हमारी दैनिक चर्या का आरम्भ प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में जागरण से होता है। शास्त्रों की आज्ञा है—

ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत।

अर्थात्—प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिये। ब्रह्म मुहूर्त की व्याख्या करते हुए बतलाया गया है—

रात्रेः पश्चिमयामस्य मुहूर्तो यस्तृतीयकः।
स ब्राह्म इति विज्ञेयो विहितः स प्रबोधने॥

अर्थात्—रात्रि के अन्तिम प्रहर का जो तीसरा भाग है उसको ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। निद्रा त्याग के लिए यही समय शास्त्र विहित है।

प्रातः जागरण का यह नियम हमारी दैनिक चर्या का अत्यंत महत्वपूर्ण नियम है। समस्त दैनिक क्रियाओं की सफलता या असफलता बहुत कुछ इसी पर निर्भर है, क्योंकि प्रत्येक प्रभात हमारे नये जीवन का प्रारम्भ काल है। उसमें नवजीवन के निर्माण का स्फूर्तिप्रद सन्देश निहित है। यदि हम उस समय प्रमाद और आलस्य में सोते रहकर उस सन्देश को न सुन पाये तो हम जीवन में पिछड़े ही समझो। जो जीवन के आरम्भ में ही अपने साथियों से पीछे रह गया हो भविष्य में उस के आगे बढ़ने की क्या आशा ? वस्तुतः देखा जाय तो ज्ञात होगा कि हमारा प्रत्येक दैनिक जीवन हमारे पचास सौ वर्ष के बृहत्तर जीवन का ही नहीं, किन्तु अर्बों खर्बों वर्षों के सृष्टि जीवन का संक्षिप्त संस्करण है। विशाल सृष्टि और प्रलय की एक हल्की सी झाँकी हम अपने दैनिक जीवन में प्रतिदिन अच्छी तरह देख सकते हैं। जिस प्रकार प्रलय काल में समस्त सृष्टि, कर्म-विरत एवं चेतना-शून्य होकर निश्चेष्ट भाव से, तमोमयी कालरात्रि की गोद में समा जाती है और समय आने पर प्रकृति की प्रेरणा से उद्बुद्ध होने लगती है, उसी भाँति दैनिक जीवन में भी दिन भर के परिश्रम से थके मादे प्राणी चेतना शून्य हो कर रात्रि की गोद में विश्राम लेते हैं और प्रातः होने पर प्रकृति की प्रेरणा से पुनः प्रबुद्ध हो जाते हैं। यह कितनी बड़ी विडम्बना है, कि इस प्रेरणा को, उच्छृङ्खल मानव सुन कर भी नहीं सुन पाता, जब कि प्रकृति के नियन्त्रण में रहने वाले चराचर के समस्त जीव उसके समान्य से इंगित पर अपने आप जाग जाते हैं।

कभी सूक्ष्म दृष्टि से इस समय का अध्ययन कीजिए फिर आप देखेंगे, कि उस समय का प्राकृतिक वातावरण कितना मधुर और निराला होता है। प्रातः काल होते ही कमल खिल उठते हैं भ्रमरावली गुञ्जार करने लग जाती है, पक्षी अपने कलरव से उपवनों और उद्यानों को मुखरित कर देते हैं, शीतल मन्द समीर अपने आवरण में मकरन्द की मादक गन्ध लिये डोलने लग जाता है, सचमुच ही समस्त सृष्टि एक नवीन जीवन की अनुभूति से खिल उठती है। और तो और, विट्भक्षी कुक्कुट सा अधम जीव भी प्रातः होने के साथ ही तार-स्वर में बाग देकर अपने जग जाने का प्रमाण देना प्रारम्भ कर देता है। और तब;—मानव—अपने को सर्वश्रेष्ठ समझनेवाला आज का मानव !—प्रकृति को धता बता, प्रातः जागरण के वैदिक उपदेश को चन्द व्यक्तियों के लिये ही आचरणीय उपदेश समझ, सूर्य चढ़े तक बिस्तर पर करवटें लेता नहीं अघाता। उसका प्रातः काल तो तब होता है जब ८ बजे रेडियो के मधुर स्वरों से—

जागा सब संसार उठो अब भोर भई !

की सुरीली आवाज, उसको प्रातः काल हो जाने की सूचना देने लगती है।


यद्यपि उपरोक्त प्रश्न का वास्तविक उत्तर तो इसका आचरण करने पर ही मिल सकता है, क्योंकि किसी भी शंका का समाधान उसके उत्तर में प्रतिपादित तथ्यों की अनुभूति से ही सम्भव है, तथापि इतना जान लेना चाहिये कि यह समय शारीरिक-स्वास्थ्य, बुद्धि, आत्मा, मन आदि सभी की दृष्टि से निद्रा छोड़कर जग जाने के लिए परम उपयुक्त है। इस समय प्रकृति मुक्तहस्त से स्वास्थ्य, बुद्धि, मेधा प्रसन्नता और सौन्दर्य की अपार राशि लुटाती है, इस समय बहने वाली वायु के एक एक कण में संजीवनी शक्ति का अपूर्व संमिश्रण रहता है। यह वायु रात्रि में चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी पर बरसाये हुये अमृत बिन्दुओं को अपने साथ लेकर बहती है। इसीलिये शास्त्रों में इसे वीरवायु के नाम से स्मरण किया है। जो व्यक्ति इस समय निद्रा त्याग कर तथा चैतन्य होकर इस वायु का सेवन करते हैं उनका स्वास्थ्य सौंदर्य और आयुष्य वृद्धि को प्राप्त होता है। मन प्रफुल्लित हो जाता है एवं आत्मा में नई चेतनता का अनुभव होता है। आयुर्वेद कहता है—

वर्णं कीर्तिं मतिं लक्ष्मीं स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति।
ब्राह्मे मुहूर्ते संजाग्रच्छ्रियं वा पंकजं यथा॥
(भैं० सार-६३)

अर्थात्—ब्रह्म मुहूर्त में उठने से पुरुष को सौन्दर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। उसका शरीर कमल के सदृश सुन्दर हो जाता है।

इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण रात्री के पश्चात् प्रातः जब भगवान् सूर्य उदय होने वाले होते हैं तो उनका चैतन्यमय तेज आकाश मार्ग द्वारा विस्तृत होने लगता है। यदि मनुष्य सजग होकर स्नानादि से निवृत्त हो, उपस्थान एवं जप द्वारा उन प्राणाधिदेव भगवान् सूर्य की किरणों से अपने प्राणों में अतुल तेज का आह्वान करे, तो वह पुरुष दीर्घजीवी हो जाता है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त वायु का विभाग साधारणतया निम्न क्रम से किया जाता है।

आक्सीजन (प्राणप्रदवायु) — २१ प्रतिशत
कारबन डाईओक्साइड (दूषित वायु) — ६ प्रतिशत
नाईट्रोजन (नद्रजन) — ७३ प्रतिशत
१००

विज्ञान के अनुसार सम्पूर्ण दिन वायु का यही प्रवहण क्रम रहता है किन्तु प्रातः और सायं जब सन्धि काल होता है इस क्रम में कुछ परिवर्तन हो जाता है। सायंकाल जगत्प्राणप्रेरक भगवान् सूर्य के अस्त हो जाने से आक्सीजन (प्राणप्रद वायु) अपने स्वाभाविक स्तर से मन्द पड़ जाती है और मनुष्यों की प्राणशक्ति भी क्षीण हो जाती है उन्हें विश्राम की आवश्यकता अनुभव होने लगती है। इसी प्रकार प्रातः काल के सूर्योदय के साथ ही उस वायु के स्तर में वृद्धि होना स्वाभाविक है। इसलिये यदि इस समय निद्रामुक्त हो कर मनुष्य उस वायु का सेवन करे तो उस का स्वास्थ्य बहुत अच्छा हो जाएगा—यह बतलाने की विशेष आवश्यकता ही नहीं है। वास्तव में दीर्घजीवन का एक ही मूल मन्त्र है—जल्दी सोओ जल्दी उठो। Early to go bed early to rise, make a man healthy wealthy and wise अर्थात्—जल्दी सोना और जल्दी उठना मनुष्य को स्वस्थ, धनवान् और बुद्धिमान् बना देता है" की अंग्रेजी कहावत सर्वांश में सत्य ही है।

प्रातः जागरण और महानता का पारस्परिक योग है। सभी महान् व्यक्ति प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में ही उठते हैं, और इस समय नियम-पूर्वक प्रतिदिन उठने वाले प्रत्येक व्यक्ति का जीवन, शारीरिक और बौद्धिक उन्नति से विलक्षण हो जाता है इस में किंचित् भी सन्देह नहीं। विश्ववन्द्य महात्मा गांधी प्रतिदिन इसी ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर अपनी दैनिक चर्या में लग जाया करते थे। आगत पत्रों के उत्तर, समाचार पत्रों के लिए लेख तथा सन्देशादि वे इसी समय तैय्यार करते थे। लिखने पढ़ने के लिये तो वास्तव में इससे उपयुक्त समय हो ही नहीं सकता। एकांत और सर्वथा शान्त वायुमण्डल में जब कि मस्तिष्क बिलकुल उर्वर होता है, ज्ञानतन्तु रात्री विश्राम के बाद नव-शक्ति-युत होते हैं—मनुष्य को बौद्धिक कार्य करने में विशेष श्रम नहीं करना पड़ता।

इसलिये हमें प्रकृति के इस अमूल्य वरदान से लाभ उठाना चाहिये और ऐसा अभ्यास डाल लेना चाहिये कि बिना किसी की सहायता के प्रतिदिन उठ जावें। इस के लिये एक छोटा सा उपाय कार्य में लाया जा सकता है। रात्री में सोते समय यदि व्यक्ति अपनी आत्मा से प्रातः अमुक समय पर उठाने का संकल्प व्यक्त करदे तो निश्चय ही उसी समय पर नींद खुल जायगी और यदि उस समय हमने आलस्य का आश्रय नहीं लिया तो फिर कुछ दिनों में बिना किसी की सहायता के स्वयं उठने लगेंगे।


(ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थं चानुचिन्तयेत्—मनु)

धर्मशास्त्रों ने निद्रा त्याग के उपरान्त मनुष्य-मात्र का प्रथम कर्तव्य उस कोटि-२ ब्रह्माण्ड-नायक, सच्चिदानन्द-स्वरूप प्यारे प्रभु का स्मरण करना बतलाया है—जिस की असीम कृपा से अत्यन्त दुर्लभ मानव देह प्राप्त हुई है, जो समस्त सृष्टि के कण-कण में ओतप्रोत है, सत्य है, शिव है, सुन्दर है। जिसकी कृपा-कोर से मनुष्य सब प्रकार के भयों से मुक्त होकर—'अहं ब्रह्मास्मि' के उच्च लक्ष्य पर पहुँच कर तन्मय हो जाता है। दैनिक जीवन के प्रारम्भ में उस के स्मरण से हमारे हृदय में आत्मविश्वास और दृढ़ता की भावना ही उत्पन्न नहीं होगी अपितु सम्पूर्ण दिन मंगलमय वातावरण में व्यतीत होगा। प्रत्येक व्यक्ति को अपने-२ विश्वास और भावना के अनुसार भगवत्स्मरण करने की पूरी स्वतन्त्रता है। जो व्यक्ति विशेष कुछ नहीं जानते वे यदि श्रद्धापूर्वक राम नाम महामन्त्र का ही स्मरण करें तो भी कल्याण भाजन हो सकते हैं।

उक्त विषय का विस्तार तो आह्निक सूत्रावली आदि दिनचर्या विधायक ग्रन्थों में द्रष्टव्य है। हम यहाँ विशेष वक्तव्य योग्य एक पद्य ही उद्धृत करते हैं यथा—

प्रातः स्मरामि भवभीतिमहार्तिशान्त्यै,
नारायणं गरुडवाहनमब्जनाभम्।
ग्राहाभिभूतवरवारणमुक्तिहेतुं,
चक्रायुधं तरुणवारिज-पत्र-नेत्रम्॥


भगवत्स्मरण सम्बन्धी कतिपय पद्यों के अतिरिक्त हिन्दुओं के दैनिक पाठ में शिष्टाञ्जलि नामक कुछ पद्यों का सन्निवेश और होता है जिसको कि प्रतिदिन प्रातःकाल नियमपूर्वक पढ़ा जाता है। इस अञ्जलि का अपना विशेष महत्व है। धार्मिक और राष्ट्रीय दोनों ही दृष्टि से इसका पठन प्रत्येक भारतीय के लिये अत्युपयोगी है। इस की सहायता से हम अपने इस पवित्र देश में उत्पन्न हुए, उन महापुरुषों की उज्ज्वल स्मृति को अक्षुण्ण रखते हैं जिन्होंने अपने शुभ कार्यों, अनथक प्रयत्नों और अनुपम बलिदानों द्वारा हमारे इस राष्ट्र को उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचाया, जिन महापुरुषों के चरित्र मानव-मात्र के लिये आदर्श रहे हैं और जिन पर आज भी हम गर्व कर सकते हैं। इस अञ्जलि में हमें अपने देश की उन पुण्य सरिताओं एवं स्थानों की आभारपूर्ण स्मृति मिलती है—जो धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बड़े महत्व पूर्ण हैं। यह स्थान प्राचीन समय में भारतीय राजनीति, सांस्कृतिक-विकास एवं धार्मिक परम्पराओं के केन्द्र रहे हैं, हमारा पूर्व का सम्पूर्ण इतिहास इन से सम्बद्ध है। पवित्र-सलिला गंगा यमुना आदि सरिताएँ—जहाँ वैज्ञानिक दृष्टि से अपना विशेष महत्व रखती हैं, वहाँ भारत वसुधा को लाखों वर्षों से आज तक—'सुजला सुफला शस्य-श्यामला' और समृद्ध बनाने में उन का कितना उपयोग हो रहा है यह किसी भी भारतीय से छिपा नहीं है।

भौगोलिक एवं ऐतिहासिक प्रेरणा भी इस अञ्जलि की अपनी विशेषता है। आज इतिहास एवं भूगोल, स्कूली विषय बन गए हैं पुस्तकों के शब्द-जाल में जकड़ कर इन रोचक विषयों को ऐसा दुरूह बना दिया है कि वे बच्चों के लिये हौव्वा बन गये हैं। इतिहास के पन्नों को रटते-२ बेचारों का दिमाग खाली हो जाता है, इस पर तुर्रा यह है, कि आज के नव शिक्षित युवक से आप उस के पूर्वजों, ऋषि महर्षियों, पराक्रमी राजाओं और भारतीय इतिहास के अन्य प्रमुख पात्रों के विषय में कुछ पूछिये तो वह इन के ज्ञान से सर्वथा शून्य ही होगा। उसे इंगलैण्ड के इतिहास के हैनरी सेविन्थ, ऐलिजाबैथ आदि, भारतीय इतिहास के अकबर, जहाँगीर वगैरह का तो ज्ञान होगा किन्तु आदि-सम्राट् मनु, न्याय-परायण शिवि, भारत की नींव डालने वाले भरत आदि के नाम से वह सर्वथा अपरिचित होगा।

प्राचीन समय में इतिहास भूगोल घरेलू विषय होते थे। प्रातःकालीन इन वन्दनाओं से ले कर समय-२ पर होने वाली कथा वार्ता प्रवचन आदि द्वारा अपढ़ से अपढ़ व्यक्ति को भी दुरूह ऐतिहासिक घटनाएँ चुटकियों में याद हो जाती थीं। इस 'अञ्जलि' में भारतीय इतिहास के जिन उज्ज्वल नर रत्नों और जिन ऐतिहासिक स्थानों नदियों आदि का वर्णन है—प्रतिदिन इन श्लोकों के पाठ करने वाले व्यक्ति का, इन के विषय में विशेष ज्ञान के लिये उत्कण्ठित होना स्वाभाविक है। प्रतिदिन 'पुण्यश्लोको नलो राजा' बोलने वाले व्यक्ति के हृदय में क्या यह भाव उत्पन्न न होगा कि आखिर यह नल राजा है कौन ? इसी जिज्ञासा पूर्ति के रूप में इतिहास का जन्म होता है। घर में रहने वाले बूढ़े बाबा, दादी, बालक को राजा नल और दमयन्ती की कथा सुना कर उसे बिस्तर पर पड़े-२ इतिहास का पाठ पढ़ाते हैं। 'पुण्यश्लोको युधिष्ठिरः' के प्रश्न पर उसे महाभारत के इतिहास का पाठ पढ़ाया जाता है। 'अयोध्या मथुरा माया' पाठी बालक के 'दादा ! अयोध्या कहाँ है ?' जैसे भोले प्रश्न के उत्तर में दादा उसे अयोध्याका भौगोलिक परिचय देते हैं। इस प्रकार क्रान्तदर्शी महर्षियों ने खेल-२ में ही बालकों के हृदय में भौगोलिक और ऐतिहासिक जिज्ञासा, उत्कण्ठा और रुचि उत्पन्न करने का यह कितना सुन्दर क्रम स्थिर किया था—इसे हम आज भूल गये हैं। इस प्रकार से हम अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को अक्षुण्ण बनाये रखने में कितने सहायक होते हैं इस का भी विचार हम कभी नहीं करते।

इधर कुछ दिनों से राष्ट्रीय-स्वयं-सेवक संघ के संचालकों ने इस की महत्ता को अनुभव किया है और अपने कार्यक्रम में इस को स्थान देकर पुनर्जीवित करने का प्रयत्न किया—यह हर्ष का विषय है। यद्यपि इस में भाग लेने वाले स्वयं-सेवकों में संस्कृतानभिज्ञों की संख्या ही अधिक है और ऐसी दशा में इस अञ्जलि का अर्थ भी उन की समझ में न आएगा किन्तु यह निश्चित है कि निरन्तर किसी एक ही शब्द के उच्चारण से उस का अर्थबोध होने लगता है। इस लिये इस से सभी स्वयं सेवकों को महान् लाभ ही होगा इस में कोई सन्देह नहीं।

यह है इस 'शिष्टाञ्जलि' के नित्यपाठ की 'क्यों' का संक्षिप्त समाधान। आशा है इतने से ही एतद्विषयक जिज्ञासा की शान्ति हो सकेगी और हम नियम पूर्वक प्रातःकाल इसका पठन अवश्य करेंगे।

पुण्यश्लोको नलो राजा पुण्यश्लोको युधिष्ठिरः।
पुण्यश्लोका च वैदेही पुण्यश्लोको जनार्दनः॥
अहिल्या द्रौपदी सीता तारा मन्दोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम्॥

प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक,-
व्यासाम्बरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान्।
रुक्माङ्गदार्जुनवसिष्ठविभीषणादीन्,
पुण्यानिमान् परमभागवतान्नमामि॥

धर्मो विवर्धति युधिष्ठिरकीर्तनेन,
पापं प्रणश्यति वृकोदरकीर्तनेन।
शत्रुर्विनश्यति धनञ्जयकीर्तनेन,
माद्रीसुतौ कथयतां न भवन्ति रोगाः॥

अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥

मनुं स्मराम्यादिगुरुं प्रजानाम्,
भागीरथं धीरमुदग्रयत्नम्।
भूपं हरिश्चन्द्रमभंगवाचम्,
श्रीरामचन्द्रं रघुवंशसूर्यम्॥

स्थानाभाव से हम यहाँ कतिपय पद्यों का ही समावेश कर सके हैं। आह्निकसूत्रावली आदि ग्रन्थों में इसे पूर्ण रूप से देखा जा सकता है।