वैदिक्यो या मुहूर्ताद्या, नाना शास्त्रमताः क्रियाः।
हेतुवादैः परिष्कृत्य, प्रदर्श्यन्तेऽत्र सप्रमाः॥

विगत अध्यायों में वे सिद्धान्त—जो ध्रुव की भांति सदैव अटल हैं तथा प्रातःकाल से शयन पर्यन्त की समस्त शास्त्रीय विधियों का और गर्भाधान से लेकर और्ध्वदैहिक क्रिया पर्यन्त उसके समस्त संस्कारों का सप्रमाण और सयौक्तिक वर्णन किया जा चुका है। ध्यानपूर्वक मनन करने पर तत्तत् क्रियाओं की इति कर्तव्यता का सहेतुक 'क्यों' तत्त्व सम्यक् विदित हो जाएगा, सम्प्रति इस अध्याय में अवशिष्ट समस्त विशेष क्रियाओं पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया जायेगा। हम इस अध्याय का श्रीगणेश तो मुहूर्त वर्णन से कर रहे हैं परन्तु विषय की संकीर्णता के कारण इसकी परिसमाप्ति होने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता इसलिए ग्रन्थ का कलेवर, भगवत्कृपा और हमारी शक्ति जहांतक अनुकूल रहेगी वहां तक 'जस जस सुरसा वदन बढ़ावा, तासु दुगुण कपि रूप दिखावा' के न्यायानुसार न 'क्यों' का अन्त है न ही उसके समाधान का परला किनारा है। सो बहुत कुछ लिखने पर भी यह अध्याय अपूर्ण ही रहेगा, आशा है यह अपूर्णता भी महामहिम अनन्त भगवान् के मूर्तरूप सनातन धर्म की अनन्तता की ही परिचायक सिद्ध होगी। जिसे अनुभव करते हुवे विज्ञ पाठक भी हमारे साथ—'असितगिरिसम०' से आरम्भ करके 'तदपि तव गुणानामीश ! पारं न याति' तक के पुण्य पाठ में सहर्ष सम्मिलित होंगे।