प्रायः सभी देशों सभी जातियों और सभी वर्गके लोगों में एक दूसरे का सम्मान सत्कार अभिवादन करने की परिपाटी अभी तक प्रचलित है। मुसलमान इसे दुवा, सलाम और ताजीम के नाम से स्मरण करते हैं, ईसाई 'ऐटिकेट' बोलते हैं अन्यान्य भाषाओं में अन्यान्य नाम हो सकते हैं। यद्यपि इसकी अवश्यकरणीयता में किसी भी सभ्य व्यक्ति को विप्रतिपत्ति नहीं है, सभी इसको समान रूप से स्वीकार करते हैं, परन्तु इसकी अनुष्ठान पद्धति एक दूसरे से बहुत विभिन्न देखी जाती है। ऐसा मालूम पड़ता है कि इसके वास्तविक-वैज्ञानिक स्वरूप को बिना समझे स्वभावतः लाघवतावादी मानव समाज ने अभिवादन में क्रमशः इतना लाघव कर डाला है कि जिससे इसका असली उद्देश्य ही विलुप्त हो गया है। यदि हम अभिवादन प्रथा के क्रमिक ह्रास का अध्ययन करें तो यह निश्चित हो जायगा कि अभिवादन का आज का विकृत रूप लाभप्रद न होकर उल्टा अनेक हानियों का प्रसारक बन गया है। कहना न होगा कि समस्त सभ्यता और संस्कृतियों की प्रसव भूमि एकमात्र भारतवर्ष है, यह तथ्य सभी ऐतिहासिक मुक्त कण्ठ से स्वीकार करते हैं। ऐसी स्थिति में किसी भी प्रथा का विशुद्ध रूप भारतीय शास्त्रों में ही ढूंढा जा सकता है। अन्यान्य लोगों में भले ही अभिवादन को केवल परम्परागत शिष्टाचार मात्र माना जाता हो, परन्तु भारतीय शास्त्रों में तो इसे एक आवश्यक धर्मानुष्ठान स्वीकार किया गया है। इसीलिये हमारे शास्त्रों में इसका स्वरूप, विधि और इतिकर्तव्यता का विस्तृत वर्णन विद्यमान है। यथा—

शास्त्रीय स्वरूप

(क) अग्निमीडे। (ऋग्वेद १।१।१)
ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः। (अथर्व)
नमस्ते भक्तवत्सल ! (वाल्मीकीय रामायण)

(ख) उरसा शिरसा दृष्ट्या, मनसा वचसा तथा।
पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां, प्रणामोऽष्टाङ्ग उच्यते ॥
(आह्निक सूत्रावलि)

(ग) प्रणमेद्दण्डवद् भूमौ (रणवीर भक्तरत्नाकर-पाद्मे)

(घ) ब्रह्मारम्भेऽवसाने च पादौ ग्राह्यौ गुरोः सदा।
सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिणः ॥
(मनु० २।७१-७२)

(ङ) उत्तानाभ्यां हस्ताभ्यां दक्षिणेन दक्षिणं सव्यं
सव्येन पादावभिवादयेत्।
(पैठीनसि कुल्लूकभट्टीये)

(च) ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति।
प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्प्रतिपद्यते ॥
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम् ॥
(मनु० २।१२०-१२१)

अर्थात्—(क) मैं अग्निदेव की वन्दना करता हूं। सब से महान् ब्रह्म को नमस्कार करता हूं। हे भक्तवत्सल राम, आपको नमस्कार हो (ख) [देव प्रतिमा के सामने] छाती, शिर, नेत्र, मन, वचन, हाथ, पांव, और घुटने इन आठों अङ्गों द्वारा किये गये प्रणाम को साष्टाङ्ग प्रणाम कहते हैं। (ग) दंड की भांति भूमि में पड़कर प्रणाम करे। (घ) वेद के स्वाध्याय के आरम्भ में और अन्त में सदैव गुरु के दोनों चरण ग्रहण करने चाहिये। अपने बायें हाथ से गुरु का बायां चरण और अपने दायें हाथ से गुरु का दायां चरण स्पर्श करना चाहिये (ङ) अपने दोनों हाथों को उत्तान=ऊपर की ओर सीधा रखते हुए दक्षिण से दक्षिण और वामसे वाम पादका स्पर्शपूर्वक अभिवादन करना चाहिए। (च) क्योंकि सामने आते हुवे वृद्ध पुरुष को देखकर युवकोंके प्राण स्वभावतः ऊपरको उत्क्रान्त होते हैं, अतः जब युवा उठकर अभिवादन करता है तभी वे प्राण पूर्ववत् प्रतिष्ठित होते हैं। [आर्यसमाज प्रवर्तक स्वामी दयानन्दकृत अर्थ] अभिवादन करने का जिसका स्वभाव है, और विद्या वा अवस्था में वृद्ध पुरुषों का जो नित्य सेवन करता है, उसकी अवस्था, विद्या, कीर्ति और बल इन चारों की नित्य उन्नति हुआ करती है। इसलिए ब्रह्मचारी को चाहिए कि आचार्य माता-पिता, अतिथि, महात्मा आदि अपने बड़ों को नित्य नमस्कार और सेवन किया करे

उपर्युक्त अभिवादन और प्रत्यभिवादन व्यवस्था को हम चार भागों में विभक्त कर सकते हैं।

१—ईश्वर का अभिवादन=यज्ञ वेदपाठ स्तोत्र पाठ आदि साधनों से होना चाहिए, और तत्प्रतिमाओं को साष्टांग प्रणाम करना चाहिए।

२—आयु ज्ञान-यश और बल-वृद्ध गुरुजनों को पाद-स्पर्शपूर्वक प्रणाम करना चाहिये, [यदि प्रणम्यजन साक्षर हैं तो स्वनाम उच्चारण आदि सब विधान करणीय है अन्यथा नहीं। वय प्राप्त ब्रह्मचारियों के लिए वन्दनीय युवतियों का चरण स्पर्श वर्जित है]।

३—समान गुण वयस्कों को परस्पर अपने इष्ट देवता को 'जय' क्रियान्वित नाम ग्रहणपूर्वक सम्मान करना चाहिए। जैसे जयगोपाल, जय हिन्द।

४—गुरुजनों को प्रत्यभिवादन में आशीर्वाद देना चाहिए।