संसार में दो प्रकार की वस्तुएँ हैं एक प्राकृत, दूसरी संस्कृत। प्रकृति—आदि पुरुष की कार्यरूपाशक्ति—ही अखिल विश्व का मूल है। सम्पूर्ण दृश्यादृश्य पदार्थ मानो इसी अबोध बालिका के स्वरचित खिलौने हैं, जिनसे वह प्रतिक्षण खेलती रहती है। मानव भी इसी का बनाया हुआ खिलौना है, परन्तु है यह कुछ विलक्षण प्रकार का खिलौना! यह विलक्षणता और कुछ नहीं, केवल मनुष्य की वह ज्ञानशक्ति है जिसके बल पर वह नितान्त परवश खिलौना मात्र होते हुए भी प्रकृति राज्य के प्रति विद्रोह करता है। प्रकृति की निर्माण की हुई वस्तुओं को उसी रूप में देखकर उसे प्रसन्नता नहीं होती किन्तु प्रत्येक वस्तु को काट छांटकर=संस्कृत—करके उसे वह अपने लिए उपयोगी बनाकर प्रसन्नता अनुभव करता है। संस्कार की यह प्रबल भावना उसकी दूसरी विलक्षणता है।
हाँ, तो प्रकृति ने जिनको जिस रूप में उत्पन्न किया है उसी रूप में वे वस्तुएं प्राकृत कहलाती हैं और मनुष्य द्वारा काट छांट होकर परिष्कृत तथा सगोवित रूप में आ जाने पर उन्हें ही संस्कृत कहा जाता है। पर्वत उपत्यकाओं में कल कल करके स्वच्छन्द गति से प्रवाहित होने वाले झरने तथा सरिताएँ प्राकृत हैं और सिंचाई के लिए बनाई गई नहरें संस्कृत। प्रकृति ने अनेक प्रकार के अन्न, धान्य, फल मूलादि उत्पन्न किये हैं, मनुष्य उनको संस्कृत करके (कूट पीसकर, घृतादि में तलकर या अन्य विधि से) सुन्दर सुस्वादु मिष्टान्न का रूप दे देता है। प्रकृति ने कपास ऊन आदि की रचना की, किन्तु मनुष्य ने उसके विविध संस्कार करके जो दिव्य परिधान तैयार किये हैं, वे मनुष्य की संस्कारमयी भावना के ज्वलन्त प्रमाण हैं।
आज का वैभवपूर्ण हरा भरा संसार, मनुष्य में विद्यमान इसी भावना का सुन्दर फल है। तात्पर्य यह कि—आज मानव, सभ्यता के जिस उच्च शिखर पर पहुँचा हैं उसका प्रमुख कारण यह संस्कारमयी भावना ही है। यह भावना प्राकृत तथा ईश्वर प्रदत्त है। वैदिक षोडश संस्कार इसी भावना के विशुद्ध तथा परिमार्जित रूप हैं।
संस्कारों का प्रारम्भ कब से हुआ ? इस विषय में कहा जा सकता है, कि मानव जाति के प्रारम्भ काल में ही मनुष्य की यह संस्कारमयी भावना व्यक्त रूप धारण कर चुकी होगी। ऐतिहासिकों का कथन है कि 'एक समय ऐसा अवश्य रहा होगा जब यूरोप एशिया अमेरिका आदि सम्पूर्ण देशों में फैले हुये मनुष्यों के पूर्वज एक ही स्थान में रहते थे, उनका आपस में बड़ा प्रेम तथा भाई चारा था, वहीं से उन्होंने सभ्यता तथा संस्कृति का विकास प्रारम्भ किया और विभिन्न स्थानों की ओर फैलते गये'। यह विचार अधिकांश में सत्य प्रतीत होता है। और तब हम निर्विवाद रूप से कह सकते हैं, कि उस सभ्यता-संस्कृति-शिक्षा-शून्य, क्रूर एवं हिंसक मानव-पशु को,—सभ्य, सुशिक्षित, तथा शान्ति-प्रिय मनुष्य बनाने में इन वैदिक संस्कारों का महत्त्वपूर्ण भाग रहा है, क्योंकि यह निश्चय है, कि एकत्र निवास करने वाली मानव जाति के मेधावी पूर्वपुरुषों=ऋषियों—ने ईश्वरीय ज्ञान स्वरूप वेदत्रयी के साक्षात्कार के साथ ही संस्कार प्रणाली का न केवल ज्ञान प्राप्त किया किन्तु उसे अपनाया भी। यह आदि मानव जाति, ब्रह्मा की सृष्टि वेदी * धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र से ज्यों ज्यों इधर उधर फैली वह अपने साथ इन संस्कारों को—जो कि उस समय तक धार्मिक कृत्यों का अङ्ग बन चुके थे—भी अपने साथ लेती गई और आज हम देखते हैं, कि यद्यपि विशुद्ध रूप में नहीं किन्तु विकृत रूप में ही सही संस्कारों की यह परम्परा सर्वत्र मिलती है। हिन्दु, मुसलमान, सिक्ख, पारसी, यहूदी, ईसाई आदि सभी जातियों में और भारत चीन जापान अरब मिश्र यूरोप आदि सभी देशों में जातकर्म नाम-करण, विवाह, अन्त्येष्टि आदि मुख्य मुख्य संस्कार किसी न किसी रूप में अवश्य पाये जाते हैं। यद्यपि इनका विशुद्ध रूप तो वैदिक ज्ञान की उत्तराधिकारिणी आर्य जाति में ही देखने को मिलता है।
* टिप्पणी.—'आदि सृष्टि कहां हुई ?' यह विवेचन हमारे 'पुराण-दिग्दर्शन' ग्रन्थ में द्रष्टव्य है।
संस्कारों की सबसे अधिक आवश्यकता आज है। आज जब हम एक विश्वसंघ की कल्पना कर रहे हैं—एक ऐसे संघ की जिसकी छाया में रहने वाले सब नागरिक समान होंगे कोई ऊँचा नीचा न होगा; तो ऐसे अवसर पर हमें उन संस्कारों को पुनर्जीवित करना होगा, जिनमें इस प्रकार की उदात्त तथा प्राञ्जल भावनाओं का विशेष स्थान है।
इस समय सर्वत्र मानवता की पुकार है। जाति, वर्ण, धर्म, परम्परा और संस्कृति आदि के पुरातन महत्त्व का स्थान मानवता ग्रहण कर रही है। वर्ग भेद की तथाकथित अशान्ति से उत्पीड़ित मनुष्य, आज केवल 'मानव' बनकर विश्व के सम्पूर्ण मनुष्यों से भाई चारा तथा एकता स्थापन करना चाहता है। यह शुभ लक्षण हैं। यदि हम सच्चे अर्थों में मनुष्य बन जाते हैं, तो आये दिन धर्म जाति और राष्ट्र की संकुचित परिधि के नाम पर होने वाली अमानवीय घटनायें समाप्त हो जायें। किन्तु इसके लिये एक बार फिर सनातन धर्म की शरण में आना होगा। शारीरिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से परिपूर्ण उस सार्वभौम मानव की सृष्टि इन संस्कारों द्वारा ही होगी अन्यथा नहीं।
हमने पीछे कहा है, कि संस्कार सभी देशों और सभी जातियों में किसी न किसी रूप में सम्पन्न होते हैं, किन्तु एकता प्रेम तथा विश्व भ्रातृत्व का जो उच्च आदर्श हमें संस्कार पठित वैदिक मन्त्रों में देखने को मिलता है वह अन्यत्र नहीं।
वेदादि शास्त्रों में संस्कारों का बड़ा माहात्म्य प्रदर्शित किया है यहां तक, कि प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक अधिकार प्राप्त करने के लिये संस्कृत होना आवश्यक समझा गया है, द्विज माता पिता के शरीर से जन्म लेने के उपरान्त भी यदि बालक असंस्कृत हो तो वह द्विज नहीं कहला सकता। श्रुति ने संस्कार को जन्म के ही समान महत्त्व दिया है। 'द्विज' शब्द का अर्थ है जिसका दो बार जन्म हो। पहला मातृ-गर्भ से दूसरा संस्कार द्वारा। मानवजीवन का चरम लक्ष्य है—ब्रह्मत्व लाभ करना। इस लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले परमार्थ पथिक के लिये यह संस्कार एक स्फूर्तिप्रद पाथेय हैं—जिनके सम्बल से वह बिना भटके अपने मार्ग पर चला जाता है। मानव शरीर मानो एक चित्र है—जिसे कुशल कलाकार की तूलिका संस्कार रूपी अनेक रंगों से भरकर पूर्ण करती है। यदि वे न हों तो 'मानव' अधूरा है—केवल श्वासयुक्त एक पिण्ड मात्र! इसी लिये भगवान् अंगिरा ने कहा है—
चित्रं क्रमाद्यथानेकैरंगैरुन्मील्यते शनैः।
ब्राह्मण्यमपि तद्वत्स्यात्संस्कारैर्विधिपूर्वकैः॥
अर्थात्—जैसे अनेक प्रकार के रंगों को तूलिका द्वारा संयुक्त करके चित्र बन जाता है, इसी प्रकार विधिपूर्वक किए गए गर्भाधानादि संस्कारों से यह शरीर भी ब्रह्म प्राप्ति के योग्य हो जाता है।
घी एक शक्तिप्रद पौष्टिक खाद्य है, किन्तु वह सभी प्रकार के मनुष्यों के लिए हितकर नहीं हो सकता। 'आयुर्वै घृतम्'—के अनुसार जो घृत सामान्यावस्था में मनुष्य को बल और शक्ति प्रदान करके दीर्घायु का कारण होता, अतिसार ज्वर तथा कास के रोगी के लिए वही घृत सद्यः मृत्यु का कारण बन जाता है। इसी प्रकार दही एक सुन्दर और स्वादिष्ट पदार्थ है, पदार्थ—विज्ञान के अनुसार वह स्निग्ध, हृद्य एवं ओजप्रद है, किन्तु उसके यह गुण तभी तक है, जब तक वह कांसी कांच मिट्टी या पत्थर के किसी पात्र में रखा जाता है—तांबे या पीतल के बर्तन में पड़कर वह विकृत हो जाता है और यदि उसका सेवन किया जाय तो तुरन्त जी मचलाकर वमन हो जाना स्वाभाविक होगा।