यतम संरक्षक हैं। इन्हीं सात प्रधान ग्रहों के नाम पर सात वार नियत किए गए हैं। यह हम पूर्व ही कह चुके हैं कि राहू केतु छायाग्रह होने के कारण इस गणना में नहीं आते। नक्षत्रों के नाम पर सत्ताइस नक्षत्र नियत हैं। इनका यह क्रम क्यों है ? अर्थात् सूर्य के बाद चन्द्र और चन्द्र के बाद मङ्गल क्यों है ? यह भी एक रहस्यपूर्ण विज्ञान है। मौलाना से यदि पूछा जाए कि पहिले इतवार क्यों फिर पांचवां जुम्मेरात क्यों ? और फिर तुम्हारा सर्व प्रधान वार जुम्मा—बिचारा छठे नम्बर पर अपमानित क्यों ? बस वे मिमियाते नौ दो ग्यारह हो जाएँगे।
इसी तरह पादरी साहिब भी 'सन्डे' के बाद 'मंडे' और 'मंडे' के बाद 'ट्यूजडे' के क्रम पर कुछ नहीं कह सकेंगे। शङ्काऽऽतङ्क-पङ्काब्धि-मयङ्क, दयानन्दी और 'माई ओपीनियन' के प्रबल पुजारी नास्तिक भी इस सम्बन्ध में 'मौनावलम्बन' के सिवा कुछ न कह सकेंगे।
परन्तु भारतीय ऋषियों ने वार क्रम के सम्बन्ध में लिखा है कि—
(क) मन्दामरेज्यभूपुत्राः सूर्यशुक्रेन्दुजेन्दवः।
परिभ्रामन्त्यधोऽधस्थाः सिद्धविद्याधरा घनाः ॥
(सूर्य सिद्धान्त १२-३१)
(ख) मन्दादधः क्रमेण स्युश्चतुर्था दिवसाधिपाः।
वर्षाधिपतयस्तावत् तृतीयाश्च प्रकीर्तिताः ॥
ऊर्ध्वक्रमेण शशिनो मासानामधिपाः स्मृताः।
होरेशाः सूर्यतनयाद् अधोऽधः क्रमशस्तथा ॥
(सूर्यसिद्धान्त १२।७८-७९)
अर्थात्—(क) शनि, बृहस्पति, मङ्गल, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्र इस क्रम से एक दूसरेके नीचे २ ये सब ग्रह पृथ्वीसे दूर अवस्थित हैं। अर्थात् चांद पृथ्वी से सबसे निकट है और शनि सबसे दूर है। चन्द्र और पृथ्वी के बीच क्रमशः मेघ, विद्याधर और सिद्ध विचरते हैं। (ख) शनि से नीचे २ क्रमशः प्रत्येक चौथा ग्रह दिन का अधिपति होता है, (अर्थात्—शनि कक्षा से नीचे चौथी कक्षा में सूर्य है, सो शनि के बाद सूर्यवार होगा और सूर्य से चौथी कक्षामें चन्द्रमा अवस्थित है तीसरा वार चन्द्र होगा। पुनः चन्द्र से चौथी कक्षा में भौम आता है, यही चौथा वार होगा, भौम से चौथा बुध आता है, अतः क्रम प्राप्त यही पांचवां वार होगा, और बुध से चौथा पुनः बृहस्पति और उससे चौथा शुक्र, बस ! सातों वारों का क्रम आगया।) इसी क्रम से नीचे २ तीसरा ग्रह वर्ष का अधिपति होगा, और चन्द्र के ऊर्ध्व क्रम से अर्थात् ऊँचे २ क्रम से महीनों के अधिपति होंगे और शनि से नीचे २ क्रम से 'होरा' के अधिपति होंगे।
प्रस्तुत चित्र से यह तत्त्व भली भांति समझ में आ जाएगा—
शनि, बृहस्पति, मङ्गल, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्र,—इस क्रम से ग्रह कक्षा है।