यज्ञोपवीत के विषय में आज अनेक भ्रान्तियां भी जनसाधारण में फैली हुई हैं। भगवान मनु के आदेशानुसार जबकि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य बालकों का उपनयन ८,११,१२ वर्ष की अवस्था में ही होना चाहिए था तब वह आज बीस पच्चीस वर्ष की अवस्था तक भी अनुपवीत फिरते रहते हैं। कुछ लोगों में विवाह के समय ही यज्ञोपवीत करने का विधान है, कुछ महानुभाव रक्षा-बन्धन या अनन्त के डोरे की भांति इसे किसी खास २ मौके पर पहिनने की वस्तु माने हुए हैं। कितनों को तो यह कहते सुना गया है कि हमारे यहाँ तो अमुक तीर्थ स्थान पर जाकर अपने पुरोहित जी से जनेऊ लेने का रिवाज है, उनकी दृष्टि में मानो यह भी तीर्थ यात्रा की एक निशानी ही है। आर्यसमाज प्रवर्तक स्वा० दयानन्द ने तो इसे विद्या चिन्ह कहकर मिडल पास कराने का सर्टिफिकेट ही करार दे दिया है। उनका मतलब है कि पढ़े लिखे लोगों को ही इसे धारण करना चाहिए, वे चाहे अंग्रेजी मात्र ही पढ़े हों और संध्या का एक मन्त्र भी न जानते हों फिर भी इसे धारण कर सकते हैं। इसके विपरीत यदि कोई द्विज कम पढ़ा लिखा है मुश्किल से सन्ध्या जानता है तो स्वामी जी के कथनानुसार उस बेचारे विद्याविहीन को इस विद्याचिन्ह को धारण करने का कोई अधिकार नहीं—कितनी विचित्र बात है ! थोड़ी देर के लिये मान लीजिए यह विद्या-चिन्ह ही हो परन्तु स्वामी जी ने जो मनुस्मृति के अनुसार ही ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य बालकों का ८, ११, १२ वें वर्ष में उपनयन का विधान स्वीकार किया है—उस की संगति कैसे बैठ सकती है ? बालक ने अभी पढ़ना शुरू भी नहीं किया है उसे अभी गुरुकुल भेजने की तैय्यारी हो रही है और मजा यह है कि स्वामी जी बिना विद्या पढ़े ही उसके गले में विद्या का चिन्ह सर्टिफिकेट लटका देने का विधान कर रहे हैं, यह भी एक ही रही।

देखा जाता है कि सैकड़ों उपनीत ब्राह्मणादि वर्ण भी निरे पानी पाण्डेय हैं और उन्हें द्विज ही कहा जाता है किन्तु बहुत से अनुपनीत शूद्रादि भी विद्वान् हैं पर द्विज नहीं। इसलिए यज्ञोपवीत को विद्या चिन्ह मानना अज्ञान और कपोल कल्पना के सिवाय और क्या हो सकता है ?

इसी प्रकार जो लोग इसे केवल हिन्दुत्व का चिन्ह मानते हैं—वह भी भूल पर हैं। सभी अन्त्यज बिना यज्ञोपवीत के हिन्दू हैं ही, इसमें किसी को क्या सन्देह हो सकता है ? कहा जाता है एक बार महात्मा गांधी गुरुकुल कांगड़ी के उत्सव पर गये थे। गांधी जी के गले में यज्ञोपवीत न था। इससे वहाँ के उपाध्याय वर्ग ने महात्मा गांधी से इसका कारण पूछा। गांधी जी ने कहा पहिले मुझे इन चीजों के रखने के फायदे समझाइये। उन्होंने कहा—यह दोनों हिन्दुत्व के चिन्ह हैं। कहा जाता है इस पर महात्मा गांधी ने हँसते हुए कहा—तब तो मुझे इन की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि इन चिन्हों के बिना भी सारा भारतवर्ष मुझे हिन्दू जानता और मानता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इन्हें केवल हिन्दुत्वज्ञापक चिन्ह मान बैठना भी उन महर्षियों के विज्ञान-सम्मत सिद्धान्तों के प्रत्यक्ष उपहास से कुछ कम नहीं है। इन्हीं सब पूर्वोक्त भ्रान्त धारणाओं का ही परिणाम है कि लोगों में यज्ञोपवीत के प्रति आस्था नहीं रही और उन्होंने इसकी उपेक्षा शुरु कर दी। आज हम देखते हैं पुलिस या सेना में कार्य करने वाला एक क्षत्रिय युवक वैशाख ज्येष्ठ की गर्मी में पसीने से तर और गर्मी से व्याकुल होते हुए भी अपनी वर्दी (Uniform) को तो लादे फिरता है किन्तु डेढ़ तोले का यज्ञोपवीत उसे बोझ मालूम देता है। यही दशा उन लोगों की है जो गले में चमड़े की पेटियें डालकर फिरने में न तो भार अनुभव करते न शर्म, किन्तु यज्ञोपवीत उनकी शान में बट्टा लगाने वाला बन जाता है।

हिन्दु संस्कृति के इस पुनरुदय काल में हमें इन सब बातों पर गौर करना होगा। पहिले किसी भी धार्मिक विषय में प्रश्न करने पर लोग कहा करते थे कि हम भारतीय आज दास हैं, दासों का क्या धर्म ? किन्तु भगवान् के अनुग्रह से आज हम पुनः स्वतन्त्र हैं तो क्या लाखों वर्षों से चली आने वाली उस संस्कृति को—जिसने सभी प्रकार के संक्रमण काल में आर्य जाति को जीवित रक्खा—हमें न अपनाना चाहिए ? स्वतन्त्रता के इस प्रभात में हमें अपनी इन सब विश्रृंखल प्रवृत्तियों को श्रृंखलाबद्ध करके वैदिक संस्कृति को पुनरुज्जीवित करना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि हम पूज्य महर्षियों द्वारा प्रचलित सिद्धान्तों की वैज्ञानिक एवं तथ्य व्याख्या जनता के सामने प्रस्तुत करें और उनके सम्बन्ध में फैली हुई भ्रान्त धारणाओं का निराकरण हो।

यों तो यज्ञोपवीत के विषय में इतनी 'क्यों' उपस्थित हैं और जन साधारण के मस्तिष्क को तंग किया करती हैं कि यदि उन पर विशद विचार किया जाय तो एक बृहद् कार्य स्वतन्त्र ग्रन्थ तैयार हो सकता है किन्तु हम इससे सम्बन्ध रखने वाले प्रमुख प्रश्नों पर ही विचार करेंगे, यथा—यज्ञोपवीत बायें कंधे पर ही क्यों ? पितृ कार्य के समय दाहिने कंधे पर क्यों ? शौचादि के समय कान पर क्यों ? इसमें तीन ही तार क्यों ? ब्रह्मग्रन्थी क्यों ? निर्माण की विशेष प्रक्रिया क्यों ? ब्राह्मणादि का अमुक २ समय में ही यज्ञोपवीत क्यों ? आदि २।

यह सब इस प्रकार की क्यों हैं जिनको समझे बिना वास्तव में यज्ञोपवीत की महत्ता नहीं जानी जा सकती और जबतक किसी वस्तु के तथ्य का हमें ज्ञान नहीं हो जाय—उसके महत्त्व को हम समझ न लें तब तक उस वस्तु के प्रति हमारी श्रद्धा हो भी कैसे सकती है, अगर होगी भी तो वह स्थायी नहीं हो सकती इसलिए अब हम इस विषय पर विशेष विचार प्रारम्भ करते हैं।


यज्ञोपवीत शब्द 'यज्ञ' और 'उपवीत' इन दो शब्दों के संयोग से बना हुआ एक समस्त शब्द है जिस का अर्थ है—यज्ञ को प्राप्त कराने वाला। वेद में—

यज्ञो वै विष्णुः—(शतपथ १।१।१।२)

—कह कर समस्त चराचर में व्याप्त सगुण परमात्मा को यज्ञ शब्द से ही स्मरण किया गया है। इसलिए यज्ञोपवीत का शब्दार्थ 'परमात्मा को प्राप्त कराने वाला' है। स्मृतिसार में यज्ञोपवीत शब्द का निर्वचन करते हुए लिखा है—

यज्ञाख्यः परमात्मा य उच्यते चैव होतृभिः।
उपवीतं ततोऽस्येदं—तस्माद् यज्ञोपवीतकम्॥

इसके अतिरिक्त 'यज्ञेन संस्कृतमुपवीत' इस मध्यम-पदलोपी समास द्वारा यज्ञोपवीत शब्द का दूसरा अर्थ यज्ञ से पवित्र किया हुआ उपवीत='सूत्र' होता है। चूंकि यह संस्कार यज्ञ पूर्वक होता है इसलिए द्वितीय अर्थ भी संगत हो जाता है। उपनयन भी इसी संस्कार का दूसरा पर्यायवाचक शब्द है जिसका अर्थ होता है—ऐसा संस्कार जिसके द्वारा बालक गुरु के समीप ले जाया जाय। कुछ व्याख्याकारों के मतानुसार 'यज्ञार्थ-उपवीतम्'=यज्ञोपवीतम्=यज्ञ के लिए जो सूत्र धारण किया जाय अर्थात् जिसके धारण करने पर मनुष्य को सर्वविध यज्ञ करने का अधिकार प्राप्त हो उसे यज्ञोपवीत कहा जाता है।

इस विषय में यह समझ लेना आवश्यक है कि उपरोक्त विग्रह से निष्पन्न यज्ञोपवीत शब्द का अभिप्राय यह कदापि नहीं है कि जैसे आजकल के सभ्य पुरुष सभा सोसायटी आदि में जाते समय शोभा के लिए गले में दुपट्टा दुशाला या चादर आदि डाल लेते हैं और फिर उसे उतार कर रख लेते हैं इसी प्रकार यज्ञोपवीत भी केवल यज्ञादि के समय पहिनने के काम आता है। स्मृतिकारों ने—"सदोपवीतिना भाव्यं सदाबद्धशिखेन च" कह कर—उसे सदा धारण किये रहने का विधान किया है। जिस से इस प्रकार की भ्रान्ति का भली भांति निराकरण हो जाता है। पिछले दिनों हमें ऐसे ही किन्हीं "भैरवदत्त शर्मा 'गौड़' नामक भ्रान्त विद्वान् की 'वैदिक रहस्य' नामक पुस्तक देखने को मिली है, जो वैदिक मर्मज्ञों की श्रेणी में परिगणित होने का लोभ संवरण न कर सके और व्यर्थ की बातें लिखकर अर्थ का अनर्थ कर बैठे हैं। आपने जो कुछ लिखा है उसका सार यही है—"कि प्राचीन काल में यज्ञादि के लिए दीक्षित करते समय दीक्षित पुरुष को पीले लाल या सफेद रंग का एक वस्त्र कन्धे से लेकर कटि पर्यन्त लपेटने के लिए दिया जाता था जो बाद में प्रमाद तथा लोभवश वस्त्र के स्थान में डोरा रूप हो गया। यज्ञोपवीत कोई संस्कार नहीं और नाही चतुः संहिता में उसके पहिरने का कोई मन्त्र ही विद्यमान है। यज्ञोपवीत का कोई मुहूर्त नहीं मिलता। उपनयन=विद्याध्ययनार्थ गुरु गृहगमन—के समय यज्ञोपवीत धारण गृह्यसूत्रों की मर्यादा से बाहर है। हो सकता है यज्ञोपवीत का वर्तमान रूप जैनियों के संसर्ग से हम लोगों में आ गया है। जैनेऊ, जिनेऊ, जनेऊ यह नामकरण ही इस बात का अच्छा परिचायक है।" इत्यादि

उपर्युक्त बातों में कितना सार है पाठक इसे बिना विशेष विवेचना के ही समझ सकते हैं। महाशय जी ने इसी पुस्तक में अन्यत्र आर्यसमाजियों द्वारा 'आश्वमेधिक' मन्त्रों पर किये गये आक्षेपों का समाधान भी किया है जिससे आपके सनातन धर्मानुयायी होने में कुछ सन्देह नहीं रह जाता। ऐसी दशा में आपने केवल चार संहिताओं को ही 'वेद' मानकर बालू की नींव पर अपने अपूर्वमत का जो दृढ़ प्राचीर खड़ा करने का प्रयास किया है वह कहां तक न्यायसंगत है ? क्या चतुः संहिता के अतिरिक्त ब्राह्मण, उपनिषद् आदि वेद नहीं हैं ? यदि हैं तो फिर जब उनमें 'यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं' आदि दो दो मन्त्र विद्यमान हैं—स्वा० दयानन्द को भी अगत्या जिनकी शरण लेनी पड़ी और आज भी चारों संहिताओं को ही वेद मानने वाले आर्यसमाजी भी जिन मन्त्रों से लोगों को जनेऊ पहिराते हैं—तब चतुः संहिता का ही इतना आग्रह क्यों ?

यदि उपनयन काल में यज्ञोपवीत धारण गृह्य सूत्रकारों की मर्यादा से बाहर होता और यज्ञोपवीत केवल वस्त्र स्थानीय ही होता तो कात्यायन गृह्यसूत्र के परिशिष्ट में 'अथातो यज्ञोपवीत-क्रिया व्याख्यास्यामः' आदि से प्रारम्भ करके 'इत्याह भगवान् बौधायनः' तक के लम्बे सूत्र में यज्ञोपवीत निर्माण प्रकार पाया जाता है। तब यह कैसे कहा जा सकता है कि यज्ञोपवीत धारण गृह्य सूत्रकारों की मर्यादा से बाहर है। यदि गृह्य सूत्रों में ही यज्ञोपवीत न हो तो फिर होगा कहाँ ? केवल लोक प्रसिद्ध 'जनेऊ' शब्दसाम्य मात्र देखकर यज्ञोपवीत को जैनियों के संसर्ग से उत्पन्न हुआ अनुमान कर लेना भी हेत्वाभास पूर्ण होने से परास्त हो जाता है। जैन सम्प्रदाय में 'जनेऊ' नाम का कोई सूत्र धारण भी नहीं किया जाता है। वस्तुतः 'यज्ञ' शब्द का ही अपर पर्याय 'यजन' है, सो यकार छोड़कर 'जन' और उपवीत के 'उ' मात्र जोड़ने से 'जनेऊ' शब्द—यज्ञोपवीत का ही संक्षिप्त संस्करण है ! जैसे पर्वतीय देशों में पण्डित शब्द का संक्षिप्त संस्करण 'पंत' आज भी प्रचलित है। इस प्रकार तो कल को कोई कहने लगेगा कि शिखा भी हिन्दुओं में सिक्खों के संसर्ग से ही आई है क्योंकि सिक्ख और शिखा में काफी श्रुतिसाम्य है। यज्ञोपवीत के मुहूर्त वाला आक्षेप भी ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि मुहूर्त ग्रन्थों में सर्वत्र विवाह संस्कार का मुहूर्त तो मिलता है परन्तु सप्तपदी का मुहूर्त कहीं भी नहीं मिलता। जब यज्ञोपवीत धारण उपनयन संस्कार का ही एक अंग है तब उसके लिए पृथक् मुहूर्त की क्या आवश्यकता ? तात्पर्य यह है कि यज्ञोपवीत शब्द के "यज्ञ के लिये धारण किये जाने वाला उपवीत (सूत्र)" इस अर्थ से किसी को भी भ्रान्त नहीं होना चाहिए।

ब्रह्म सूत्र शब्द यज्ञोपवीत का ही वाचक है जिसकी व्याख्या करते हुए स्मृति प्रकाश में लिखा है—

सूचनाद्ब्रह्मतत्त्वस्य वेदतत्त्वस्य सूचनात्।
तत्सूत्रमुपवीतत्वाद् ब्रह्मसूत्रमिति स्मृतम्॥

अर्थात्—चूंकि यह सूत्र द्विजाति को ब्रह्मतत्त्व तथा वेदज्ञान की सूचना देता है इसलिए इसे ब्रह्मसूत्र कहा जाता है।

"साकार परमात्मा को यज्ञ और निराकार परमात्मा को ब्रह्म कहा जाता है, दोनों को प्राप्त कराने वाला होने के कारण इसे यज्ञोपवीत या ब्रह्मसूत्र इन दोनों नामों से पुकारा जा सकता है। इसी प्रकार यज्ञसूत्र सावित्री-सूत्र आदि भी इसी के नाम समझने चाहिये।


यज्ञोपवीत की उत्पत्ति और प्रचलन का ऐतिहासिक निर्धारण मानव-बुद्धि से परे की वस्तु है क्योंकि यह कोई सौ दो सौ या हजार दो हजार वर्ष से सम्बन्ध रखने वाली वस्तु नहीं है कि आज के इतिहास के पण्डित इस पर अधिकारपूर्वक अपनी लेखनी उठा सकें। इसका सम्बन्ध तो उस काल से है जबकि प्रलय के गर्भ में अनन्तकाल से प्रसुप्त मानव सृष्टि धीरे-धीरे जागने लगी थी, मानव में नव-चेतना का प्रकाश हुआ था और ज्ञान की प्रथम रश्मि से उसका हृदय आलोकित हो उठा था। सृष्टि के उस नवोदयकाल में आदिमानवों=महर्षियों के मानस-पटल पर उद्भूत हुआ वह ईश्वरीय ज्ञान ही आज 'वेद' नाम से पुकारा जाता है। यज्ञोपवीत की उत्पत्ति इस ईश्वरीय ज्ञान के साक्षात्कार से भी पूर्व हुई समझनी चाहिये, क्योंकि वेद में भी इस संस्कार के माहात्म्य के दर्शन होते हैं। हम इस प्रकरण के प्रारम्भ में कतिपय वैदिक मन्त्र दे आये हैं जिनसे हमारे इस कथन का भली-भांति समर्थन हो जाता है।

यज्ञोपवीत धारण के पावन मन्त्र में भी यज्ञोपवीत की उत्पत्ति का संक्षिप्त किन्तु स्पष्ट वर्णन विद्यमान है जिससे हमें इसके काल निर्धारण में पर्याप्त सहायता मिल सकती है। वह मन्त्र है—

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।

इस मन्त्र को यज्ञोपवीत धारण करने के समय प्रायः सभी लोग बोला करते हैं किन्तु इसके अर्थ गाम्भीर्य पर कदाचित् ही किसी ने ध्यान दिया होगा।

हम पीछे कह आए हैं कि यज्ञोपवीत संस्कार हुए बिना किसी को भी वेद पाठ या गायत्री जाप का अधिकार नहीं है।

कृतोपनयनस्यास्य व्रतादेशनमिष्यते। (मनु-२-१७३)

—भगवान् मनु के इस आदेशानुसार इस संस्कार के बाद ही मनुष्य को श्रुति स्वाध्याय का अधिकार मिलता है। यह बात प्रायः सभी जानते हैं कि सृष्टि के आदि प्रवर्तक श्री ब्रह्मा जी महाराज हैं। महाप्रलय के उस भीषणकाल में जबकि यह समस्त ब्रह्माण्ड जलप्लुत होता है, चारों ओर जल के अतिरिक्त कोई वस्तु प्रयत्न करने पर भी नहीं दिखाई देती तब 'ब्रह्म ब्रह्माऽभवत्स्वयम्' के अनुसार साक्षात् परब्रह्म ही श्री ब्रह्माजी महाराज के रूप में प्रादुर्भूत होकर पूर्व कल्पानुरूप वैदिक ज्ञान के सहारे ही सृष्टि का विस्तार करते हैं। वेद के सर्वप्रथम ज्ञाता प्रवक्ता और उपदेष्टा भी यही हैं। किन्तु प्रश्न हो सकता है कि बिना यज्ञोपवीत संस्कार हुए ब्रह्मा को वेद ज्ञान और प्रवचन का अधिकार कैसे मिला ? उनका यज्ञोपवीत संस्कार किसने सम्पन्न कराया ? क्या बिना यज्ञोपवीत के ही उन्होंने वेद का स्वाध्याय और प्रवचन किया ? अगर ऐसा ही हो तो इसका तो अर्थ हुआ कि यज्ञोपवीत बाद के ऋषियों द्वारा आविष्कृत कोई सामाजिक या विद्या-सम्बन्धी चिन्ह मात्र ही है।

नहीं, वास्तव में ऐसी बात नहीं है, यज्ञोपवीत धारण में विनियुक्त इस सुप्रसिद्ध मन्त्र में इन सब प्रश्नों का बड़ी सरलता से सुस्पष्ट उत्तर दिया गया है। श्रुति कहती है—'यज्ञोपवीत परम पवित्र है, यह सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्माजी के साथ ही उत्पन्न हुआ है। यह आयु तेज बल को देने वाला है इसीलिए इसे धारण करना चाहिए।"

मन्त्रार्थ से सुस्पष्ट है कि सृष्टिनायक श्री ब्रह्माजी महाराज यज्ञोपवीत धारण किए हुए ही प्रादुर्भूत हुए थे, इसीलिये उन्हें मर्यादानुसार स्वाध्याय का अधिकार प्राप्त हुआ और उसी वेद-ज्ञान के बल पर वे 'यथापूर्वमकल्पयत्' के अनुसार सृष्टि रचना में समर्थ हो सके। इससे यह भी सुस्पष्ट हो गया कि यज्ञोपवीत वेद की ही भांति अनादि है उसका प्रारम्भ परवर्ती महर्षियों ने नहीं किया और नाही कभी सामाजिक या विद्या-चिह्न के रूप में उसका आविष्कार हुआ है।