मुहूर्त विज्ञान उपक्रम में हमने यह भी चर्चा की थी, कि न केवल विवाहादि शुभ कृत्यों के लिये हम मुहूर्त साधते हैं अपितु हमारे पूर्व पुरुष तो आज की भांति बिना मुहूर्त मरने तक के लिए भी प्रस्तुत नहीं थे। अर्थात् मरने का भी मुहूर्त साध कर तभी मरते थे और यदि कदाचित् मुहूर्त नहीं बनता था तो वे अपना मरना भी स्थगित कर देते थे।

आर्य जाति के गौरव पूर्ण इतिहास ग्रन्थ महाभारत में वर्णन आता है कि महाभारत के संग्राम के समय जब नौ दिन में ही भीष्मपितामह द्वारा कौरवसेना का संचालन करते हुए पांडवों की आधी से अधिक सेना वीरगति को प्राप्त हो चुकी तो पांडवों ने मिलकर मन्त्रणा की कि जबतक भीष्मजी नहीं मरते तबतक पांडवों की विजय असम्भव है। श्रीकृष्ण भगवान् ने प्रस्ताव किया कि भीष्म के मरने का उपाय महाराजा युधिष्ठिर भीष्मपितामह से ही पूछें। सदाकी भांति रातमें जब युधिष्ठिर भीष्म जी के चरण चापने गए तो—संकोचवश पूछ न सके। भीष्मजी ने स्वयं उनको उन्मना सा देखकर कारण पूछा और आखीर युधिष्ठिरजीने कड़ा हृदय करके कह ही डाला—पितामह आपके जीते हमारी विजय असम्भव है। यदि आप धर्म की जीत चाहते हैं तो शीघ्रातिशीघ्र निर्वाण प्राप्त कीजिए। भीष्मजी बहुत हंसे और बोले कि अच्छा पुत्र, ज्योतिषियों को बुलाकर मुहूर्त दिखाइए, मुझे मरने में कुछ आपत्ति नहीं। अन्यतम पांडव सहदेव महा ज्योतिर्विद् थे, तत्काल मुहूर्त साधने बैठे, परन्तु दक्षिणायन के कारण मुहूर्त अभी महीनों नहीं बनता था। सहदेवजी ने सत्य बात प्रकट की तो युधिष्ठिर निराश होकर युद्ध से उपरत होने की बात सोचने लग पड़े।

अन्त में नैष्ठिक ब्रह्मचारी भीष्मजी ने कहा कि पुत्र ! यद्यपि तुम्हारी जल्दीमें मैं बिना मुहूर्त प्राण त्यागने के लिए तय्यार नहीं तथापि जिससे तुम्हारा काम बन जाए ऐसा उपाय बता देता हूं। कल रणस्थल में मेरे सामने 'शिखंडी' को खड़ा कर देना, मैं उसे भूतपूर्व स्त्री समझकर पीठ मोड़ लूंगा, तब तुम यथातथा मुझे गिरा देना, इसतरह तुम्हारा कार्य सिद्ध हो जाएगा और मैं मुहूर्त की प्रतीक्षा करूंगा। अगले दिन ऐसा ही किया गया। यह कथा सभी जानते हैं कि उत्तरायण काल की प्रतीक्षा में भीष्म जी शरशय्या पर बहुत समय तक पड़े रहे, और अनेक धर्मोपदेश देते रहे। जब गीताप्रोक्त प्राण त्याग का सुमुहूर्त आया तभी प्राण छोड़े।

इस प्रकार आर्य जाति में अनेक महापुरुष 'स्वच्छन्द मृत्यु' हुए हैं। मरने के मुहूर्त के सम्बन्ध में श्रीमद्भगवद् गीता में सुस्पष्ट लिखा है कि—

शास्त्रीय स्वरूप

(क) अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥
(ख) धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।
तत्र चान्द्रमसं ज्योति योगी प्राप्य निवर्तते ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता ८।२४-२५)

अर्थात्—(क) अग्नि, ज्योतिः दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छः मास—इस मुहूर्त में जो ब्रह्मवेत्ता परलोक को प्रयाण करते हैं, वे ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। (ख) धूम रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छः मास—इस मुहूर्त में जो योगी शरीर छोड़ते हैं वे चन्द्रलोक तक जाकर पुनः मृत्युलोक में जन्म लेते हैं।

उपर्युक्त प्रमाणों में उत्तरायण शुक्लपक्ष और दिन को मृत्यु के लिये उपयुक्त समय बतलाया है, दक्षिणायन, कृष्णपक्ष और रात को अनुपयुक्त बतलाया है। पहिले मुहूर्त में शरीर त्याग से मोक्ष और दूसरे में मरण से 'पुनरपि जननं पुनरपि मरणम्' का वही जटिल जाल ! यद्यपि कुछ भाष्यकारों ने उक्त श्लोकों की व्याख्या में अर्थान्तर करने का भी प्रयत्न किया है, परन्तु ऐसे सुस्पष्ट शब्दों की विद्यमानता में तथा श्री भीष्म जी द्वारा उत्तरायण की प्रतीक्षा में शरशय्या पर पड़े रहने की प्रत्यक्ष गाथा की उपलब्धि में अर्थान्तर कल्पना केवल बुद्धि की अजीर्णता का ही परिपाक कहा जा सकता है।