कहा जाता है कि एक बार किसी महाराजा के दरबार में गाना बजाना हो रहा था, परन्तु महाराज किसी शासन सम्बन्धी अड़चन की उधेड़ बुन में पड़े आज इस आनन्द में भी गम्भीर मुद्रा बनाये सुस्त बैठे थे। चतुर मन्त्री ने राजा को आनन्द विभोर करने के लिए विनोदार्थ चारपाई का एक पावा कन्धे पर रखकर एक डण्डे से सरङ्गी की भांति बजाना आरम्भ किया। ज्यों ही राजा का ध्यान इधर गया वह इस चेष्टा पर खिलखिला उठे और सब गाने बजाने वालों से बोले कि आप लोग अपने २ बाजे बन्द करो, हम यह नया बाजा सुनना चाहते हैं। बजन्त्री बन्द हो गए, मन्त्री भी अपने पावे सेरवे को रोककर बैठ गये ! राजा ने जब आग्रह किया कि तुम्हारा बाजा सुनने के लिये ही तो सब बाजे बन्द किये हैं, तुम क्यों बन्द करते हो ? बजाओ ! मन्त्री ने विनोद पूर्वक कहा—श्रीमान् जी ! इस बाजे का नाम 'शामिल बाजा' है, इसकी यह तारीफ है कि जब बाजे बजाते हैं तभी यह बजता है अकेले नहीं बजता। राजा इस उत्तर पर और भी हंसा।
दृष्टान्त का तात्पर्य यह है कि वह 'पावा सेरवा' तो नाम मात्र का ही बाजा था, सब बाजों की ध्वनि में ही इसकी भी प्रतिष्ठा बनीरहती थी, स्वतन्त्र इसकी कुछ भी सत्ता नहीं थी ठीक इसी प्रकार यह मानवपिण्ड भी शामिल बाजे की भांति अपनी कुछ भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता किन्तु सूर्य चन्द्र आदि ब्रह्माण्ड के बाजे जब बजते हैं, तभी यह भी इनकी छाया में यथा तथा सिसकता रहता है। यदि एक क्षण के लिये भी वे बंद हो जायें तो यह भी कोरा खट्वाङ्ग ही शेष रह जाता है, तभी तो शिव भगवान् हर वक्त इसे अपने हाथ में संभाले रहते हैं। कदाचित् क्षणमात्र के लिये भी यह उनके हाथ के आश्रय से छूट जाए तो फिर शस्त्र नहीं रह सकता, खट्वाङ्ग को शस्त्र (कार्य साधक) बनाने की शक्ति त्रिशूली में ही है।
अथर्व वेद के १९ वें काण्ड का ४३ वां पूरा सूक्त का सूक्त इस रहस्य से भरा है। यथा—
(१)… अग्निर्मेधां दधातु मे, (२)… वायुः प्राणान् दधातु मे, (३)… चक्षुः सूर्यो दधातु मे, (४)… मनश्चन्द्रो दधातु मे, (५)… बलमिन्द्रो दधातु मे, (६)… ब्रह्मा ब्रह्म दधातु मे।
(अथर्व० १९।४३।१-८)
अर्थात्—अग्निदेव मुझे मेधा=धारणा शक्ति प्रदान करे वायु प्राण, सूर्य नेत्र, चन्द्रमा मन, इन्द्र बल, और ब्रह्मा ब्रह्म, प्रदान करें।