मृतक शरीर के इस हद्द तक जल जाने पर कि उसकी कपालास्थि परिपक्व होने लगे तब अर्थी के लम्बे डंडे से कपाल स्थान को तीन बार स्पर्श करते हुवे ब्रह्मरन्ध्र स्थान को अति चोट से फोड़ दिया जाता है जिसे 'कपाल क्रिया' कहते हैं। कई लोग इसमें में भी निष्ठुरता की गंध सूंघने का प्रयास करते हैं। परन्तु वास्तव में यह प्रथा पिता के संस्मरणीय वात्सल्य और पुत्र के अवश्य करणीय भावि कर्तव्य कर्मों का प्रणबद्ध निदर्शन है।

हम अन्यत्र यह संकेत कर आए हैं कि मुमूर्षु मनुष्य अपने जीवन काल में स्वयमपि अपनी सद्गति की साधना में सफल प्रयत्न कर सकता है। उन प्रयत्नों में सर्वोत्तम और सर्वथा अमोघ प्रयत्न यह है कि वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी रह कर अपना समस्त जीवन समाप्त करदे। निःसंदेह यह व्रत अन्त तक निभाना है तो बहुत कठिन ! परन्तु जो भाग्यशाली निभाने में कृतकार्य हो जाय वह बिना किसी उपायान्तर के, एक मात्र साधना के बल से मोक्ष का अधिकारी हो जाएगा। प्रायः दशवर्ष की अवस्था के बाद स्त्री शरीर में, सोलह वर्ष की अवस्था के बाद पुरुष शरीर में रज और वीर्य का प्रादुर्भाव होने लगता है। (स्वाभाविक मासिक ऋतुस्राव को छोड़कर) यदि सोहलवे वर्ष तक स्त्री और चौबीसवे वर्ष तक पुरुष अष्टविध मैथुन से बचकर उसे नष्ट न होने दे, तो वही वीर्य समस्त शरीर की पोली हड्डियों में भरपूर हो जाएगा। मलेरिया टी० बी० आदि घातक रोगों के जो कीटाणु आज वीर्य्यहीन खाली अस्थियों में अपने घोंसले बनाकर सदा के लिये डट जाते हैं, वही नैष्ठिक ब्रह्मचारियों के वज्रसन्निभ शरीर में कहीं अणु मात्र भी खाली स्थान न मिलने पर निराश होकर लौट जाते हैं। कदाचित् यही अखण्ड ब्रह्मचर्य्य यदि जीवन भर बना रहे तो शरीरान्तर्वर्ती यह सातवी धातु=शुक्र नामक पदार्थ 'ओजः' रूप में परिणत हो जाता है, जो ब्रह्मचारी की वाणी, नेत्र आकृति सब से अभिव्यक्त होने लगता है। इसी के बल से महात्माओं की वाणी से निकला हुवा एक साधारण शब्द भी अपनी ओजस्विता के कारण श्रोताओं में जीवन फूंक देता है। नेत्रों की तेजस्विता के सामने सिंह व्याघ्रादि हिंसक जंगली जानवरों की कौन कहे—यदि मूर्खतावश कोई हत्यारा मनुष्य भी प्राण लेने के इरादे से सामने आए तो वह भी स्वयमेव परास्त होकर पानी २ हो जाता है। अनेक संतप्त प्राणी केवल दर्शनमात्र करने से शान्ति अनुभव करने लगते हैं। इसी ओज को अहिन्दू लोग 'जलाल' 'नूर' आदि नामों से स्मरण करते हैं। चित्रकार दिव्य चित्रों के मुख के चारों ओर कुण्डलाकृति प्रभा बनाकर इस तत्त्व को अभिव्यक्त करते हैं। सो ये ओज-सम्पन्न व्यक्ति प्राण प्रयाण के समय बिना किसी अन्य साधना के अपने प्राणों को कपाल फोड़कर ब्रह्मरन्ध्र द्वारा निकालने में समर्थ होते हैं और अपने ही पुरुषार्थ द्वारा मोक्षभागी बन जाते हैं।

परन्तु साधारण घर गृहस्थी लोग 'पुत्रेण लोकाञ्जयति' इत्यादि शास्त्राज्ञाओं पर विश्वास रखते हुवे अपने उस अमूल्य रत्न वीर्य को सन्तानोत्पादन कृत्य में व्ययित कर देते हैं जिससे कि अन्त काल में कपाल फोड़कर प्राण निकाल डालने की वह योग्यता अपने हाथों खो बैठते हैं। अब जब पिता का देहान्त होता है तो पुत्र पिता के उस वात्सल्य भाव को स्मरण करके—जो कि उसने अपने मोक्ष को भी न्यौछावर करके पुत्र के उत्पादन में दिखाया था—बार २ विह्वल हो उठता है, इस असीम वात्सल्य का आना पाई कुछ भी मूल्य चुकाने लिए श्रद्धा का समुद्र ठाठें मारने लगता है तब वह हाथ में बांस उठाकर समागत समस्त बान्धवों के सामने पिता के कपाल को तीन बार छूता हुवा प्रतिज्ञा करता है कि—"पूज्य पितृदेव ! यदि आप मुझसे अयोग्य पुत्र के उत्पादन में अपना वीर्य्य न बहाकर नैष्ठिक ब्रह्मचारी रहते तो आज उस ब्रह्मचर्य्य के बल से तुम्हारे कपाल को स्वयं भेदनकर प्राण निकलते और आप मुक्त हो जाते। परन्तु वात्सल्यवश आपने मेरे उत्पादन के लिए अपनी मुक्ति को भी न्यौछावर कर दिया, अब मैं भरी जनता में यह तीन बार प्रतिज्ञा करता हूँ कि शास्त्र विहित और्ध्वदैहिक कर्म्म कलाप द्वारा इस कमी को पूरा करूँगा ! पूरा करूँगा !! पूरा करूँगा !!! यही कपाल क्रिया का वास्तविक भाव है।


मृतक के साथ श्मशान भूमि तक जाने वाले सम्बन्धियों को वस्त्र प्रक्षालन पूर्वक स्नान अवश्य करना चाहिये। शास्त्र कहता है कि—

अनुगम्येच्छया प्रेतं ज्ञातिमज्ञातिमेव च।
स्नात्वा सचैलः स्पृष्ट्वाग्निं घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति॥
(मनु०-१०३)

अर्थात्—स्वजातीय अथवा विजातीय मृत व्यक्ति के साथ इच्छा से श्मशान तक जाकर पुरुष सचैल स्नान, अग्नि स्पर्श और घृत के प्राशन से विशुद्ध होता है।

मृतक को न जाने किन २ रोगों से क्लिष्ट होकर शरीर त्यागने के लिये विवश होना पड़ा है। उन अनेक संक्रामक रोगों के कीटाणु सर्वथा शरीर दग्ध हो जाने से पूर्व शव में संश्लिष्ट ही रहते हैं, अतः शव वहन करने वाले व्यक्तियों को खासकर, तथा संसर्ग में आने वाले शवानुगामी सम्बन्धियों को भी सचैल स्नान करना ही चाहिए। देहली जैसे बड़े नगरों में कुछ दिन से ऐसी कुप्रथा पड़ गई है कि कुछ कार्यव्यस्त सम्बन्धी अपनापन प्रकट करने के लिए थोड़ी दूर तक मृतक को कन्धा देकर पुनः कार्य में पूर्ववत् संलग्न हो जाते हैं। वस्त्र प्रक्षालन की कौन कहे स्नान करना भी आवश्यक नहीं समझते, तथा कुछ व्यसनी शवानुगमन करते हुवे और श्मशान भूमि तक में भी बीड़ी सिगरेट पीते रहते हैं। ये दोनों कुप्रथाएँ अनेक संक्रामक रोगों के कीटाणुओं को निमन्त्रित करने के बराबर हैं जिनका परिहार होना नितान्त आवश्यक है।


मनु के उपरोक्त आदेशानुसार कुरुक्षेत्रादि धार्मिक प्रदेशों में श्मशान तक जाने वाले समस्त सम्बन्धी सचैल स्नानके अनन्तर घर लौटने से पूर्व अग्निस्पर्श करते हैं। इस प्रथा के महत्त्व पर अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं, प्रत्येक बुद्धिमान् स्वयं अनुमान कर सकता है कि अग्नि स्पर्श से समस्त संक्रामक बीमारियों के कीटाणु भस्मसात् हो जाते हैं अतः इसका संस्पर्श बहुत ही लाभप्रद है। निम्ब परमोत्तम संशोधक पदार्थ है। जब किसी शव को किसी विशेष घटना के कारण देर तक रखना अनिवार्य होता है तो उसे निम्बपत्रों से ढांप रखते हैं, इस क्रिया से उसके सड़ जाने का भय नहीं रहता। ऐसी स्थिति में निम्बपत्र चवर्ण और घृतप्राशन रहे सहे संक्रामक रोगों के कीटाणुओं के खतरे से सर्वथा उन्मुक्त हो जाने का वैज्ञानिक साधन है।


शास्त्रों में वर्णन आता है, कि मृतक की पंचांग अस्थियें गंगा में प्रवाहित करनी चाहिये। यथा—

यावदस्थीनि गंगायां तिष्ठन्ति पुरुषस्य च।
तावद्वर्षसहस्राणि ब्रह्मलोके महीयते॥
(शंख० ७)

अर्थात्—मृतक की अस्थिएं जब तक गंगा में रहती हैं तब तक मृतात्मा शुभ लोकों में निवास करता हुआ आनन्दोपभोग करता है।

मां गंगा के सम्बन्ध में तो हम तीर्थ महिमा के प्रसंग में आगे यथा स्थान लिखेंगे, परन्तु यहाँ इतना जान लेना परमावश्यक है कि मृत्यु के अनन्तर जीवात्मा अपने शरीर की भस्मी में भी मोह रखता है। जब तक सम्बन्धी उस भस्म को ठिकाने नहीं लगाते तब तक मृतात्मा इसी चक्कर में पड़ा रहता है और अपनी परलोक यात्रा को आरम्भ नहीं करता। इसीलिए हिन्दू शास्त्रों में तत्काल शव का दाह कर दिया जाता है और ज्यों ही चौथे दिन भस्म हाथ छूने लायक ठंडी हो पाई कि उसे उठाकर किसी निकटस्थ नदी नद में प्रवाहित कर दिया जाता है। इस तरह मृतात्मा की धूल भी अवशिष्ट नहीं रहने दी जाती। केवल पंचांग अस्थियें जिन्हें कि धार्मिक परिभाषा में 'फूल' कहा जाता है—गंगा माता के प्रवाह में स्थापित करदी जाती हैं, जिनके कारण मृतात्मा को ऐसे विलक्षण आनन्द का अनुभव होने लगता है कि मानो मैं स्वयं ही मां गङ्गा की पवित्र गोद में बैठा हुआ कल्लोल कर रहा हूँ।

इसके अतिरिक्त गंगादि नदियों में अस्थियों के डालने का एक अन्य तथा स्थूल लाभ भी है जिसे सभी वैज्ञानिकों ने एक मत से स्वीकार किया है। अस्थियों के वैज्ञानिक परीक्षण से यह सिद्ध हुआ है कि उनमें फास्फोरस अत्यधिक मात्रा में होता है जो खाद के रूप में भूमि को अत्यन्त उपजाऊ बनानेकी क्षमता रखता है। आज तो इससे काफी मात्रा में खाद तैयार किया जाने लगा है। निरन्तर बहते रहने से नदियों का जल और विशेषतः गंगा जैसी महानदी का जल—जिसे कैलाश से लेकर बंगाल की खाड़ी तक लगभग १४०० वर्गमील का मार्ग तय करना पड़ता है और जो सहस्रों वर्गमील भूमि को सींचकर उपजाऊ तथा हरा भरा बनाता है—अपनी फास्फोरस शक्ति को खो देता है। वह भूमि को उतना अधिक उपजाऊ बनाने में समर्थ नहीं रहता। इसमें प्रचुर मात्रा में अस्थि डाल देने से अस्थिगत फास्फोरस जल में सम्मिश्रित हो जाता है और वह भूमि को उर्वरा करने में सहायक सिद्ध होता है। इस प्रकार के अस्थि विसर्जन के कृत्य से एक भारतीय संस्कृतिका पुजारी जहां जीवन दशा में अपने तन को मातृभूमि की सेवा एवं समृद्धि में लगाता है, वहां मरने पर अपनी अस्थियों को भी मातृभूमि की समृद्धि के लिए समर्पित कर सत्पुत्र का कर्तव्य पालन करता है।

कहना न होगा कि पिता माता की अस्थियों को फूल नाम से स्मरण करना जहां मृतात्माओं के प्रति अगाध श्रद्धा और समादर का सूचक है वहां वैज्ञानिक हेतुसे भी समर्थित है। सभी जानते हैं कि प्रत्येक वृक्षमें पुष्पोद्गम होने के अनन्तर ही फलोदय होता है। सो हिन्दू परम्परा में चूंकि सन्तान को फल नाम से स्मरण करते हैं अतः सन्तान रूप फल, माता पिता की जिन अस्थियों के सार से समुद्भूत हैं उन्हें 'फूल' नाम से स्मरण करना युक्तिसंगत ही है।

राष्ट्रपिता गांधीजी की भस्म का राष्ट्र-धन-व्यय से भारत के समस्त तीर्थों में बहाया जाना इस बात का प्रबल संकेत है कि जीवन काल में भले ही कुछ लोग धार्मिक भावनाओं की, पाश्चात्य शिक्षा दीक्षा के दूषित प्रभाव से उपेक्षा करने की भूल कर देते हों, परन्तु रोम २ में रमी हुई आर्य परम्पराओं की आस्था अन्त में अपना अमिट प्रभाव प्रकट किये बिना नहीं रहती। इस प्रकार गर्भाधान से अन्त्येष्टि पर्यन्त समस्त वैदिक संस्कारों का संक्षिप्त निरूपण करने के अनन्तर हम इस अध्याय को यहीं करते हैं।

गर्भाधान कर्म से लेकर मृत्युकाल तक सकल विधान।
क्या ? कब करना ? धर्म-रीति से शास्त्रविहित धर्मानुष्ठान।
यद्यपि हैं अदृष्ट-फल-मूलक तो भी दृष्ट-लाभ-विस्तार।
हेतु पुरस्सर सिद्ध किया अध्याय तीसरे में यह सार॥